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रोग कारक - शनि

सौर मंडल में नौ ग्रह विद्यमान हैं जो समस्त ब्रह्मांड, जीव एवं सभी क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं। प्रत्येक ग्रह की अपनी विशेषतायंे हैं जिनमें शनि की भूमिका महत्वपूर्ण है। शनि को दुःख, अभाव का कारक ग्रह माना जाता है। जन्म समय में जो ग्रह बलवान हों उसके कारक तत्वों की वृद्धि होती है एवं निर्बल होने पर कमी होती है किंतु शनि के फल इनके विपरीत हैं। शनि निर्बल होने पर अधिक दुख देता है व बलवान होने पर दुख का नाश करता है।

शनि व शुक्र का विचित्र संबंध

शनि व शुक्र परिचय शनि को “सौरमंडल का गहना” (श्रमूमस व िजीम ैवसंत ैलेजमउ) कहा जाता है क्योंकि इनके चारों ओर अनेक सुन्दर वलय परिक्रमा करते हैं। खगोलीय दृष्टिकोण से शनि एक गैसीय ग्रह है और शनि को सूर्य से जितनी ऊर्जा मिलती है उससे तीन गुनी ऊर्जा वह परावर्तित करता है। शनि को नैसर्गिक रूप से सर्वाधिक अशुभ ग्रह माना गया है जो दुःख, बुढ़ापा, देरी, बाधा आदि का प्रतिनिधित्व करता है। शनि की शुभ स्थिति और स्वामित्व एकाकीपन, स्थिरता, संतुलन, न्यायप्रियता, भय-मुक्ति, सहिष्णुता, तप आदि की प्रवृत्ति भी देते हैं। गोचर में शनि को काल का प्रतिनिधि माना गया है।

सूर्य-शनि युति फलादेश

जन्मकुंडली में दो या अधिक ग्रहों के आपसी संबंध को ‘योग’ कहते हैं। इन संबंधों में ‘युति’ का अंतिम (चैथा) स्थान है। ग्रह योग पिछले जन्म के अच्छे-बुरे कर्मफल अनुसार बनते हैं जिसकी अनुभूति उन ग्रहों की दशा भुक्ति में जातक को होती है। इस लेख में सूर्य और शनि, दो विपरीत स्वभाव और कारकत्व वाले ग्रहांे की युति का फलादेश प्रस्तुत है।

शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या का प्रभाव

प्रत्येक जातक को अपने जीवन में दो या तीन बार शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या का सामना करना ही पड़ता है। जिन जातकों की दीर्घायु होती है उनके जीवन में कुल तीन साढ़ेसाती आती है क्योंकि 30 वर्षों के पश्चात ही शनि वापस राशि में आता है। यह आवश्यक नहीं है कि शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या आपको कष्ट ही प्रदान करेंगी। अनुभव में देखा गया है कि शनि की साढ़ेसाती में लोगों ने इतनी उन्नति की है जितनी उन्होंने अपने पूरे जीवन में नहीं की। शनि की साढ़ेसाती एवं ढैय्या का प्रभाव कैसा होगा यह जातक की जन्मपत्रिका में शनि की स्थिति से पता चलता है।

संन्यास योग कारक शनि

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सौरमंडल में नौ ग्रह विद्यमान हैं जो समस्त ब्रह्मांड, जीव एवं सभी क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं, जिनमें शनि की महत्वपूर्ण भूमिका है। शनि चिंतनशील, गहराइयों में जाने वाला, योगी, संन्यासी एवं खोज करने वाला ग्रह है। शनि के साथ सूर्य जो नवग्रहों में राजा एवं अग्नि तत्व ग्रह है एवं मानव शरीर संरचना का कारक है, राहु जो शनि के समान ही ग्रह है, शनि के साथ सूर्य, राहु पृथकता जनक प्रभाव रखते हैं।

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सनातन धर्म और अध्यात्म

सनातन धर्म और अध्यात्म

ज्योतिष पूर्णत: वैज्ञानिक हैं। ज्योतिष मानव कल्याण का एक बहुत बड़ा साधन हैं। इसका प्रयोग कर व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठ बना सकता है। ज्योतिष न केवल भविष्य को समझने का साधन हैं बल्कि यह मन को समझने का सबसे महत्वपूर्ण साधन हैं। जो व्यक्ति अपने मन पर नियंत्रण रखने लगता है वह अपने जीवन की सभी गतिविधियों पर नियंत्रण कर लेता है।

रुद्राक्ष

रुद्राक्ष

रुद्राक्ष को भगवान शिव का अश्रु कहा गया है। शास्त्रों में रुद्राक्ष सिद्धिदायकए पापनाशकए पुण्यवर्धकए रोगनाशकए तथा मोक्ष प्रदान करने वाला कहा गया हैद्य रुद्राक्ष तन.मन की बहुत सी बीमारियों में राहत पहुँचाता है।

प्रारंभिक ज्योतिष

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आप ज्योतिष क्षेत्र में रूचि रखते हैं लेकिन सीखने का माध्यम अभी तक प्राप्त नहीं हुआ था या ज्योतिष में ज्ञान था लेकिन क्रमबद्ध नहीं था प्रारंभिक ज्योतिष की यह सीडी आपकी आवश्यकता को समझकर ही तैयार की गई है। अवश्य देखिए -

ज्योतिष उपाय

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ज्योतिष में संपूर्ण ज्ञान होते हुए भी तबतक वह अधूरा है जबतक कि उसके उपाय न मालूम हो। यह ठीक उसी तरह है जैसे डाॅक्टर बीमारी को समझे लेकिन दवा न बता पाए। इस सीडी के द्वारा आप जान पाएंगे कि किस कुंडली के लिए तथा किस समस्या के लिए क्या उपाय किया जाना चाहिए। अवश्य जानिए -

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सरल ज्योतिष

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सरल ज्योतिष पुस्तक की रचना ज्योतिष के प्रारंभिक छात्रों की रूचि, योग्यता, अवस्था और देश काल पात्र को ध्यान में रखते हुए की गयी हैं। सरल ज्योतिष पुस्तक में ज्योतिष से सम्बंधित खगोल ज्ञान, गणित, ज्योतिष फलित, गोचर, पंचांग के अध्ययन तथा कुंडली मिलान के प्रारंभिक ज्ञान के विषयों को लिखा गया हैं।

फेंगशुई

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फेंगशुई पुस्तक हमें यह बताती है की घर की सजावट, फर्नीचर, पर्दों के रंग, कमरों के रंग किस किस तरह से यह सब चीजें हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं। फेंगशुई आतंरिक वातावरण को नियंत्रित करने, घर में जीवन को शांतिपूर्ण एवं सरस बनाने में बेजोड़ सहायक हैं।

कुंडली  मिलान किताब

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सरल अष्टकूट मिलान पुस्तक कुंडली मिलान की आवश्यकता कब, क्यों और कैसे, तथा विवाह की असफलता के कारणों पर प्रकाश डालती हैं। कुंडली मिलान द्वारा हम यह जानने की कोशिश करते है की लडके व् लड़की की प्रकृति, मनोवृति एवं अभिरुचि क्या है।

सरल हस्तरेखा शास्त्र

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हस्तरेखा विज्ञान भारतीय समाज और परिवेश में तो युगों पहले से ही प्रचलित है। माना जाता है की समुद्र ऋषि ऐसे पहले भारतीय ऋषि थे, जिन्होंने क्रमबद्ध रूप से ज्योतिष विज्ञान की रचना की।

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संन्यास योग कारक शनि

फ़रवरी 2016

व्यूस: 8

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