वास्तु सीखें प्रमोद कुमार सिन्हा प्रश्न- भवन में सीढ़ी किस स्थान पर उपयुक्त होती है? उत्तर- सीढ़ियों के लिए भवन के मूल पश्चिम, मूल दक्षिण या र्नैत्य का क्षेत्र सर्वाधिक उपयुक्त होता है। र्नैत्य कोण में बनी सीढ़ियां अति शुभ होती हैं क्योंकि भवन का र्नैत्य क्षेत्र उठा हुआ और इस पर भारी वजन का होना शुभ माना जाता है। दूसरे विकल्प में सीढ़ियां दक्षिण, पश्चिम या पश्चिमी वायव्य की तरफ यथासंभव पूर्वी या उत्तरी दीवार से हटकर बनानी चाहिए। प्रश्न- ईशान, वायव्य एवं आग्नेय क्षेत्र में सीढ़ी क्या फल देती है? उत्तर- ईशान क्षेत्र में सीढ़ियां अर्थ तथा व्यवसाय को नुकसान पहुंचाती हैं और गृहस्वामी को कर्ज में डाल देती हैं। साथ ही स्वास्थ्य के लिए काफी नुकसानदायक होती हैं। आग्नेय या उत्तरी वायव्य में सीढ़ी बनाने पर संतान का स्वास्थ्य खराब रहता है। इस जगह पर सीढ़ियां बनाना अनिवार्य हो तो हल्की बनानी चाहिए। प्रश्न- भवन में पूजा घर किस क्षेत्र में बनाना चाहिए? उत्तर- पूजा घर उत्तर-पूर्व दिद्गाा अर्थात् ईद्गाान कोण में बनाना शुभफलदायक होता है क्योंकि उत्तर-पूर्व में परमपिता परमेद्गवर अर्थात ईद्गवर का वास होता है। कहा जाता है कि देवी लक्ष्मी, भगवान विष्णु के साथ उतर-पूर्व में निवास करती है। साथ ही ईद्गाान क्षेत्र में देव गुरु बृहस्पति का अधिकार है जो कि आध्यात्मिक चेतना का प्रमुख कारक ग्रह है। ईद्गाान कोण में जगह नही रहने पर पूजा कक्ष या मंदिर उत्तर, पूर्व या पद्गिचम दिद्गाा में बनाया जा सकता है। यह स्थान दैनिक पूजा के लिए उपयुक्त होता है। पर्व आदि पर विद्गोष पूजा, कथा, हवन आदि घर के मध्य स्थान, आंगन आदि में आयोजित किए जा सकते हैं। प्रश्न- शयनकक्ष एवं रसोईघर में पूजा कक्ष बनाना चाहिए अथवा नहीं? उत्तर- पूजा गृह कभी भी शयनकक्ष में नहीं बनाना चाहिए क्योंकि शयनकक्ष पर शुक्र का आधिपत्य होता है जो भौतिकवादी ग्रह है। इसके विपरीत पूजा घर, वृहस्पति के आधिपत्य में आता है जो कि सात्विक ग्रह है। यह सात्विक गुणों में वृद्धि करता है। शयनकक्ष में पूजा घर रहने पर शयन कक्ष का स्वामी ग्रह द्गाुक्र, वृहस्पति के प्रभाव में कमी लाएगा जिसके फलस्वरुप आध्यात्मिकता में कमी आएगी और पूजा का जो लाभ मिलना चाहिए वह नहीं मिल पाएगा। बृहस्पति संतान एवं सांसारिक सुखों का भी कारक है। शयनकक्ष में पूजाघर बनाने से बृहस्पति अपने शत्रु से पीड़ित होगा जिसके फलस्वरूप संतान सुख, सांसारिक सुख एवं धन में कमी आएगी। अतः शयनकक्ष या बैठककक्ष के अंदर पूजाघर नहीं बनाना चाहिए। पूजाघर कभी भी रसोईघर के साथ नहीं बनाना चाहिए। प्रायः लोग रसोईघर में ही पूजाघर बना लेते हैं जो उचित नहीं है। रसोईघर में प्रयोग होनेवाली वस्तुएं मिर्च-मसाला, गैस, तेल, काँटा, चम्मच, नमक आदि मंगल की प्रतीक वस्तुएं हैं। मंगल का वास भी रसोईघर में ही होता है। उग्र ग्रह होने के कारण मंगल उग्र प्रभाव में वृद्धि कर पूजा करने वाले की शांति एवं सात्विकता में कमी लाता है। अतः रसोईघर में पूजा करने से आध्यात्मिक चेतना का विकास नहीं हो पाता। प्रश्न- पूजा घर शौचालय के पास होना चाहिए या नही ? उत्तर- पूजाघर टॉयलेट के सामने नहीं होना चाहिए क्योंकि टॉयलेट पर राहु का अधिकार होता है जबकि पूजा स्थान पर बृहस्पति का अधिकार है। राहु अनैतिक संबंध एवं भौतिकवादी विचारधारा का सृजन करता है। साथ ही राहु की प्रवृतियां राक्षसी होती हैं जो पूजाकक्ष के अधिपति ग्रह बृहस्पति के सात्विक गुणों के प्रभाव को कम करती है जिसके फलस्वरूप पूजा का पूर्ण आध्यात्मिक लाभ व्यक्ति को नहीं मिल पाता।

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