ऐतिहासिक देवी तीर्थ माई पद्मावती मंदिर

ऐतिहासिक देवी तीर्थ माई पद्मावती मंदिर  

भारतवर्ष के मध्यकालीन ख्यातनाम नगरों में शेरघाटी अपनी भौगोलिक बनावट और शौर्य शक्ति के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। शेरशाह के जमाने में ‘सड़क-ए-आजम’ और आज का जी. टी. रोड (राष्ट्रीय राजमार्ग-2) के किनारे और मगध की प्रसिद्ध तोया मोरहर व उसकी उपधार बुढ़िया नदी के मध्य टापू भूमि में विराजमान यह वही आरण्य क्षेत्र है जहां एक आदमखोर शेर को अपनी तलवार से दो फाड़ करने के बाद ही फरीद खां ‘शेरशाह’ की उपाधि के साथ जगत् ख्यात हुआ। आज गया जिले के अनुमंडल के रूप में प्रसिद्ध शेरघाटी में नए पुराने देवालय, नए पुराने मजार-मस्जिद, तालाब, बावली व कौलिया गढ़ के साथ कितने ही पुरातन संस्कृति के चिह्न देखे जा सकते हैं। इनमें माता पद्मावती का स्थान एक जागृत देवी पीठ के रूप में स्थापित है। शेरघाटी नगर में अवस्थित रंगलाल उच्च विद्यालय व पुराने कब्रिस्तान मार्ग से होकर यहां जाना सहज है जहां पास में ही 250 वर्ष प्राचीन एक ठाकुरबाड़ी व प्राचीन कूप भी दर्शनीय है। धर्म-इतिहास के पन्नों में चर्चित यह स्थान उत्तर पालकालीन है जहां प्रारंभिक काल में देवी पद्मावती कोल राजाओं की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजित रहीं। सल्तनत काल में भी मां की आभा प्रज्ज्वलित रही और इसी जमाने में पास के ब्राह्मण परिवारों की तरफ से माता जी की पूजा अर्चना की जाने लगी जो अभी तक निर्बाध रूप से जारी है। इसी मंदिर से थोड़ी दूर पर शेरघाटी के हिंदू जमींदार की विशाल हवेली के अंशावशेष व उसके मध्य विराजमान ‘दुल्हिन मंदिर’ का दर्शन किया जा सकता है जिसका निर्माण पुराने ब्रह्म स्थान पर सन् 1888 ई. में किया गया। उस समय में भी पद्मावती से जुड़े मार्ग व मंदिर में कुछ कार्य किए जाने का विवरण प्राप्त होता है। आज पुजारी वर्ग और जन सहयोग से मंदिर प्रगति पथ पर अग्रसर है। लोकमानस में यह धारणा बलवती है कि मातृ कृपा से हरेक असहज कार्य भी पूर्ण हो जाते हैं। यहां की माता जी का नाम पद्मावती क्यों है? इस बात पर चर्चा करने से ज्ञात होता है कि कोलराज की पुत्री के नाम पर ही माता जी का नाम प्रकाशवान है। ऐसे माता-पद्मावती का एक मंदिर तिरूपति तीर्थ में भी है जिसे तिरूपति बाला जी की अधिष्ठात्री शक्ति स्वीकारा जाता है। प्रधान मार्ग जो गोला बाजार तक जाता है, को छोड़ कर उपमार्ग पर आधे किलोमीटर दूरी तय करके मातृ तीर्थ पर पहंुचते ही प्राचीनता का स्पष्ट आभास होता है। मंदिर शिखर विहिन भवननुमा है जो दो कक्ष में विभाज्य व लाल रंग से लेपित है। अंदर के कक्ष में माता जी ऊंचे पाठपीठ पर वस्त्राभूषणों से सुसज्जित आशीर्वाद मुद्रा में विराजमान हंै जिनके मस्तक के ऊपर चांदी का छत्र शोभायमान है। मूत्र्त विग्रह के दोनों तरफ पाद खंड में ‘जया’ और ‘विजया’ तथा नीचे दो पंक्ति में ब्राह्मी लिपि का अंकन है जो अपठनीय और उत्तर गुप्तकालीन लिपि से साम्य है। इस कक्ष के बारह दरवाजे के कोने पर श्रीराम दरबार का दर्शन किया जा सकता है जहां अष्टधातु के राम, लक्ष्मण, जानकी व हनुमान स्थापित हैं। आगे में दीवार में ताखे बनाकर खड्गधारिणी मां, सूर्य व बुद्ध की प्रतिमा रखी गई है। एक ताखे में आस-पास के पुरातन चिह्न, शालीग्राम व तीन शिवलिंग के अवशेष देखे जा सकते हैं। इस देवालय में शिवशंकर का मूल स्थान धरती से करीब तीन फीट नीचे है जहां 65 इंच लंबाईयुक्त पालकालीन शिवलिंग का दर्शन किया जा सकता है। पास में ही दो अन्य शिवलिंग पूजित है पर बड़े लिंग का ऊपरी भाग भी कमलदल से ऐसे सजा दिया गया है कि उसकी शोभा द्विगुणित हो गयी है। मंदिर में भक्तों के सहायतार्थ उपस्थित माता जी उमा देवी बताती हैं कि लोक मानस में ‘पदमौती स्थान’ के रूप में चर्चित यह देवी स्थान बारह सौ वर्ष से भी ज्यादा प्राचीन है। लोग मनिता पूरण के बाद घी, धूप, सिंदूर चुनरी व मिष्टान्न भोग अर्पित कर माता पद्मावती की पूजा हर्षोल्लास से करते हैं। साल के दोनों नवरात्र, हरेक मंगलवार व शनिवार को यहां दूर-दूर से लोग आते ही हैं पर प्रत्येक दिन भी यहां पूजा करने वालों की संख्या कोई कम नहीं है। मंदिर के बाहर पुरातन वृक्ष के जड़ के पास मनौति स्तूप, बुद्ध फलक और प्राचीन मूर्तियों के अंश देखे जा सकते हैं। मगध विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग से जुड़े डाॅ. मारूति नंदन पाठक का मानना है कि जिस टापू भूमि में शेरघाटी विराजमान है उसके मध्य बिंदू में मां का यह स्थान नगर के विकास, प्रगति व अन्यान्य कार्यों का साक्षी रहा है। मां की महिमा देखें कि शेरघाटी के अंग्रेज अधिकारी और इस्लाम धर्म से सरोकार रखने वाले निवासी भी मां की महिमा के समक्ष नतमस्तक रहा करते हैं। यही कोई 20 वर्ष पूर्व तक मां का यह स्थान खपड़ैल भवन में शोभित था जिसकी दीवारें मिट्टी और पाषाण खंडों की बनी थी पर अब नवशृंगार के बाद यहां का कलेवर ही बदल गया है। मां की इस मूर्ति को महालक्ष्मी स्वरूपा स्वीकारा जाता है जहां कंधे के नीचे भैरव जी का स्थान देखा जा सकता है। अष्टभुजी मां की यह प्रतिमा ऐसे चमकदार पत्थर से बनी है कि आज इतने वर्षों के बाद भी मातृ विग्रह की आभा ज्यों की त्यों है। शेरघाटी नगर के दोनों तरफ प्रवाहमान मोरहर व बुढ़िया नदी के मध्य मार्ग में विराजमान इस देवी तीर्थ से कोलिया गढ़ भी एक किलोमीटर दूरी के अंदर ही है जहां आज भी मिट्टी की उंची ढेर, दीवार व गुप्त द्वार देखा जा सकता है। इस स्थल से प्राचीन देव विग्रह, सिक्के और मृदभांड भी मिलते रहते हैं जिनमें कृष्ण लौहित मृद्भांड, चित्रित मृद्भांड व लौहित मृद्भांड प्रमुख हंै। शेरघाटी नगर के प्राचीन आबादी के मध्य अवस्थित इस देवी तीर्थ के भक्त स्थानीय और बाहरी दोनों हैं। वर्ष 1269 ई. तक यह क्षेत्र रामगढ़ जिला के अधीनस्थ था। यही कारण है कि रामगढ़ क्षेत्र में मां के कितने ही भक्त रहा करते हैं। सचमुच गुण-महिमा व यश, कीर्ति के कारण प्रसिद्ध माता जी का यह स्थान देखने लायक है जहां भक्तों के नित्य आगमन से गहमागहमी बनी रहती है।

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