शनि व मंगल की वैवाहिक सुख में भूमिका

शनि व मंगल की वैवाहिक सुख में भूमिका  

1. सूर्य और शनि के साथ शुक्र और सप्तमेश हो तो भी विवाह सुख की संभावना कम ही होती है। 2. सूर्य सप्तम भावस्थ हो और शनि की उस पर दृष्टि हो अर्थात शनि लग्नस्थ, पंचमस्थ या दशमस्थ हो तो भी विवाह होने की संभावना क्षीण हो जाती है। 3. शनि और सूर्य पारस्परिक दृष्टि संबंध रखते हों या लग्न या सप्तम भाव प्रभावित हो रहा हो तो विवाह होने की संभावना बहुत कम होती है। 4. सप्तमेश या शुक्र से द्वितीयस्थ सूर्य हो एवं द्वादशस्थ शनि हो तो भी विवाह से सुख नहीं होता है। 5. शनि यदि सूर्य अथवा चंद्रमा में से एक को देखता हो अथवा उससे युक्त हो तथा शुक्र भी शनि द्वारा प्रभावित हो (शनि की राशि या नक्षत्र में हो अथवा शनि से दृष्ट हो) तो विवाह में विलंब होता है। 6. लग्न में शनि स्थित हो, सूर्य सप्तम भावस्थ हो एवं सप्तमाधिपति निर्बल हो तो विवाह कठिनाई से होता है। 7. शनि और चंद्रमा संयुक्त रूप से सप्तमस्थ हो अथवा नवांश लग्न से सप्तमस्थ हो तो विवाह में विलंब


विवाह विशेषांक  मार्च 2014

फ्यूचर समाचार पत्रिका के विवाह विशेषांक में सुखी वैवाहिक जीवन के ज्योतिषीय सूत्र, वैदिक विवाह संस्कार पद्धति, कुंडली मिलान का महत्व, विवाह के प्रकार, वर्तमान परिपेक्ष्य में कुंडली मिलान, तलाक क्यों, शादी के समय निर्धारण में सहायक योग, शनि व मंगल की वैवाहिक सुख में भूमिका, शादी में देरी: कारण-निवारण, दाम्पत्य जीवन सुखी बनाने के उपाय तथा कन्या विवाह का अचूक उपाय आदि विषयों पर विस्तृत जानकारी देने वाले आलेखों को सम्मिलित किया गया है।

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