महिमामयी महारानी संभलेश्वरी भवानी

महिमामयी महारानी संभलेश्वरी भवानी  

महिमामयी महारानी संभलेश्वरी भवानी डॉ. राकेश कुमार सिन्हा 'रवि' अति प्राचीन काल से भारत की सभ्यता संस्कृति में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन करने वाला 'भारत का फ्लोरिज़' के नाम से विखयात प्राचीन कलिंग व बाद में उत्कल के नाम से प्रसिद्ध आज का उड़ीसा अपने कई खयातनाम तीर्थों के लिए विश्वविश्रुत रहा है उनमें मां संभलेश्वरी की गणना प्रदेश के प्राचीनतम देवी तीर्थ के रूप में की जाती है। यह जानने की बात है कि देश में ऐसे कई नगर-गांव हैं। जिनके नामकरण का मूलाधार मातृ भवानी हैं और इन्हीं के नाम पर आज वह नगर प्रखयात हो गया जैसे कि मां विंध्यवासिनी से विंध्याचल, पाटन देवी से पटना, तिलौथी (तुलजा) भवानी से तिलौथू, मां अरण्य देवी से आरा, पूरण देवी से पूर्णिया, कुमारी देवी से कन्या कुमारी, मां अंबिका से अंबिकापुर, मां चंडी से चंडीगढ़, मां नयना से नैनीताल, मां श्यामला (श्यामली) से शिमला, मां त्रिपूर सुंदरी से त्रिपुरा, मां तारा से तारापीठ, मां काली से कोलकाता, मुंबा देवी से मुंबई आदि। ठीक वैसे ही मां संभलेश्वरी के नाम से उड़ीसा राज्य का खूबसूरत नगर संभलपुर प्रकाशित है जो महानदी (उड़ीसा) के किनारे युगों-युगों से आबाद है। इतिहास गवाह है कि प्राच्य काल का यह हीरक खंड (हीरा खंड क्षेत्र) देवोपासना के लिए प्रसिद्ध रहा है जिसमें महामाया संभलेश्वरी मां का प्रमुख स्थान है। यह गौरव की बात है कि उत्कल देश के प्राचीन त्रय देवियों में मां बिरजा और मां बिमला के साथ मां संभलेश्वरी की गणना की जाती है। इसी प्रकार प्रदेश के पंच महादेवी तीर्थ में भी मां गण्य हैं। विश्वास किया जाता है कि तब 'संबलक' नाम से परिचित यह प्रक्षेत्र सुदूर देशों में हीरा निर्यात करता था। इस तथ्य की पुष्टि विदेशी यात्रियों के विवरण से भी होती है। टॉल्मी की कृति में उल्लिखित 'मानदा' किनारे संबलका (संबालका) यही है जिसे कहीं-कहीं 'संभल' अथवा 'संभलेस' भी कहा गया है। कहते हैं नई राजधानी की सािपना के लिए उचित स्थान की खोज में निकले राजा श्री बलराम देव ने सन् 1540 ईंमें नवीन संबलपुर नगर को बसाया और यहीं की अधिष्ठात्री शक्ति हैं मां संभलेश्वरी, जिन्हें उड़ीसा प्रांत के शक्तिपीठों में जाग्रत व अद्धितीय स्वीकारा जाता है। मां के नामकरण संभलेश्वरी के पीछे यह तर्क दिया जाता है कि माई ने ही राजा को संबल अर्थात् मजबूत आधार प्रदान किया तो कहीं-कहीं यह भी विवरण है कि यह पूरा का पूरा अरण्य भूमि शिमूली वृक्ष से आच्छादित था जिसे स्थानीय 'संभल' और ग्रामीण क्षेत्र के लोग समलेई कहते हैं। मां का मूल मंदिर भले ही संभलपुर में आच्छादित है पर मां की पूजा मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड व बिहार के साथ सुदूर असम के भी कुछ अंचलों में होती है। मां के मंदिर में पहुंचते ही पीठस्थ शक्ति का सहज अनुभव होता है। प्रवेश द्वार पर द्वय देवी वाहन का विशाल व आकर्षक विग्रह दर्शनीय है। संपूर्ण मंदिर क्षेत्र के निर्माण में उड़ीसा शैली का बेजोड़ प्रदर्शन दर्शनीय है। यहां मां के अलावे भोले भंडारी, भैरव, देवी योगिनी, मां तारिणी, जगन्नाथ, विष्णु, साक्षी गोपाल, बालाजी आदि के दर्शन किए जा सकते हैं। इस पूरे परिसर में प्राच्य व नवीन दोनों देव विग्रह की उपस्थिति दर्ज है। यहां के पूजारी देवमुनि दास जी का मानना है कि जो यहां एक बार आता है माताजी का भक्त सदा-सर्वदा के लिए हो जाता है। यह गौरव की बात है कि संभलपुर में इसके अतिरिक्त दर्जनों देव स्थल हैं जिनमें वृद्धराजा शिव, बड़े जगन्नाथ, काली घाटेश्वरी, हनुमान, ब्रह्मपुरा, गोपाल जी, मां तारिणी, शनि देव आदि का नाम है। यह जानकारी की बात है कि यहीं से देश का सबसे लंबा बांध हीराकुंड का दर्शन किया जा सकता है जहां तक जाने के लिए नगर से सुविधानुसार वाहन लिया जा सकता है। ऐसे तो सालों भर मां के इस मंदिर म भक्तों का आगमन बना रहता है पर दोनों नवरात्र, प्रत्येक मंगलवार व अवकाश के दिनों में भक्तों की संखया में खूब बढ़ोतरी होती है। सचमुच भारत देश में मां के इस स्थान की महता इस बात में गर्भित है कि महामाया का यह स्थान सबलता प्रदान कर कार्य सिद्धि का सुयोग उपस्थित करता है तभी तो उड़ीया साहित्य में मां को 'आधार' प्रदान करने वाली भगवती' भी कहा गया है जिससे मानव मात्र के प्रगति का पथ प्रशस्त होता रहे। यात्रा मार्ग : संभलपुर हाबड़ा-मुंबई रेलमार्ग पर अवस्थित है। जहां कहीं से मेल व सुपर फास्ट ट्रेन द्वारा जाना सहज है। ऐसे कोच बस सेवा राउरकेला, भुवनेश्वर, जगन्नाथपुरी व कटक से भी उपलब्ध है। यहां सभी के खाने व ठहरने के लिए उपयुक्त व्यवस्था है, इस कारण भ्रमणार्थियों को कोई परेशानी नहीं होती


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