वास्तु और ज्योतिष

वास्तु और ज्योतिष  

व्यूस : 2916 | दिसम्बर 2010

सभी विद्वतजन के मस्तिष्क में यह प्रश्न रहता है कि यदि वास्तु शुभ हो तो क्या पारीवारिक व भौतिक कष्टों से निवृŸिा मिल सकती है? क्या वास्तु हमारे भाग्य को बदल सकता है? यदि नहीं तो वास्तु का क्या लाभ? यदि हां तो क्या हम ग्रहों की चाल को समझकर उचित उपाय द्वारा अपना भविष्य बदल सकते हैं? वास्तव में कुंडली का प्रभाव सर्वोपरि है। हमारी कुंडली के ग्रह बताते हैं कि हमारा घर वास्तु दोष से रहित होगा या नहीं या घर में वास्तु दोष कहां पर होंगे? घर कैसा होगा या होगा ही नहीं व घर बनने के बाद कितना सुख मिलेगा- यह सभी हमारी जन्मपत्री से विदित होता है। लेकिन कष्टों के निवारण के लिए सर्वदा उपायों का सहारा लिया जाता रहा है और वास्तु दोषों से मुक्त होना भी उपायों की श्रृंखला की एक सीढ़ी है। वास्तु द्वारा भी हम अपने भाग्य को, जितना हो सके उतना, खुशहाल बनाने की कोशिश करते हैं। लाल किताब में वास्तु, ज्योतिष एवं हस्तरेखा शास्त्र का बहुत अच्छा समन्वय है। शनि मकान का कारक होता है। इसके अनुसार कुंडली से गृह सुख विचार के अंतर्गत ग्रहों के प्रभाव निम्न प्रकार से देखने को मिलते हैं-

Û यदि शनि प्रथम भाव में हो एवं सातवां व दसवां भाव खाली न हो तो 42वें वर्ष से पहले मकान बनाने से आर्थिक स्थिति खराब हो जाती है एवं जातक का दिवालिया निकल सकता है।

Û यदि शनि दूसरे भाव में स्थित हो तो मकान बनाने से आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो जाती है।

Û यदि शनि तीसरे भाव में स्थित हो तो जातक के अंत समय में तीन मकान होते हैं। यदि ऐसे जातक का मकान न बन रहा हो तो वह तीन कुŸो या बंद मुंह वाले तीन कुŸाों की मूर्ति घर में रखे। ऐसा करने से शीघ्र ही मकान की प्राप्ति होगी।

Û चैथे भाव में शनि वाले जातक को बिल्डर नहीं बनना चाहिए। ऐसा जातक अपना मकान बनाता है तो मामा के परिवार में तंगी आ जाती है।


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Û यदि शनि पांचवे भाव में हो तो मकान बनाने से संतान पर अशुभ प्रभाव आता है। इसके उपाय के लिए भैंस का दान करें या भैंस को जंगल में छोड़ दें।

Û छठे भाव में शनि रहने पर 39वें वर्ष की आयु के बाद ही मकान बनाना शुभ होता है। पहले बनाने से बेटियां या रिश्तेदारों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। यदि कोने का मकान हो तो मान हानि होती है।

Û सातवें भाव में शनि वाला जातक अधिकांशतः बना बनाया मकान खरीदता है अथवा पैतृक मकान में निवास करता है।

Û अष्टम भाव में शनि वाले जातक को गृह निर्माण नहीं करवाना चाहिए क्योंकि मकान बनवाने से घर में मृत्यु भी आ सकती है। साथ ही उसे किराएदार नहीं रखने चाहिए या किराएदार पूर्ण निगरानी में रहने चाहिए अर्थात् स्वयम् के घर के आस-पास ही किराए पर मकान दें अन्यथा मकान खाली नहीं होगा। अष्टम भाव में शनि वाला जातक धर्मशाला बनवाए तो स्वयम् बेघर हो जाता है।

Û शनि नवम भाव में होने पर तीन मकानों का योग बनता है लेकिन तीसरा मकान समस्याएं उत्पन्न करता है। ऐसे जातक को पत्नी के गर्भास्था में होने पर गृह निर्माण नहीं करना चाहिए।

Û दशम भाव में शनि वाले जातक को गृह निर्माण कार्य संपन्न होने पर आर्थिक समस्याएं होने लगती हैं। यदि चाचा-चाची से उधार लेकर मकान बनवाया जाए तो शुभ होता है।

Û एकादश भाव का शनि 55वर्ष की आयु के बाद अपना मकान देता है परंतु दक्षिणमुखी मकान बीमारी का कारण होता है।

Û द्वादश भाव में शनि का होना मकान के लिए अति शुभ माना जाता है। पूर्ण धन न होने पर भी मकान बना लेने से निर्माण कार्य बीच में रुकता नहीं। मकान में गमले या कच्ची जमीन रखने से सेहत अच्छी रहती है।

Û यदि बृहस्पति दसवें या ग्यारहवें भाव में हो तो घर के बगल में धार्मिक या शैक्षणिक भवन होता है।

Û यदि शुक्र तीसरे भाव में हो तो अपने नाम से मकान बनाना शुभ नहीं होता।

Û यदि चतुर्थ भाव में गुरु हो तो घर के नीचे जल का प्राकृतिक स्रोत होता है तथा घर बड़ा होता है एवम् घर के सामने फूलों का बाग होता है।


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Û चतुर्थ भाव में राहु व शनि का प्रभाव होने से घर में वास्तु दोष होता है।

Û चतुर्थ भाव में शुक्र व चंद्रमा के रहने से आवास मंदिर की तरह सुंदर होता है।

Û चतुर्थ भाव खाली हो तो अपना मकान बनने में बहुत समय लग जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक सूत्र हैं जो केवल वास्तु पर आधारित हैं और हमारे भविष्य के बारे में संकेत देते हैं।

- यदि मकान बीच से उठा हुआ हो तो संतान नहीं होती।

- पांच कोने का मकान संतान का दुख और बरवादी देता है।

- आठ कोने का मकान हो तो घर से बीमारी नहीं जाती।

- नैत्य कोण नीचा हो या वहां पर गड्ढा हो तो घर में बीमारी घर कर जाती है व मकान बेचना कठिन हो जाता है।

- नैत्य कोण में मुख्य द्वार होने से घर के मालिक को चिंता व आर्थिक हानि होती रहती है।

- ईशान कोण में दोष होने से संतान के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। घर में धन की बरकत नहीं रहती और ईश्वरीय कृपा में बाधा उत्पन्न होती है।

- अग्नि कोण में दोष होने से घर की स्त्रियों का स्वास्थ्य खराब रहता है और आय का साधन मंदा हो जाता है।

- ब्रह्म स्थान में गंभीर दोष जैसे घर के मध्य में भारी सामान, सीढ़ियां या शौचालय आदि होने पर अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सारे विकास कार्यों में अवरोध आने लगता है तथा घर विनाश की ओर जाने लगता है।

- वायव्य कोण में दोष से ऋण, पड़ोसियों से अनबन, संबंधों में कटुता व झगड़ा आदि अशुभ फल होते हैं।

- मकान में कीकर का वृक्ष न लगाएं। यदि जातक लगाएगा तो निःसंतान हो जाएगा। इस प्रकार ज्योतिष का सीधा संबंध वास्तु से है। वास्तु दोषों को हटाने से भी कुंडली के दोष निरस्त हो जाते हैं। ज्योतिष या ग्रह अवश्य ही अहम् भूमिका निभाते हैं लेकिन वास्तु उपाय भी वर्षा में छतरी के रूप में कार्य करते हैं। प्रयास करके वास्तु दोषों को दूर करना चाहिए और जीवन को सुखमय बनाना चाहिए।

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वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2010

वास्तु का शाब्दिक अर्थ है 'वास' अर्थात् वह स्थान जहां पर निवास होता है। इस सृष्टि की संरचना में पंचतत्व (अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाष) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं तो भवन निर्माण करते समय में भी इनकी उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता।प्रस्तुत विषेषांक में 'वास्तु' से संबंधित समस्त महत्वपूर्ण जानकारी का उल्लेख है

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