दिशा का ग्रहों से संबंध एवं दोष निवारण के उपाय

दिशा का ग्रहों से संबंध एवं दोष निवारण के उपाय  

वास्तु शास्त्र का मुख्य आधार ज्योतिष शास्त्र है। जिस प्रकार ग्रहों के अनुकूल और प्रतिकूल प्रभाव मानव जीवन पर पड़ते हं उसी प्रकार ग्रह अपने शुभ और अशुभ प्रभाव से वास्तु की दिशाओं को प्रभावित कर उस मकान में रहने वाले के तत्संबंधी प्रभाव में कमी या वृद्धि करते हैं। प्र.- किसी भी भवन में पूर्व दिशा का क्या महत्व है? इस दिशा में दोष होने पर क्या प्रभाव पडता है? उ.- भवन के पूर्व दिषा का स्वामी इंद्र्र एवं प्रतिनिधि ग्रह सूर्य हैं। सृष्टि के सृजन में सूर्य का विशेष महत्व है। इनसे ही समस्त सृष्टि में प्राणियों और वनस्पतियों की उत्पत्ति, पोषण, प्रलय होते हैं। जिस घर का मुख्य द्वार बड़ा हो, उसमें बड़ी-बड़ी खिड़कियों एवं झरोखां से सूर्य का प्रकाश आता हो तथा पूर्व की दिशा में किसी प्रकार का दोष नहीं हो तो उसमें वास करने वाले को अच्छे स्वास्थ्य, पराक्रम, तेजस्विता, सुख-समृद्धि एवं गौरवपूर्ण जीवन की प्राप्ति होती है। घर के पूर्वी भाग में कूड़ा-कचरा, पत्थर और मिट्टी के ढेर हों तो संतान की हानि होती है। साथ ही इस दिषा मं दोष होने पर व्यक्ति के सांसारिक एवं आध्यात्मिक विकास में कमी आ जाती है। पिता के सुख में कमी, पुत्र संतान की कमी, विकलांग संतान का जन्म एवं यश और प्रतिष्ठा में कमी आती है। इ स क अति र क्त इस दिशा के दोषपूण्र् होने पर धन के अपव्यय, ऋण, मानसिक अषांति, नेत्र विकार, लकवा, रक्तचाप, सिर दर्द या सिर से संबंध् त रोग, हड्डी के टूटने आदि रोग की संभावना बनती है। प्र.- किसी भी भवन में पश्चिम दिशा का क्या महत्व है? इस दिशा में दोष होने पर क्या प्रभाव पडता है? उ.- पष्चिम दिषा का स्वामी वरुण, आयुध पाष एवं प्रतिनिधि ग्रह षनि है। पष्चिम दिषा कालपुरुष के अनुसार सप्तम स्थान से जुड़ी हुई है। पत्नी सुख, वैवाहिक सुख, व्यवसाय में प्रगति, साझेदारी का व्यवसाय, कोर्ट कचहरी के मामले, गुप्तांग एवं जननांग का विचार इसी स्थान से किया जाता है। भवन में घर या वर्षा जल पश्चिम से होकर बाहर जा रही हो तो पुरूष लम्बी बीमारियों के शिकार होते है। इस दिशा में दोष रहने पर नपुंसकता, पैरां में तकलीफ, कुष्ठ रोग, रीढ़ की हड्डी में कष्ट, गठिया, स्नायु एवं वात संबंधी रोगों की संभावना रहती है। यदि घर की पष्चिम दिषा में दरारें हो तो गृहस्वामी के गुप्तांग में बीमारी होती है तथा आमदनी अव्यवस्थित रहती है। यदि पश्चिम दिशा में अग्नि स्थान हो तो गर्मी, पित्त और मस्से की शिकायतें हांेगी। प्र.- किसी भी भवन में उत्तर दिशा का क्या महत्व है? इस दिशा में दोष होने पर क्या प्रभाव पडता है? उ.- उत्तर दिषा का स्वामी कुबेर, आयुध गदा एवं प्रतिनिधि ग्रह बुध है। बुध उत्तर दिशा का स्वामी माना गया है। उत्तर दिषा से काल पुरुष के हृदय एवं सीने का विचार किया जाता है। इस दिषा में खाली जगह छोड़ने से ननिहाल पक्ष लाभान्वित होता है। यह दिशा शुभ होने पर व्यक्ति को विद्या तथा बुद्धि की प्राप्ति और उसमें कवित्व शक्ति तथा विभिन्न प्रकार के आविष्कारांे की क्षमता का विकास होता है। साथ ही नौकर-चाकर, मित्र, घर एवं विभिन्न प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। उत्तर दिषा दोषपूर्ण हो तो गृहस्वामी की कंडली का चैथा भाव निष्चित बिगड़ा हुआ होगा। ऐसे जातक के मातृ सुख, नौकर-चाकर के सुख, भौतिक सुख आदि की कमी रहती है। साथ ही हर्निया, हृदय तथा चर्मरोग, गाॅल ब्लाडर की बीमारी, पागलपन, हैजे, फेफड़े एवं रक्त से संबंधित बीमारियों की संभावना रहती है।

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रत्न एवं रूद्राक्ष विशेषांक  मई 2014

फ्यूचर समाचार के रत्न एवं रूद्राक्ष विशेषांक में अनेक रोचक और ज्ञानवर्धक आलेख हैं जैसे- रूद्राक्ष की ऐतिहासिक पृष्ठ भुमि, रूद्राक्ष की उत्पत्ति, रूद्राक्ष एक वरदान, रूद्राक्ष धारण करने के नियम, ज्योतिष में रत्नों का महत्व, रत्न धारण का समुचित आधार, रत्न धारण से रोगों का निदान, उपरत्न, लग्नानुसार रत्न निर्धारण, रत्नों का महत्व और स्वास्थ्य आदि। इसके अतिरिक्त पंच पक्षी के रहस्य, वट सावित्री व्रत, अक्षय तृतिया एवं आपकी राशि, ग्रह और वकालत, एक सभ्य समाज के निर्माण की प्रक्रिया, अगला प्रधानमंत्री कौन, कुण्डली के विभिन्न भावों में केतु का फल, सत्य कथा, पुंसवन संस्कार, हैल्थ कैप्सूल, शंख थेरेपी, ज्योतिष और महिलाएं तथा वास्तु प्रश्नोत्तरी व वास्तु परामर्श जैसे अन्य रोचक आलेख भी सम्मिलित किये गये हैं।

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