जाग्रत महिमामयी देवी तीर्थ कन्याकुमारी

जाग्रत महिमामयी देवी तीर्थ कन्याकुमारी  

जाग्रत महिमामयी देवी तीर्थ कन्याकुमारी डॉ. राकेश कुमार सिन्हा 'रवि' भारतवर्ष में ऐतिहासिक, पौराणिक और धार्मिक महत्व वाले कई क्षेत्र और तीर्थ स्थल हैं जिनमें दक्षिण में अवस्थित कन्याकुमारी (कन्निया कुमारि) का अपना विशिष्ट महत्व है। पुरातन महत्व के इस स्थान को प्राच्यकाल में 'सागरतीर्थ' और आगे खासकर अंग्रेजों के जमाने में कैप कोमोरिन कहा जाता था। देश के दक्षिण प्रक्षेत्र को सूचित करने वाली दो शिलायें यहीं हैं जिनमें एक को मातृतीर्थ और दूसरे को पितृतीर्थ कहा जाता है। तीन रंग यथा लाल, हरे और मटमैले रंग के जल और बालुका राशि का एक ही साथ दर्शन करना यहां की सबसे बड़ी खासियत है। पूर्व में बंगाल की खाड़ी, दक्षिण में हिंद महासागर और पश्चिम में अरब सागर की मिलन-स्थली ही आज का कन्याकुमारी है जो एक अंतरीप है और इसकी गणना भारतवर्ष के पुण्य स्थलों में की जाती है। पर्यटन दृष्टि से वैसे तो कन्याकुमारी और इसके आसपास समृद्ध दर्शनीय स्थलों की कोई कमी नहीं, पर इस नगर की नगरदेवी माँ कुमारी की बात ही कुछ और है। यही कारण है कि यहां आने वाले माँ के इस मंदिर का दर्शन-पूजन अवश्य करते हैं जिसे कुमारी अम्मान मंदिर कहा जाता है। विद्वानों की राय में जिस प्रकार उत्तर में श्री वैष्णोदेवी तीर्थों का मुकुटमणि है, ठीक उसी प्रकार यह मंदिर दक्षिण में प्रतिष्ठा प्राप्त है। इतिहास के पन्नों पर चोल, चेर और पाण्ड्य राजवंशों की पवित्र नगरी कन्याकुमारी धार्मिक दृष्टिकोण से भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। विवरण मिलता है कि चक्रवर्ती सम्राट भरत के आठ पुत्र और एक पुत्री थी। आगे के समय में राजा ने पूरे देश को नौ भागों में विभक्त कर सबसे दक्षिणी भाग पुत्री को सौंप दिया। तब उस क्षेत्र विशेष का नाम कुमारि (कुमारीनाडु) पड़ा जिसे पूर्व काल में 'कुमारिनपार्द' भी कहा जाता था। प्राचीन केरल प्रदेश के इसी तट पर पराशक्ति, कन्या का रूप धारण करके तपस्या करती थी, इस कारण इसका नाम कन्याकुमारी पड़ा। यहां से संबद्ध एक पुराण की कथा का सार कुछ इस प्रकार है कि राक्षस भाणासुर (कहीं-कहीं बाणासुर) के संहार के लिए देवी अम्मवण्णी (कन्याकुमारी) का अवतरण हुआ है। विवरण मिलता है कि अखिल विश्व में आतंक मचाने वाले बाणासुर को शंकर जी का वरदान प्राप्त था कि तुम कन्याकुमारी कन्या के अलावा सबपर अजेय रहोगे। इधर देवी ने प्रकट होने के पश्चात् देवाधिदेव महादेव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या प्रारंभ की जहां शिला पर सती के पद-चिह्न का अंकन आज भी देखा जा सकता है। शंकर जी से स्वीकृति मिलने पर विवाह की बात तय हो गयी, पर ब्रह्मा सहित समस्त देवगण को यह चिंता थी कि अगर यह विवाह हो गया तो भाणासुर का संहार संभव न हो सकेगा। इस कारण देवकृपा का फल कहें कि शंकर जी का डोला शुचीन्द्रम में ही रुका रह गया और देवी कुमारी ही रह गई। इधर शुभ मुहूर्त भी टल गया। इस प्रकार देवी कुमारी ही रह गयी और कन्याकुमारी के नाम से प्रसिद्ध हो गई। जन विश्वास व धार्मिक तथ्य है कि देवी का विवाह कलियुग के बाद फिर होगा। इधर जब भाणासुर ने देवी के रूप व सौंदर्य की प्रशंसा सुनी तो वह देवी से विवाह करने का हठ करने लगा। इस कारण हुए युद्ध में अन्ततः देवी ने उसकी इति श्री कर दी। तब से यह क्षेत्र माई के पूजन-अर्चन का विशिष्ट केंद्र बन गया है जिसकी परंपरा आज भी जारी है। द्वादश देवी प्रधान तीर्थों में तृतीय स्थान पर विराजमान मां का यह मंदिर तमिलनाडु राज्यांतर्गत कन्याकुमारी जिले के निम्नतम छोर पर विशाल घेरे के अंदर सुशोभित है- केरले तु कुमारी सा अम्बाऽवर्तेषु संस्थिता॥ (त्रिपुरा रहस्य, माहात्म्य खंड 48/61-65) विवरण मिलता है कि प्राच्य काल में इस मंदिर के चार दरवाजे थे जो चारों दिशाओं में खुला करते थे। आज इनकी संखया तीन है जिनमें एक प्रधान प्रवेश द्वार है। एक द्वार जो समुद्र की ओर खुलता था, बंद कर दिया गया है। यहां समुद्र तट के स्नान घाट पर एक छोटा मंदिर है। उसके दर्शन के पश्चात् ही माँ कुमारी का दर्शन किया जाता है जहां प्रत्येक पुरुष के लिए शर्ट, गंजी, कुरता आदि ऊपरी परिधान खोलकर ही देवी दर्शन करने की परंपरा है। भारतवर्ष के पुराने, दुरुस्त और विशाल मंदिरों में से एक इस मंदिर में स्थापित माता की मूर्ति अत्यंत आकर्षक व प्रभावोत्पादक है जहां की पूजार्चना व श्रृंगार करने का श्रेय आदिकाल से केरल के नंबुद्री ब्राह्मण परिवार को प्राप्त है। कहा जाता है कि माता की नाक में जो हीरे की सींक है, उसकी रोशनी इतनी तेज हुआ करती थी कि प्राच्य काल में कितने ही नौकायान व जलबेड़े इससे भ्रम में पड़ जाते थे। विशेष अवसरों पर सुवर्ण-हीराकार रत्नों से देवी का श्रृंगार होता है। स्वीकार किया जाता है कि सती के शरीर का पृष्ठ भाग यहीं गिरा था। धर्मज्ञों की राय में माता कन्याकुमारी दयामयी हैं जो सोलह कलाओं से परिपूर्ण व सफल शुभकारिणी हैं। मुखय मंदिर प्रवेश क्रम में ही द्वार के पास भैरव का दर्शन होता है। मंदिर के निकट पूर्व दिशा में बंगाल की खाड़ी के तट पर 'गायत्री, सावित्री, सरस्वती, कन्या, विनायक तीर्थ आदि हैं तो पश्चिम दिशा में अरब सागर के किनारे स्थाणु तीर्थ हैं। दक्षिण में हिंद महासागर के किनारे मातृ, पितृ व भीमातीर्थ का स्थान है। इस विशाल देवी मंदिर के अंदर बहुत सारे देवालय हैं जिनमें महादेव मंदिर, भद्रकाली मंदिर, अयप्पा स्वामी, इंद्रकांत विनायक, चक्रतीर्थ आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा श्रीतीर्थ, मंडूक तीर्थ और पाप विनाशम् पुष्पकरणी यहां की शोभा को द्विगुणित कर रहे हैं। कन्याकुमारी के समुद्रतटीय आकर्षण में श्री विवेकानंद मेमोरियल हॉल, तिरुल्लुर की विशाल मूर्ति, श्री गांधी मंडप व संग्रहालय आदि का प्रमुख स्थान है। कुल मिलाकर देश की दक्षिणतम् सीमा पर स्थापित यह मंदिर दर्शनीय है, पूजनीय है और वंदनीय भी जिनके चरण एक नहीं तीन-तीन सागर पखारते हैं। यह वह स्थल है जहां एक ही साथ देवी दर्शन और प्रकृति के दिव्य, नैसर्गिक व शांतिमय सौंदर्य का दर्शन किया जाता है। यही कारण है कि दक्षिण भारत दर्शन के क्रम में लोग कन्याकुमारी जरूर जाते हैं जहां देश के महानगरों के अलावा मदुरै, त्रिवेन्द्रम् व रामेश्वरम से जाया जा सकता है।


मुहूर्त विशेषांक   जून 2011

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