वास्तु शिक्षा प्रमोद कुमार सिन्हा प्राचीन काल में आलौकिक शक्तियों से संपन्न ज्ञानी, ऋषि, मुनि जनों ने स्वास्थ्य, उन्नति और मानव की प्रसन्नता के लिए अनवरत प्रयास किए और इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु उन्होंने ऊर्जाओं की वृद्धि और संतुलन के लिए वास्तु और फेंग शुई की खोज की। वास्तु सम्मत गृह निर्माण हेतु वास्तु शास्त्र का आधारभूत ज्ञान होना आवश्यक है, इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु, इस स्थाई स्तंभ में वास्तु विशेषज्ञ श्री प्रमोद कुमार सिन्हा द्वारा वास्तु शास्त्र की क्रमिक शिक्षा से आप सभी लाभान्वित होंगे। प्रश्न : वास्तु क्या है? उ0- वास्तु का तात्पर्य है - व+अस्तु अर्थात् बसने हेतु। ऐसा शास्त्र जिसमें दिशा, तत्व ग्रह, नक्षत्र व पंचतत्व का सामंजस्य स्थापित करके भवन निर्माण किया जाना बताया जाए वही वास्तु शास्त्र है। इसके अंतर्गत वास्तु ऊर्जा का ब्रह्माडीय ऊर्जा से कुशलता पूर्वक सामंजस्य स्थापित किया जाता है। ऐसा करने से जीवन सुखमय और समृद्ध होता है तथा हमारे निवास स्थान में लक्ष्मी का चिरस्थाई निवास हो जाता है और घर विभिन्न आपदाओं से सुरक्षित रहता है। प्र.-वास्तुद्गाास्त्र का सिद्धांत किन तत्वों पर आधारित है एवं उनका क्या प्रभाव है ? उ0-वास्तुद्गाास्त्र का सिद्धांत पंचमहाभूतात्मक तत्व पर आधारित है। ये पंचमहाभूत पृथ्वी, जल अग्नि, वायु और आकाद्गा हैं। हमारा ब्रहा्रांड भी इन पांच तत्वों से बना है। इसलिए कहा जाता है यत् पिंडे तत् ब्रह्मांडे। जिस प्रकार शरीर में इन तत्वों की कमी या अधिकता होने से व्यक्ति अस्वस्थ या बीमार हो जाते हैं, उसी प्रकार भवन में इन तत्वों के असंतुलित होने से उसमें निवास करने वाले को कष्ट एवं मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही प्रकृति की अनन्त शक्तियों में से कुछ शक्तियां हमें प्रभावित करती हैं जैसे सूर्य की स्थिति, पृथ्वी पर गुरूत्वाकर्षण शक्ति, आभा मंडल की शक्तियां, चुंबकीय शक्ति तथा विद्युत चुंबकीय शक्ति इत्यादि। यह शक्तियॉं निर्माण किए गए भवन में विद्यमान रहती है जो मानव शरीर की विद्युत चुंबकीय शक्ति को प्रभावित करके शुभ या अशुभ फल देती है। यह शक्तियॉं जगह-जगह पर पृथ्वी एवं मानव पर हमेशा अलग-अलग प्रभाव एवं महत्व रखती है। फलस्वरूप वास्तुशास्त्र सदैव प्रत्येक स्थान पर एक समान फल नही देता है। यह फल मानव के ग्रह, नक्षत्र तथा भौगोलिक अक्षांश के अनुसार बदलता रहता है। प्र0- ब्रह्म स्थान किसे कहते हैं और इसका क्या महत्व है ? उ.-वास्तुशास्त्र दिशात्मक ऊर्जा पर आधारित एक व्यावहारिक विज्ञान है। वास्तु में प्रत्येक दिशा का अपना एक महत्व होता है। क्योंकि प्रत्येक दिशा पर अलग-अलग ग्रहों, देवताओं तथा विभिन्न दिशाओं से आने वाली रश्मियों एवं ऊर्जाओं का संयुक्त प्रभाव रहता है। वास्तु में भूखंड के बीच का जो स्थान होता है उसे ब्रह्म स्थान कहते हैं। भूखंड के आकार के अनुसार इनकी स्थिति घटती या बढ़ती है। ब्रह्म स्थान किसी भी भूखंड का केन्द्र होता है इसे ऊर्जा का केन्द्र बिंदु माना गया है। ब्रह्म स्थान वास्तु पुरूष की नाभि के आस-पास का क्षेत्र पेट, गुप्तांग और जांघों का स्थान है। ब्रह्म स्थान वास्तु पुरूष और भूखंड के, फेफडे़ और हृदय स्थल का भाग है। अतः इस स्थान को खुला और भाररहित रखें। यदि घर में रहने वाले लोग सुख-समृद्धि के साथ स्वस्थ एवं खुशहाल रहते हुए अपना जीवन यापन चाहते हों तो ब्रह्म स्थान पर किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य नहीं करना चाहिए। प्र0- मर्म स्थान से क्या समझते हैं ? उ0-वास्तु में ब्रह्म स्थान के बीच के पांच क्षेत्र अतिमर्म स्थान के अंतर्गत आते हैं। उसके बाद भूखंड के अंदर के बतीस क्षेत्रों को मर्म स्थान माना जाता है। इस स्थान पर किसी भी तरह का निर्माण कार्य नहीं करना चाहिए। खंबो एवं दीवारों का निर्माण वर्जित है। अन्यथा वास करने वाले शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक रूप से पीड़ित रहेंगे। चित्र में गहरे बडे़ बिंदु के द्वारा अतिमर्म एवं छोटे बिंदु के द्वारा मर्म स्थान को दर्शाया गया है। प्र0-वास्तु में दिशाओं का निर्धारण कैसे करते हैं ? उ0- वास्तु में दिशाओं का निर्धारण दिशा सूचक यंत्र के द्वारा भूखंड के मध्य भाग अर्थात् केन्द्र में रखकर किया जाता है। दिशा सूचक यंत्र में एक चुंबकीय सूई होती है जो धुरी पर स्थित होती है। इस सुई पर एक तरफ लाल निशान होता है जो उत्तरी भाग को सूचित करता है एवं दूसरी ओर काला निशान होता है जो दक्षिण दिशा को सूचित करता है। किसी भी भूखंड के मध्य में जाकर इस चुंबकीय कंपास को हथेली या जमीन के मध्य भाग पर एक मिनट तक स्थिर रखते हैं। चुंबकीय सुई के लाल भाग हमेशा अपने उत्तरी भाग की ओर स्थिर हो जाता है जो स्पष्ट रूप से उतर दिशा को दर्शाता है। तदुपरांत चुंबकीय कंपास के लाल सूई को 0 डिग्री या 360 डिग्री पर स्थित करके सभी दिशाओं की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। उतर दिशा की तरफ मुंह कर खडे़ हो जाएं और दोनों हाथ को दाएं एवं बाएं हाथ की तरफ करें। दाएं की तरफ पूर्व दिशा एवं बाएं हाथ की तरफ पश्चिम की दिशा हो जाएगी और आपकी अपनी पीठ की तरफ दक्षिण की दिशा होगी। इस तरह चुंबकीय कंपास के द्वारा सही तरीके से दिशाओं का निर्धारण किया जाता है। प्र0- क्या मनुष्य का जीवन वास्तु और ग्रह-नक्षत्र दोनों से प्रभावित होता है ? उ0- मनुष्य का जीवन वास्तु और ग्रह-नक्षत्र दोनों से ही सामान्य रूप से ही प्रभावित होता है। मनुष्य का ग्रह-नक्षत्र अच्छा है लेकिन उनकी वास्तु खराब है तो प्रयासों के बावजूद पूर्ण सुख-समृद्धि नहीं मिल पाती है। यदि ग्रह-नक्षत्र खराब हो एवं वास्तु अनुकूल हो तो परेशानियॉं कम होगी लेकिन खत्म नही होगी। यदि ग्रह-नक्षत्र एवं वास्तु दोनों खराब हों तो मनुष्य जीवन भर संघर्षपूर्ण स्थिति से निजात नही पाता। इसके विपरीत ग्रह-नक्षत्र के साथ-साथ वास्तु अच्छी रहने पर अधिकतम सुख सुविधा के अनुसार जीवन यापन करता है। मनुष्य अपने ग्रह-नक्षत्र को तो बदल नहीं सकता परंतु वास्तु की सहायता से अपने प्रयत्नों के द्वारा इसे संवार सकता है। वास्तु में प्रत्येक दिशा किसी न किसी ग्रह से शासित होती है। अतः दिशाओं के शुभ और अशुभ रहने पर ग्रहों के प्रभाव में भी असर आता है इसलिए कहा जाता है कि वास्तु में दिशाओं को ठीक रखें अन्यथा तत्संबंधी ग्रहों के प्रभाव में भी प्रतिकूलता आ जाएगी। यदि आपको अपनी दशा में बदलाव लाना है तो उस दिशा को ठीक कर डालें। आपकी दशा में अवश्य सुधार हो जाएगा।


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