ज्योतिष में रत्नों का महत्व

ज्योतिष में रत्नों का महत्व  

किसी ग्रह के निर्धारित रत्न द्वारा उसके रंग की किरणें मानव शरीर में प्रवेश करके अपने उत्सर्जन से अपना प्रभाव सुदृढ़ बनाती है। रत्न इस प्रकार एक छानने के यंत्र के समान कार्य करता है और मानव शरीर में उन किरणों की आवश्यकतानुसार हानि या लाभ पहुंचाता है। यदि ऐसी किरणें आती हों जो किसी व्यक्ति विशेष के शरीर के लिए उपयुक्त नहीं है तो निर्धारित रत्न हानिप्रद प्रभाव को समेट लेता है और जातक की रक्षा करता है। कौन सा रत्न कब उपयुक्त होगा और कब हानिप्रद, इसमें विद्वानों की एक राय नहीं है। कुछ विद्वान कहते हैं, जो ग्रह कुंडली में पीड़ाकारक हो उस ग्रह का रत्न कुंडली में शुभ फलदाता है। केवल उसी रत्न को समयानुसार धारण करना चाहिए। अशुभ फलदाता ग्रह के रत्न को धारण करना उचित न होगा। इस मत के समर्थकों का कहना है कि अशुभ फलदाता ग्रह का रत्न धारण करने से उसकी दी हुई पीड़ा शांत नहीं होती वरन उसका रत्न धारण करने से वह बलवान होकर और अधिक अशुभ फलदाता बन जाता है। एक मत और है कि ग्रहों में दो समुदाय होते हैं- एक समुदाय का नेता सूर्य और उसके सहयोगी हैं बृहस्पति और मंगल। दूसरे समुदाय का नेता है सूर्य पुत्र शनि और उसके सहयोगी हैं बुध, शुक्र, राहु और केतु। इस मत के अनुसार जिस समुदाय का ग्रह लग्न का स्वामी हो उसके सहयोगी ग्रहों के रत्न आवश्यकतानुसार धारण करने चाहिए। विपक्षी दल के रत्न उस कुंडली के लिए हानिप्रद होंगे। एक अन्य मत के अनुसार जो ग्रह किसी महादशा का स्वामी हो तो उसकी महादशा में उस ग्रह का रत्न धारण करना चाहिए, चाहे महादशा का स्वामी उस कुंडली के लिए अशुभ ग्रह ही क्यों न हो। जन्मकुंडली का परीक्षण करने से पहले यह देख लेना चाहिए कि उस कुंडली के लिए कौन सा ग्रह अशुभ है? उस अशुभ ग्रहों के रत्न जातक को धारण करने की सलाह कभी नहीं देनी चाहिए, उनकी महादशा आने पर भी नहीं। कौन सा रत्न किसे और कब धारण करना चाहिए, इसका विवेचन निम्नलिखित है: माणिक्य माणिक्य सूर्य का रत्न है। जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में सूर्य शुभ भाव का स्वामी हो तो उस भाव को बढ़ाने के लिए माणिक्य रत्न धारण करना अति लाभदायक रहता है। - यदि सूर्य तीसरे, छठे या ग्यारहवें भाव में हो तो माणिक्य पहनना शुभ होता है। - यदि जन्मकुंडली में सूर्य लग्न में हो तो लग्न के प्रभाव को बढ़ाने के लिए माणिक्य पहनना चाहिए। - अष्टम स्थान में यदि सूर्य अष्टमेश हो तो माणिक्य धारण नहीं करना चाहिए। - सप्तम भाव में सूर्य हो तो माणिक्य पहनना गृहस्थ सुख के लिए आवश्यक होता है। - जन्मकुंडली में यदि सूर्य पंचम या नवम में हो तब भी माणिक्य धारण करना चाहिए। मोती मोती चंद्रमा का रत्न है। जिस जन्मकुंडली में चंद्रमा शुभ भावों का अधिपति हो, ऐसे जातक को मोती धारण करना चाहिए। - यदि चंद्रमा पंचमेश होकर बारहवें भाव में हो तो भी मोती धारण करना शुभ माना गया है। - दूसरे भाव का स्वामी यदि चंद्रमा हो और वह कुंडली में कहीं पर भी हो तब भी मोती पहनना श्रेयस्कर माना गया है। केंद्र में चंद्रमा की उपस्थिति हल्की मानी गई है। ऐसे चंद्र को बलवान बनाने के लिए मोती पहनना जरूरी है। - यदि चंद्रमा राहु, केतु या मंगल की दृष्टि में हो तो मोती पहनना अत्यंत लाभकारी होता है तथा जिसकी कुंडली में चंद्र वृश्चिक राशि का होकर कहीं पर भी स्थित हो तो उसे अवश्य मोती धारण करना चाहिए। - विंशोत्तरी पद्धति में जिस जातक को चंद्रमा की अंतर्दशा हो उस व्यक्ति को भी मोती धारण करना शुभ माना गया है। मूंगा मूंगा मंगल का रत्न है। जिन व्यक्तियों की जन्मकुंडली में मंगल शुभ भावों का स्वामी हो, उन्हें मूंगा धारण करना शुभदायक होता है। इस रत्न में यह विशेषता होती है कि यह रश्मिमंडल में से केवल मंगल की रश्मियों को ही सोखता है। जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में मंगल दूषित, अस्त या प्रभावहीन हो तो उसे मूंगा रत्न अवश्य धारण करना चाहिए। पन्ना पन्ना बुध का रत्न है। जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली में बुध शुभ भावों का अधिपति हो उस व्यक्ति को बुध रत्न पन्ना धारण करना शुभ होता है। वृष, मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, मकर, कुंभ राशि के जातक को पन्ना धारण करना चाहिए। पुखराज पुखराज बृहस्पति का रत्न है। इस संबंध में विद्वानों में मतभेद है कि बृहस्पति का रत्न सफेद पुखराज है या पीला पुखराज। परंतु इसका रंग पीला ही होना चाहिए यही ज्यादा उचित है। जिन व्यक्तियों की कुंडली में बृहस्पति प्रथम, पंचम, नवम का स्वामी हो उन्हें पुखराज धारण करना शुभ होता है। हीरा हीरा शुक्र का रत्न है, जिन व्यक्तियों की जन्मकुंडली में शुक्र अच्छे भावों का अधिपति होता है, उन्हंे हीरा अवश्य धारण करना चाहिए। वृष राशि के लिए हीरा आयु वृद्धि तथा जीवन में उन्नति की प्राप्ति हेतु, मिथुन राशि के लिए संतान सुख, मान, यश, प्रतिष्ठा, बुद्धि बल हेतु, कन्या राशि के लिए हर प्रकार की उन्नति के लिए, तुला राशि के लिए स्वास्थ्य लाभ, आयु में वृद्धि, यश, मान के लिए, मकर राशि के जातक को हीरा व्यवसाय में उन्नति हेतु धारण करना चाहिए। नीलम नीलम शनि का रत्न है। जिस जन्मकुंडली में शनि शुभ भावों का अधिपति हो उनको अवश्य ही नीलम धारण करना चाहिए। -वृष राशि के जातक धारण करके सदा सुख, संपदा, समृद्धि, मान, प्रतिष्ठा तथा धन की प्राप्ति कर सकते हैं। - मिथुन राशि के लिए भी नीलम शुभ होता है। - तुला राशि के जातक नीलम धारण करके सब प्रकार का सुख प्राप्त कर सकते हैं। - मकर व कुंभ राशि के जातकों के लिए भी नीलम सदा शुभ फल देता है। गोमेद गोमेद राहु का रत्न माना जाता है। राहु एक छाया ग्रह है और इसकी कोई अपनी राशि नहीं होती है। यदि जन्मकुंडली में राहु लग्न, चैथे, पांचवें, सातवें, नवें या दसवें भाव में हो तो राहु रत्न गोमेद धारण करना शुभ रहता है। लहसुनिया यह केतु का रत्न है। केतु भी एक छाया ग्रह है और इसकी भी अपनी कोई राशि नहीं होती है। यदि जन्मकुंडली में केतु लग्न, चतुर्थ, सप्तम, दशम, पंचम, नवम, तृतीय, षष्ठ या एकादश भाव में हो तो यह रत्न धारण करना शुभ होता है। यदि केतु द्वितीय, सप्तम, अष्टम, द्वादश भाव में हो तो कभी भी अपनी अंगूठी में लहसुनिया नहीं जड़वाना चाहिए। केतु के रत्न के साथ माणिक्य, मोती, मूंगा या पीला पुखराज कभी पहनना शुभ नहीं रहता।


रत्न एवं रूद्राक्ष विशेषांक  मई 2014

फ्यूचर समाचार के रत्न एवं रूद्राक्ष विशेषांक में अनेक रोचक और ज्ञानवर्धक आलेख हैं जैसे- रूद्राक्ष की ऐतिहासिक पृष्ठ भुमि, रूद्राक्ष की उत्पत्ति, रूद्राक्ष एक वरदान, रूद्राक्ष धारण करने के नियम, ज्योतिष में रत्नों का महत्व, रत्न धारण का समुचित आधार, रत्न धारण से रोगों का निदान, उपरत्न, लग्नानुसार रत्न निर्धारण, रत्नों का महत्व और स्वास्थ्य आदि। इसके अतिरिक्त पंच पक्षी के रहस्य, वट सावित्री व्रत, अक्षय तृतिया एवं आपकी राशि, ग्रह और वकालत, एक सभ्य समाज के निर्माण की प्रक्रिया, अगला प्रधानमंत्री कौन, कुण्डली के विभिन्न भावों में केतु का फल, सत्य कथा, पुंसवन संस्कार, हैल्थ कैप्सूल, शंख थेरेपी, ज्योतिष और महिलाएं तथा वास्तु प्रश्नोत्तरी व वास्तु परामर्श जैसे अन्य रोचक आलेख भी सम्मिलित किये गये हैं।

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