वास्तु की नजर में गया एवं बोध् गया

वास्तु की नजर में गया एवं बोध् गया  

किसी भी शहर के सुव्यवस्थित वास्तु पर उस शहर का समृद्धि एवं विकास निर्भर करता है। अतः शहर वास्तु के अनुरूप हो, तो उस शहर का विकास चरमोत्कर्ष पर होता है। जहां तक बोध गया एवं गया का सवाल है, यह एक प्राचीन, धार्मिक एवं ऐतिहासिक शहर है, जिसकी इतिहास काफी पुराना है। गया में प्राचीन मंदिरों का अक्ष्य भंडार है, जो कि अपनी प्राचीनता, धार्मिकता के कारण विश्व में विख्यात है। यही वह जगह है, जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। बिहार प्रदेश के गया रेलवे स्टेशन से 11 कि. मी. दक्षिण बौद्धों का सर्वश्रेष्ट तीर्थ स्थल बोध गया स्थित है, जो कि भौगोलिक दृष्टिकोण से 24.41.45 अक्षांस एवं 85.2.4 रेखांश पर स्थित है। भगवान बुद्ध की ज्ञान प्राप्त करने के पूर्व यह स्थान उखेल अथवा उरूवेला के नाम से प्रसिद्ध था। परंतु बाद में यह बौद्धी मंडप के पान से प्रसिद्ध हुआ। राजकुमार सिद्धार्थ के ज्ञान प्राप्त करने के उपरांत बोध गया के नाम से जाना जाता है। बोध गया भारतवर्ष का वह धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल है, जिस गौरव भगवान बुद्ध के समय से आज तक अक्षुण्य बना हुआ है, जिसका प्रमुख कारण वास्तु के दृष्टि में वास्तु के अनुरूप बना हुआ है। जो इसकी कृति, गौरव एवं इसकी उत्कृष्टता को विश्व विख्यात बनाये हुए हैं। बोध गया का सबसे महत्त्वपूर्ण स्मारक महाबोधि मंदिर है, जो बोध गया के दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित है। इस मंदिर का आकार वर्गाकार है। मंदिर के चारों ओर काफी खुली हुई जगह है। हलांकि वर्तमान समय में मंदिर का गर्भगृह मुख्य सड़क से काफी नीचे हो गया है, जो कि वास्तु के अनुरूप नहीं है। सड़क से मंदिर में प्रवेश करने के लिए ईशान कोण से रास्ता है और मंदिर के गर्भ में भगवान बुद्ध की सोने जैसे चमकदार एक मूर्ति है, जो भूमि स्पर्श की मुद्रा में है। जिसका मुख पूर्व दिशा की ओर है , जिनके मस्तिष्क तिलक से सुशोभित है। पूरे मंदिर की रचना पत्थर की ईंट से किया गया है, जिस पर चूने का प्लास्टर किया गया है। इस स्थान पर प्राप्त एक शिलालेख, जो कि 948 ई. में लिखा गया है, जिससे ज्ञात होता है कि इस मंदिर की रचना विक्रमादित्य के राज्य सभा के प्रसिद्ध नौरत्नों में से एक अमर देव ने करवाई थी, जो कि कालीदास और वराह मिहिर के समकालीन थे। इसके अतिरिक्त इसी स्थान से प्राप्त एक दुसरे अभिलेख से ज्ञात होता है कि मूल मंदिर की रचना सम्राट अशोक ने करवाया था। मुख्य मंदिर के गर्भगृह के पश्चिम में विख्यात बौद्धी वृक्ष है, जिसके नीचे पूर्व मुख कर, तपस्या कर संन्यासी सिद्धार्थ दिव्य ज्ञान को प्राप्त किए। यह वृृक्ष लगभग 100 फीट ऊंचा है। हिंदुओं ने भगवान बुद्ध को विष्णु का दशम अवतार माना है। यहां दक्षिण भारत के पिंडदानी पूर्वजों के आत्मा की शांति हेतु पिंडदान भी करते हैं। मुख्य मंदिर के पश्चिम, उत्तर एवं पूर्व में लोहे के बड़े-बड़े गेट लगे हुए हैं, हलांकि वर्तमान में पूर्वी गेट का इस्तेमाल किया जा रहा है। मंदिर के चारों ओर परिक्रमा करने के लिए पर्याप्त जगह है। जगह-जगह छोटे-छोटे प्रकृतियां पूरे मंदिर के शोभा में वृद्धि कर रही है। मुख्य मंदिर के दक्षिण की ओर एक सरोवर है, जो कि वास्तु की दृष्टिकोण से अच्छा नहीं है। मंदिर की मुख्य द्वार के ठीक सामने पानी पीने के लिए एक वाटर कुलर लगा हुआ है। मुख्य मंदिर से लगभग 200 गज की दुरी पर पूर्व दिशा में दक्षिण से उत्तर निर्जना अथवा लीलाजन एक विशाल नदी बहती है, जिसे वर्तमान में फल्गु के नाम से जाना जाता है। बोध गया के उत्तर-पूर्व में बहने वाली यह नदी बोध गया के प्रसिद्धि एवं विकास के लिए महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है, साथ ही मुख्य मंदिर के सड़क से उत्तर एवं पूर्व क्षेत्रों का ढलान लिए हुए होना बोध गया के देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। मुख्य मंदिर के दक्षिण एवं पश्चिम में तिब्बतीय मंदिर, नौलखा मंदिर, भुटान की मंदिर स्थापित है, साथ ही 80 फीट भगवान बुद्ध की विशाल पूर्वमुखी प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा के उत्तर एवं पूर्व में काफी खुली हुई जगह है, जो देशी एवं विदेशी शैलानियों के लिए अपनी स्थापत्य कला के खातीर विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। मुख्य मंदिर की उत्तर की ओर एक तिब्बतीय रिफ्यूजी मार्केट है, जहां पर शरद ऋतु में लाखों करोड़ों का कारोबार होता है। देखा जाय तो बोध गया का वास्तु करीब-करीब वास्तु के अनुरूप जान पड़ती है, जो कि अपनी जिवंतता, सजीवता एवं विकास का ज्वलंत उदाहरण दिए अपना प्रमाण स्वयं प्रस्तुत कर रहा है। गया शहर भौगोलिक दृष्टिकोण से 24-48 उत्तर 85-0-0 पूर्व पर स्थित हैं यह नगरी भगवान विष्णु की नगरी के रूप में जानी जाती है। गया के दक्षिण - पूर्व में विष्णु मंदिर, दक्षिण मां मंगला का प्रसिद्ध शक्ति स्थल, उत्तर में मां बंगला का प्रसिद्ध शक्ति स्थल एवं रामशिला पहाड़, दक्षिण पश्चिम में ब्रह्मयोणी एवं मिलिट्री कैंट की पहाड़ एवं पूर्व में विशाल फल्गु नदी स्थित है, जो ये सारे तथ्य गया को मिश्रित प्रभाव से प्रभावित कर रहा है। गया के संबंध में कहा जाता है कि गया का पांच कोस में विस्तार है। दक्षिण में बोध गया से ले कर उत्तर में प्रेतशिला पहाड़ तक जाना जाता है। विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के 13” की पदचिह्न स्थित है। विष्णुपद मंदिर में पितरों की आत्मा की शांति हेतु पूरे भारतवर्ष से हिंदु पिंडदान करने आते हैं। गया के पूर्व में विशाल फल्गु नदी गया के विकास, यश एवं प्रतिष्ठा के लिए चार चांद लगा रहा है , जिसके फलस्वरूप पूरे भारतवर्ष में गया को गया जी के नाम से प्रसिद्धि मिली है। गया के दक्षिण पश्चिम में ब्रह्मयोणी पहाड़ एवं मिलिट्री कैंट पहाड़ इसके स्थायित्व एवं विकास की कहानी बता रहा है। गया के उत्तर में राम शिला पहाड़ का होना वास्तु के दृष्टिकोण से अच्छा नहीं है, जो कि इसके आर्थिक प्रगति में बाधक बनी हुई है। खास कर उत्तरी क्षेत्रों में निवास करने वालों के लिए उत्तर का क्षेत्र का बंद होना उनके प्रगति एवं आर्थिक विकास के लिए अच्छा नहीं है। उत्तर क्षेत्र के अपेक्षाकृत दक्षिण क्षेत्र वालों का अर्थिक स्थिति अच्छा रहेगा, क्योंकि उनके उत्तर एवं पूर्व क्षेत्रों का अत्याधिक खुला होना है। गया के पूर्व में नदी के उस पार मानपुर है, जो कि गया का हिस्सा है। फल्गु नदी गया के समृद्धि के लिए अच्छा फल, दे रहा है, परंतु मानपुर के लिए अच्छा फल नहीं दे रहा है। क्योंकि मानपुर के पश्चिम में नदी एवं खुला होना, मानपुर के समृद्धि एवं स्थायित्व के लिए अच्छा नहीं है।


रिसर्च जर्नल आरंभिक विशेषांक  जनवरी 2004

अपने विचार व्यक्त करें

blog comments powered by Disqus
.