नाजायज होकर भी जायज

नाजायज होकर भी जायज  

कई बार जीवन में ऐसे मोड़ आते हैं कि व्यक्ति नहीं चाहते हुए भी कुछ नाजायज कर बैठता है और समय का बदलाव उसे जायज ठहरा देता है। ऐसी ही एक सत्य घटना का वर्णन किया गया है इस लेख में। देखते हैं ऐसी घटनाओं को ज्योतिषीय दृष्टि से। दिदिशा के विवाह को एक वर्ष हो चला था। अब उसकी सासु मां और मां दोनों ही मजाक-मजाक में उससे कई बार कह चुकी थीं कि बहुत मस्ती कर ली, अब हमें भी कुछ अपने नाती से मस्ती करने का मौका दो। दिशा शर्मा कर रह जाती। दिशा और निशीथ दोनों ने यही सोचा था कि एक साल खूब घूमेंगे, फिरेंगे और मस्ती करेंगे और एक साल के बाद ही अपनी गृहस्थी को आगे बढ़ायेंगे। इसलिए दोनों ने यही फैसला किया कि अब उन्हें दो से तीन हो जाना चाहिए। दिशा को बच्चे वैसे भी बहुत प्रिय थे। अपने विवाह से पहले उसके भाई का बेटा भी उसी के साथ चिपका रहता था और वह भी उसे जीजान से प्यार करती थी। अब दिशा एक प्यारे से बच्चे के सपने देखने लगी और उसे लगा कि वह शीघ्र ही मातृत्व का सुख उठाने के लिए तैयार हो गयी है। इसी तरह छः महीने बीत गये तो दिशा को काफी चिंता होने लगी और निशीथ को उसने अपनी चिंता बताई तो उसने काम का अधिक बोझ कहकर बात टाल दी। और उसके साथ कश्मीर घूमने का प्रोग्राम बना लिया। वहां पर दस दिन की मौज-मस्ती करने के बाद दिशा काफी खुश व शांत थी। इसी तरह छः महीने और बीत गये। अब तो उसकी मां और सासु मां दोनों ही प्रश्न भरी दृष्टि से उसे देखने लगीं और उन्होने डाॅक्टर के पास जाने की भी सलाह दे दी। दिशा और निशीथ ने जब डाॅक्टर से सलाह ली तो पता चला कि निशीथ के शुक्राणु बहुत कम हैं जिससे दिशा गर्भ धारण नहीं कर पा रही है। दिशा को जबरदस्त धक्का लगा। यह बात वह सबको खुलकर भी नहीं बता सकती थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी प्रतिक्रिया कैसे दिखाए। वह निशीथ को भी परेशान नहीं करना चाहती थी क्योंकि कमी तो दोनों में से किसी में भी हो सकती है। दिशा ने निशीथ को बहुत समझाया कि वह चिंता न करे, वही उसके लिए सबकुछ है और उसे बच्चों की कोई जरूरत नहीं है। वह सासु और मां दोनों को संभाल लेगी। घर आकर उसने किसी को कुछ नहीं बताया और वही कहा कि डाॅक्टर ने सब कुछ ठीक बताया है, काम के तनाव की वजह से ही देरी हुई है। और अकेले में जाकर दिशा खूब रोई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अपना दुःख किससे कहे। इसी तरह समय बीतने लगा। आस-पड़ौस में छोटे बच्चों को देखकर दिशा के दिल में शूल से चुभने लगते, वह उन पर अपना ढेर सा प्यार लुटाती और अंदर ही अंदर उसका दिल रोता कि क्या वह कभी अपने बच्चों को नहीं खिला पाएगी। अपने गम को भुलाने के लिए वह आॅफिस में देर तक बैठी रहती और घर की बजाए उसे आॅफिस ज्यादा अच्छा लगने लगा। इसी दौरान उसके सहकर्मी तन्मय से उसकी अच्छी दोस्ती हो गई। वह उस शहर में नया था। इसलिए दिशा उसे शहर घुमाने भी जाती, कभी किसी माल में या किसी ऐतिहासिक स्थल पर घूमना दोनों को अच्छा लगता। इधर निशीथ की डाॅक्टर से दवाई बराबर चल रही थी और उसे विश्वास था कि दवाइयों का असर जरूर दिखाई देगा। इसके अतिरिक्त कितने ही ताबीज, गंडे व ज्योतिषीय उपचार भी चल रहे थे। एक दिन अचानक दिशा को आॅफिस में ही रुकना पड़ा। यू.एस.बेस्ड कम्पनी होने के कारण उन्हें रात को काफी देर तक काम करना पड़ता था। तन्मय भी आॅफिस में ही था और रात को एकांत में दोनों ही अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाए और दिशा ने अनजाने में खुद को तन्मय को सौंप दिया। काफी दिनों तक दिशा एक अपराध बोध से युक्त रही, निशीथ वैसे ही उससे ज्यादा कुछ पूछता नहीं था इसलिए सब कुछ पूर्ववत चल रहा था कि अचानक एक महीने जब दिशा की तबियत खराब हुई और डाॅक्टर ने खुश खबरी सुनाई तो निशीथ खुशी से पागल हो गया। उसने मंदिर में, घर में, आॅफिस में सब जगह मिठाई बंटवाई और हर जगह से बधाई के संदेश मिलने लगे। दिशा चाहकर भी उससे कुछ नहीं कह पाई। वह उसकी खुशी को कायम रखना चाहती थी। उसे लगने लगा, शायद उससे जो अनजाने में हो गया, वह शायद अच्छे के लिए ही हुआ है। उसे महाभारत की घटना याद हो आई जहां महर्षि वेद व्यास ने शांतनु की पुत्र वधुओं को दृष्टि मात्र से गर्भवती किया था। उसे लगा, जब हमारे पुराणों में इस कृत्य को मान्यता-प्राप्त थी, तो आज कलयुग में यह कोई पाप नहीं है। इसी तरह मन को समझाकर वह चुप रही और अपने आने वाले बच्चे की खुशी में खो गई। समय पर दिशा ने एक पुत्र को जन्म दिया और इसी बीच उसने अपनी नौकरी बदल ली और तन्मय से भी संबंध नहीं रखे और न ही उसे भनक भी लगने दी। अब दिशा का परिवार बहुत खुश था। अचानक कुछ वर्ष बाद दिशा को अकेले ही आॅफिस की तरफ से विदेश जाना पड़ा और वहां पर उसकी दोस्ती और संबंध एक और नवयुवक से हुए। दिशा अब एक बच्चे से संतुष्ट नहीं थी। वह एक बच्चा और चाहती थी, इसलिए उसने भारत आने का पंद्रह दिन का प्रोग्राम बनाया ताकि जब वह विदेश से एक साल बाद आए तो दूसरे बच्चे को भी निशीथ का नाम दे सके। आईये, देखें दिशा की जन्म कुंडली के ग्रहों की चाल जिसके कारण उसकी दोनों नाजायज संतान जायज कहलाईं। दिशा की कुंडली में लग्नेश शुक्र दशम भाव में केतु के साथ शनि और राहु से दृष्ट होकर स्थित है। शुक्र के ऊपर तीन पापी ग्रहों की दृष्टि है जिसके कारण वह अपनी इच्छा पूर्ति के लिए सामाजिक व्यवस्था से प्रतिकूल, साहस भरा कदम उठाने से नहीं हिचकचाती। 0 अंश का सप्तमेश मंगल द्वादश भाव में लाभेश सूर्य तथा व्ययेश बुध के साथ युति बना रहे हैं तथा सप्तम भाव पर मंगल तथा गुरु की दृष्टि है अर्थात् उसके अपने पति से भी अच्छे संबंध हैं, पर अन्यत्र संबंधों से भी वह लाभ उठा रही है। चंद्र लग्न से विचार करें तो सप्तमेश सूर्य अष्टम भाव में बुध और मंगल के साथ स्थित है जो उसके दूसरे संबंधों की तरफ इशारा करते हैं। संतान भाव के स्वामी शनि अष्टम में बैठकर दशम दृष्टि से अपने घर पंचम भाव को पूर्ण दृष्टि से देख रहे हैं। मन का कारक चंद्र दशमेश होकर पंचम भाव में बैठे हैं और संतान कारक गुरु स्व राशि धनु में स्थित है अर्थात् भाव, भावेश, भाव कारक तीनों की स्थिति संतान प्राप्ति के लिए अनुकूल है। इसलिए उसको बच्चों से अत्यधिक प्रेम है तथा संतान प्राप्ति में बाधा होते हुए भी उसे स्वयं के प्रयास से संतान प्राप्त हुई। कुंडली को गहराई से जांचे तो कर्म भाव का स्वामी चंद्रमा पंचम भाव में स्थित होकर लाभ भाव को देख रहे हैं। इसी भाव से मित्रों का भी विचार होता है अर्थात शनि से दृष्ट शुक्र और केतु अधिष्ठित राशि का स्वामी चंद्र, मित्र एवं लाभ भाव को देख रहा है। पंचम भाव, पंचमेश, दशम भाव, दशमेश, लग्नेश व एकादश भाव का संबंध यही दिखाता है कि दिशा को अपने कर्म क्षेत्र के मित्र से संतान सुख का लाभ प्राप्त हुआ और इसमें उसका स्वयं का निर्णय ही महत्वपूर्ण था। नवांश में लग्न में मंगल, राहू तथा शुक्र की स्थिति उसकी जबरदस्त निर्णय शक्ति को भी दिखाती है और चूंकि कोई भी ग्रह गुरु से दृष्ट नहीं है इसलिए वह सामाजिक दायरे की परवाह न करते हुए अपने अनैतिक निर्णय को भी सही करार देती है। दिशा की कुंडली में पंचमेश शनि से पंचम में पाप ग्रह मंगल सूर्य तथा बुध तीन पाप ग्रह स्थित हैं जो लग्न से द्वादश और पंचम से अष्टम स्थिति में बैठे हैं। इसीलिए दिशा की बुद्धि ने इस प्रकार का निर्णय लिया। चूंकि सप्तम भाव गुरु से दृष्ट है इसीलिए उसको अपने पति से भी सहयोग मिल रहा है और उसकी नाजायज संतान को जायज संतान का दर्जा मिल रहा है।


मुहूर्त विशेषांक   जून 2011

जीवन की महत्वपूर्ण कार्यों जैसे-विवाह, गृह प्रवेश, नया पद या नई योजना के क्रियान्वयन के लिए शुभ मुहूर्त निकालकर कार्य करने से सफलता प्राप्त होती है और जीवन सुखमय बनता है व बिना मुहूर्त के कार्य करने पर निष्फलता देखी है। इस विशेषांक मे बताया गया है

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