मार्गशीर्ष पूर्णिमा व्रत(21 दिसंबर 2010 ) पं. ब्रजकिशोर शर्मा ब्रजवासी यह व्रत मार्ग शीर्ष मास की उदय व्यापिनी पूर्णिमा तिथि में किया जाता है। इस दिन संपूर्ण प्राणियों को आश्रय प्रदान करने वाले, त्रैलोक्य वन्दित व पूजित शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी श्री हरि, परमध्येय नीलोत्पलदलश्याम, पीताम्बरधारी, संपूर्ण मनोरथों को पूर्ण करने वाले, भक्त, प्राणधन, जीवन मृत्यु रूपी दुःखों का निवारण करने वाले परब्रह्म परमात्मा श्रीमन् नारायण का पूजन किया जाता है। इस दिन अरूणोदय बेला में जागकर नित्य नैमित्तिक कर्मों को पूर्णकर किसी विद्वान् ब्राह्मण की सान्निध्यता में या स्वयं ही गणेश गौरी नवग्रहादि देवताओं व प्रधान देव जगत् नियन्ता, उत्पत्ति स्थिति-संहार के स्वामी, बिना कारण ही दीनों पर कृपा करने वाले, जीव मात्र के हृदय में स्थित, नृसिंह रूप धारण कर भक्त प्रहलाद पर कृपा करने वाले, जगत् जननी महारानी लक्ष्मीजी के प्राणेश्वर भगवान् नारायण का पंचभूत व पंचमहाभूतों की शुद्धि प्रक्रिया द्वारा विधिवत् संकल्प स्वास्तिवाचन व पुण्याहवाचन कृत्यों का संपादन करते हुए सभी देवों का पूजन, पुनः भगवान् शेषशायी नारायण का वैदिक मंत्रों या 'ऊँ नमो नारायणाय' मंत्र से श्वेत वस्त्रों को धारण कर षोडशोपचार पूजन करें। भगवान् के सिंहासन के सन्मुख ही यज्ञ वेदी का निर्माण पूर्व में ही कर लें और श्वेत तिल, घी-बूरा आदि की विष्णु सहस्त्रनामावली, पुरुष सूक्त, श्री सूक्त नवग्रहादि मंत्रों से यज्ञस्वरूप भगवान् के लिए अग्नि स्थापनकर आहुति प्रदान करें। यज्ञोपरांत पुनः ज्ञान-वैराग्य भक्ति स्वरूप, कर्म राशि के नाशाकर्त्ता, देव-ऋषि-पितृ ऋण से मुक्ति दिलाने वाले, श्रीकृष्णावतार में माता यशोदा के प्रेम रूपी बंधन में बंध जाने वाले, अचिन्त्य महाशक्ति योगमाया का अवलंबन ले ब्रजगोपियों को महारास का असीम सुख प्रदान करने वाले वैकुंठवासी भगवान् नारायण का पूजन कर अपना व्रत पूजन उनके अर्पण करें और कहें। पौर्णमास्यं निराहारः स्थिता देव तवाज्ञया। मोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष परेऽह्नि शरणं भव॥ अर्थात् हे देव पुण्डरीकाक्ष ! मैं पूर्णिमा को निराहार व्रत रखकर दूसरे दिन आपके पूजनोपरांत ब्राह्मणों को भोजनादि पदार्थों से तृप्तकर, वस्त्राभूषणदक्षिणादि से संतुष्टकर, सानंद विदाकर आपकी आज्ञा को शिरोधार्य कर ही भोजन ग्रहण करूंगा। आप मुझे अपनी शक्ति व शरण प्रदानकर इस व्रत को सानंद पूर्ण करने की क्षमता प्रदान करें। इस प्रकार भगवान् को व्रत समर्पित कर 'ऊँ नमो नारायण' मंत्र का जाप, श्रीसूक्त-पुरुष सूक्त-विष्णु सहस्त्रनाम तथा विष्णु पुराण में वर्णित भगवान् नारायण के दिव्य लीला चरित्रों का पठन-पाठन, चिंतन-स्मरण करते हुए, सायंकाल को चंद्रमा के उदय होने पर दोनों घुटने पृथ्वी पर टिकाकर श्वेत वर्ण के पुष्प, अक्षत, सफेद चंदन व जलादि सहित अर्घ्य प्रदान करें। अर्घ्य देते समय अपनी अमृतमयी किरणों से जीवमात्र को आनंद प्रदान करने वाले, नवग्रहों में सुशोभित तथा शीतलता की निधि चंद्रदेव से विनयानवत् विशुद्ध भाव से कहें - हे भगवान् ! रोहिणीपते ! आपका जन्म अत्रिकुल में हुआ है, क्षीर सागर से प्राकट्य है, रात्रि वेला में श्रम से थकित जीवों में प्राण वायु का संचार करने वाले हैं, आप मेरे द्वारा दिए हुए अर्घ्य को प्रेमपूर्वक स्वीकार करें और मुझ अज्ञानी व सांसारिक विषयों में आसक्त जीव का कल्याण करें। इस सुखद बेला में ऊँ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः' - मंत्र का अधिकाधिक जाप तथा 'चंद्राऽष्टाविंशति नामस्तोत्रम्' का पाठ भी करें, तदोपरांत चंद्र देवता को प्रणामकर हाथ जोड़कर प्रार्थना करें। हे भगवन् । आप श्वेत धवल किरणों से शोभायमान होते हैं, आपको नमस्कर है। आप द्विजों के राजा हैं, आपको प्रणाम है। आप राहिणी के पति हैं, आपको वंदन है। आप लक्ष्मी के भाई हैं। आपको कोटि-कोटि प्रणाम है। इस प्रकार वेद भी नेति-नेति कहकर जिनका गायन करते हैं, उन सर्वेश्वर, सर्वाधिष्ठान, राजा बलि पर अपनी अहैतुकी कृपा बरसाने वाले, देवताओं के कार्य साधन के निमित्त 'वामन' रूप धारण करने वाले, महाभारत युद्ध में अर्जुन व तीन पग पृथ्वी की याचना में राजा बलि को अपने विराट् रूप से कृत-कृत करने वाले श्री हरि नारायण के समक्ष हरि संकीर्तन करते हुए रात्रि जागरण करें तथा सूर्योदय बेला में स्नानादि क्रियाओं से निवृत्त हो संकलित वचनों का पालनकर व्रत को पूर्ण करें। इस प्रकार जो इस व्रत का पालन करते हैं, वे पुत्र-पौत्रादि के साथ असीम आनंद को प्राप्त होते हैं, अद्वितीय सुख को भोगते हैं, संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाते हैं और अपनी दस पीढ़ियों के साथ स्वर्गलोक को पदार्पण करते हैं। जीवन के चारों पुरूषार्थ (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) सिद्ध हो जाते हैं। भगवान् नारायण की प्रसन्नता व उनकी कृपा प्राप्ति का यह दिव्य व्रत है, जो व्रती के जीवन को दिव्यताओं से परिपूर्ण कर देता है। मार्ग शीर्ष मास की उदय व्यापिनी पूर्णिमा तिथि में संपूर्ण प्राणियों को आश्रय प्रदान करने वाले, त्रैलोक्य वन्दित व पूजित शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी श्री हरि, परमध्येय नीलोत्पलदलश्याम, पीताम्बरधारी, संपूर्ण मनोरथों को पूर्ण करने वाले, भक्त, प्राणधन, जीवन मृत्यु रूपी दुःखों का निवारण करने वाले परंब्रह्म परमात्मा श्रीमन् नारायण का पूजन किया जाता है। जो व्यक्ति मार्गशीर्ष पूर्णिमा व्रत का पालन करते हैं, वे पुत्र-पौत्रादि के साथ असीम आनंद को प्राप्त होते हैं, अद्वितीय सुख को भोगते हैं, संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाते हैं और अपनी दस पीढ़ियों के साथ स्वर्गलोक को पदार्पण करते हैं।

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वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2010

वास्तु का शाब्दिक अर्थ है 'वास' अर्थात् वह स्थान जहां पर निवास होता है। इस सृष्टि की संरचना में पंचतत्व (अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाष) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं तो भवन निर्माण करते समय में भी इनकी उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता।प्रस्तुत विषेषांक में 'वास्तु' से संबंधित समस्त महत्वपूर्ण जानकारी का उल्लेख है

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