जन्म पत्रिका में इंजीनियरिंग योग

जन्म पत्रिका में इंजीनियरिंग योग  

जन्म पत्रिका में इंजीनियरिंग योग रश्मि चौधरी एक सफल इंजीनियर बनाने में मुखयतः शनि और मंगल ग्रह का योग कारक होना अति आवश्यक है। लेकिन भिन्न-भिन्न तकनीकि कार्यों में विभिन्न ग्रहों का योगदान भी महत्वपूर्ण हैं जैसे टी. वी., दूर संचार, कंप्यूटर संबंधी योग्यता हेतु बुध, वस्त्र निर्माण में इंजीनियरिंग हेतु बृहस्पति, बच्चों के खिलौने, सौंदर्य प्रसाधन आदि के क्षेत्र में दक्षता हेतु चंद्र, शुक्र तथा विद्युत विभाग में एक सफल इंजीनियर बनने के लिये ऊर्जा और अग्नि प्रधान ग्रह सूर्य का शुभ और योगकारक होना अति आवश्यक है। इंजीनियरिंग में दक्षता प्राप्त करने के लिए इंजीनियरिंग के कारक ग्रहों का लग्न या लग्नेश, चतुर्थ भाव या चतुर्थेश, सप्तम भाव, सप्तमेश तथा दशम भाव, दशमेश एवं पंचमेश और नवम (भाग्य भाव) एवं नवमेश से शुभ संबंध होना अति आवश्यक है। इन भावों पर इन कारक ग्रहों का जितना अधिक शुभ प्रभाव होगा जातक को अपने व्यवसाय में उतनी ही रूचि होगी। 'महर्षि मंत्रेश्वर' कृत ''फलदीपिका'' के अनुसार ''तिग्मांशुर्जनयप्युशेषसहितो यन्त्राश्मकारं नरः'' अर्थात् यदि सूर्य-चंद्रमा साथ-साथ में हो तो जातक यंत्रकारक इंजीनियर तथा मशीनरी के कार्य करता है। यदि लग्न भाव से मंगल व शनि का संबंध हो तो जातक इंजीनियर होता है। मेष लग्न में यदि शनि चतुर्थ भाव में स्थित हो तथा मंगल का प्रभाव भी लग्न एवं दशम भाव पर हो तो जातक इंजीनियर होता है। मकर या कुंभ लग्न हो, दशम् या सप्तम भाव में मंगल स्थित हो तो जातक इंजीनियर होता है। यदि सूर्य लग्न, चंद्र लग्न एवं जन्म लग्न एक ही हो तथा उन पर शनि व मंगल का प्रभाव अधिक हो तो जातक एक सफल इंजीनियर होता है। यदि चतुर्थ भाव में शनि स्थित हो और उस पर केतु का प्रभाव हो अथवा चतुर्थ भाव में मंगल एवं केतु की युति हो, शनि सप्तम भाव में स्थित हो तो जातक इंजीनियर होता है। दशम भाव चूंकि कार्यभाव है अतः दशम् भाव एवं दशमेश का यदि शनि, मंगल, केतु एवं बृहस्पति से संबंध हो तो जातक एक सफल इंजीनियर होता है। दशम भाव एवं चतुर्थ भाव में से किसी एक में शनि व दूसरे में मंगल स्थित हो तथा गुरु का लग्न, चतुर्थ एवं नवम, दशम किन्हीं दो भावों पर प्रभाव हो तो जातक वस्त्र उद्योग में इंजीनियर होता है। यदि धनु लग्न हो, दशम् भाव में शनि स्थित हो, लग्न सप्तम एवं दशम् भाव में से किन्हीं दो भावों पर मंगल, केतु या सूर्य की स्थिति, दृष्टि या युति संबंध हो तो जातक सफल विद्युत इंजीनियर होता है। लग्न में मंगल स्वराशिस्थ हो, शनि चतुर्थ भावस्थ हो या शनि सूर्य की दशम् भाव पर दृष्टि हो तो जातक इंजीनियर होता है। यदि कुंडली में चंद्र शनि या चंद्र मंगल की युति हो तथा चतुर्थ या पंचम भाव पर मंगल, केतु या राहु की युति स्थिति या दृष्टि प्रभाव हो तो जातक इंजीनियरिंग में दक्षता प्राप्त करता है। लग्नस्थ बुध पर मंगल या शनि की दृष्टि हो तथा बृहस्पति द्वितीय भाव में स्थित हो अथवा इन तीनों ग्रहों का किसी भी रूप में शुभ संबंध बन रहा हो तो जातक कंप्यूटर इंजीनियर होता है तथा उसे मशीनरी एवं कलपूर्जों आदि से संबंधित अच्छी जानकारी होती है। राहु-केतु, शनि और बुध यदि शुभ स्थिति में हों तो जातक को तीक्ष्ण बुद्धि और अच्छी सोच प्रदान करते हैं। यदि दशम् भाव में राहु या केतु स्थित है। दशम भाव पर शनि की दृष्टि हो, बुध शनि की राशि में, या शनि बुध की युति या बुध पर शनि की दृष्टि का प्रभाव हो तो जातक को कंप्यूटर इंजीनियर के रूप में अच्छी सफलता प्राप्त होती है। जन्म पत्रिका में शुक्र-शनि का कारक योग भी कंप्यूटर इंजीनियरिंग में सफलता दिलाता है। दशम् भाव में यदि सूर्य, मंगल, शनि और बुध ग्रहों से 'चतुर्ग्रही' का योग बन रहा हो तो व्यक्ति एक सफल इंजीनियर होने के साथ-साथ खूब धन कमाता है। नवम भाव (भाग्य भाव) में यदि धनेश या लाभेश होकर बुध स्थित हो तथा दशम् भाव पर मंगल का प्रभाव हो, शुक्र बुध की युति यदि लग्न में अथवा शुक्र बुध की राशि में स्थित हो तो जातक हार्डवेयर इंजीनियर होता है। यदि दशम भाव में सूर्य शनि की युति हो साथ ही सूर्य धनेश, लाभेश या भाग्येश हो और चतुर्थ एवं पंचम भाव पर सूर्य, मंगल एवं केतु की स्थिति, युति या दृष्टि प्रभाव हो तो जातक को इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अत्यंत सफलता, खयाति, प्रसिद्धि एवं सम्मान भी मिलता है। अब हम कुछ कुंडलियों की ज्योतिषीय विवेचना करेंगे। कुंडली नं-1, एक सफल इंजीनियर की है जो इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अत्यधिक नाम व पैसा कमाकर आज एक विल्डर के रूप में भी अपना स्वतंत्र व्यवसाय चला रहा है। इस कुंडली में सिंह लग्न में गुरु मित्र राशिस्थ होकर लग्न में विद्यमान है, जिसकी सप्तम एवं नवम् भाव पर पूर्ण दृष्टि है। चतुर्थेश एवं नवमेश होकर योकारक मंगल सूर्य एवं शुक्र के साथ दशम् भाव (कार्य स्थान) में स्थित है। सूर्य लग्नेश होकर दशम भावस्थ है जो शुक्र एवं मंगल के साथ युति बना रहा है। शुक्र स्वराशिस्थ है तथा धनेश एवं लाभेश बुध स्वयं लाभ भाव में स्थित है। कुंडली में चंद्र स्वराशिस्थ है तथा शनि और राहु की युति भी है। षष्ठ भाव का स्वामी अष्टम भाव में स्थित होकर विपरीत राजयोग का निर्माण कर रहा है तथा शनि मीन राशिस्थ है। 'फलदीपिका' के अनुसार मीन राशि का शनि यदि छठे या आठवें भाव में स्थित हो तो जातक को जमीन जायदाद तथा भवन या इनसे संबंधित कार्यों से पूर्ण लाभ दिलाता है। यही कारण है कि जातक एक सफल इंजीनियर तो है ही साथ ही बिल्डिंग निर्माण में भी अपना खूब नाम कमा रहा है। दशम भाव, दशमेश (शुक्र) द्वितीय (धन भाव), पंचम (खयाति प्रसिद्धि) भाव एवम् मंगल पर शनि की दृष्टि है। लग्न चतुर्थ एवं पंचम भाव पर दशमस्थ मंगल की दृष्टि है तथा शनि और केतु का दृष्टि संबंध भी बन रहा है। कुंडली में मंगल रोहिणी नक्षत्र (चंद्र के नक्षत्र) में है, शनि बुध के नक्षत्र (रेवती में) तथा चंद्र शनि के नक्षत्र पुष्य में स्थित है। इस दृष्टि से भी मंगल, शनि, चंद्र व बुध का संबंध बन रहा है। अतः हर दृष्टि से ग्रहों की स्थिति अत्यंत शुभ है, जो जातक को प्रबल भाग्य का स्वामी बनाकर इंजीनियरिंग व्यवसाय में पूर्णता एवं दक्षता प्रदान कर रही है। कुंडली नं. 2 कुंभ लग्न एवं कर्क राशि की है। कुंडली में ग्रहों की स्थिति कुछ इस प्रकार है। लग्नेश शनि वक्री होकर चतुर्थ भाव में स्थित है। चंद्र पूर्ण बली होकर स्वराशिस्थ है, मंगल को स्थानबल प्राप्त है तथा मंगल दशम् भाव में स्वराशिस्थ है। योगकारक शुक्र धनेश और लाभेश गुरु के साथ लाभ भाव में ही स्थित है तथा पंचमेश और अष्टमेश बुध सप्तमेश सूर्य के साथ द्वादश भावस्थ ारागुहोकर बुधादित्य योग का निर्माण कर रहा है। लाभेश गुरु भी अपनी त्रिकोण राशि में स्थित होकर लाभ भाव में ही बैठा है। शनि तथा मंगल का परिवर्तन योग चतुर्थ और दशम भाव में बन रहा है। शनि और मंगल की दृष्टि लग्न भाव पर भी है। लाभेश धनेश और भाग्येश की युति लाभ भाव में ही बन रही है। कुंडली नं. 3 वृश्चिक लग्न की कुंडली है। लग्न में शनि मंगल की राशि में है तथा चतुर्थ भाव में मंगल शनि की राशि में स्थित है। साथ ही शुक्र और बुध का राशि-परिवर्तन योग भी बन रहा है। लग्नस्थ शनि पर केतु की दृष्टि है तथा भाग्येश चंद्र भी शनि की राशि में तृतीय स्थान में बैठा है। चतुर्थ भावस्थ मंगल की सप्तम, दशम और एकादश भाव (लाभ भाव) पर दृष्टि है। इससे स्पष्ट है कि जातक मंगल एवं शनि से संबंधित व्यवसाय से लाभ प्राप्त करेगा। कुंडली में यदि मंगल शुभ स्थिति में हो तथा शनि भी अच्छी स्थिति में हो तो जातक मैकेनिकल इंजीनियर बन सकता है। ये सारे योग इस जातक की जन्मपत्रिका में विद्यमान हैं। लग्नस्थ शनि मंगल की राशि में स्थित होकर सप्तम और दशम भाव पर दृष्टि भी डाल रहा है। कुंडली में शनि और मंगल दोनों ही बलवान हैं। जातक एक सफल मैकेनिकल इंजीनियर के रूप में कार्य कर रहा है। कुंडली नं. 4 एक कंप्यूटर इंजीनियर की है। लग्नेश शुक्र सप्तम भाव में मंगल के साथ युति बना रहा है। सप्तमेश मंगल सप्तम भाव में स्वराशिस्थ है। सूर्य, बुध, गुरु का योग अष्टम भाव में है। षष्ट भाव का स्वामी गुरु अष्टम भाव में विपरीत राजयोग का निर्माण कर रहा है। शनि दशम भाव में चंद्र की राशि में स्थित है। शनि तुला लग्न के लिये योगकारक ग्रह है। शनि की दृष्टि सप्तम और चतुर्थ भाव पर पड़ रही है। दशमस्थ शनि और मीन का चंद्र जातक को कार्यपरायण धनवान, विद्वान, अधिकारी एवं पराक्रमी बना रहा है। कुंडली में शनि पर मंगल की दृष्टि एवं मंगल पर शनि की दृष्टि है। बुध भी गुरु एवं सूर्य के साथ स्थित है जो जातक को तीक्ष्ण बुद्धि का स्वामी बना रहा है। यहां पर कुंडली नं. 5 की विवेचना करना अति आवश्यक है और प्रासंगिक भी है क्योंकि अभी हाल ही में कनाडा के वाटरलू विश्वविद्यालय ने भारत के पूर्व राष्ट्रपति और एयरोनॉटिकल वैज्ञानिक ए. पी. जे. अब्दुल कलाम को इंजीनियरिंग में डॉक्टर की मानद उपाधि से सम्मानित किया है। आइये इनकी कुंडली का ज्योतिषीय दृष्टि से विश्लेषण करते हैं। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम का लग्न धनु है। उनकी कुंडली में शनि, गुरु, सूर्य, बुध, केतु, शुक्र, मंगल आदि ग्रहों की सुदृढ़ एवं शुभ स्थिति ने उन्हें अन्वेषक बनाया और देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचाया। इनकी कुंडली में लग्नस्थ शनि की तृतीय, सप्तम एवं दशम भाव पर दृष्टि है। पंचम भाव से शिक्षा, बुद्धि और प्रसिद्धि का विचार किया जाता है। जिसका स्वामी मंगल लाभ भाव में स्थित है, विद्या और बुद्धि के कारक गुरु और बुध उच्च राशिस्थ हैं। उच्च शिक्षा का विचार नवम् भाव से करते हैं। कुंडली में नवम् भावेश सूर्य दशम् भाव में बुध और केतु के साथ स्थित है। कुंडली के ग्रह योग इस बात का स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि उन्हें अपनी कुशाग्र बुद्धि, उच्च कोटि के ज्ञान एवं उच्चतम बौद्धिक क्षमता ने एक सफल वैज्ञानिक, आविष्कारक एवं इंजीरियर बनाकर देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचाया।


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