दक्षिणावर्ती शंख

दक्षिणावर्ती शंख  

भारतीय संस्कृति में शंख की अपार महिमा एवं उपयोगिता बताई गई है। समृद्धि और आयु के वर्धन और दरिद्रता के शमन के साथ-साथ देवी-देवताओं के पूजन में, ज्योतिष और तांत्रिक साधनाओं में एवं शुभ कार्य के प्रारंभ में इसकी विशेष उपयोगिता बताई गई है। शंख भगवान विष्णु के चतुर्भज स्वरूप में उनके एक हाथ का आभूषण है। महाभारत में भगवान कृष्ण ने पांचजन्य शंख बजाकर युद्ध की शुरुआत की थी। आयुर्वेद में शंख भस्म अनेक प्रकार के रोगों को दूर करने के लिए प्रयोग में लाई जाती है। योग मंे भी शंख मुद्रा का वर्णन है। बौद्ध धर्म में शंख अष्ट मंगल (शंख, श्रीवत्स, मत्स्य, पद्म, छत्र, कलश, चक्र, ध्वज) पदार्थों में से एक है। पुराणों के अनुसार शंख की उत्पŸिा समुद्र मंथन से हुई थी। शंख समुद्र में लगभग सभी जगह पाए जाते हैं। मालदीव, श्री लंका, अंडमान निकोबार, हिंद महासागर, अरब सागर व प्रशांत महासागर में मुख्य रूप से पाए जाते हैं। शंख एक समुद्री जीव का बाहरी हिस्सा होता है। प्रकृति में पचास हजार से भी अधिक प्रकार के शंख पाए जाते हैं - कुछ खारे पानी में तो कुछ मीठे पानी में। इनके आकार एक मिली मीटर से चालीस इंच तक के होते हैं। ये एक ग्राम से कई किलो तक के वजन में अनेक रंगों में पाएं जाते हैं। शंखनाद से अनेक प्रकार के कीटाणुओं का नाश होता है। वराह पुराण में कहा गया है कि मंदिर के दरवाजे खुलने व कोई धार्मिक कार्य प्रारंभ करने से पहले शंख अवश्य बजाना चाहिए। शंख के बजाने से सात्विक स्पंदन (वाइब्रेशन) का संचार होता है और तामसिक व राजसिक स्पंदन (वाइब्रेशन) समाप्त हो जाता है। शंख को बजाने से वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त और सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है। इससे आशा, आत्मबल, शक्ति व दृढ़ता बढ़ती है तथा भय दूर होता है। इसके अतिरिक्त श्रद्धा व विश्वास जागृत होता है तथा भाग्य और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मांड एवं शंख की आकृति समान है। शंख के अंदर का घेरा ब्रह्मांड की कुंडली (स्पाइरल) की तरह होता है। शंख में गूंजने वाला स्वर ब्रह्मांड की गूंज के समान है। ¬ शब्द की गूंज भी शंख के द्वारा गुंजायमान ध्वनि जैसी ही होती है। रुद्राभिषेक या किसी देवता का जलाभिषेक करते समय शंख में जल या दूध भरकर डाला जाए तो पाप नष्ट होते हैं व सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। इसके धारा मुख पर गंगा और सरस्वती, मध्य में प्रजापति एवं सिर पर सूर्य, चंद्र तथा वरुण का स्थान माना गया है। अधिकतर शंख वामावर्ती होते हैं। दक्षिणावर्ती शंख दस प्रतिशत से भी कम पाए जाते हैं। यह जानने के लिए कि शंख दक्षिणावर्ती है या वामावर्ती उसके मस्तक को अपनी ओर व धारा मुख को बाहर की ओर रखें। यदि दायां भाग खुला हो तो वह दक्षिणावर्ती और यदि बायां भाग खुला हो तो वामवार्ती होगा। सामान्यतः दक्षिणावर्ती शंख को बाएं हाथ से पकड़ने में और वामावर्ती शंख को दाएं हाथ से पकड़ने में सुविधा होती है। वामावर्ती शंख को दाएं हाथ से पकड़ कर बजाया जा सकता है। दक्षिणावर्ती शंख को दाएं हाथ से पकड़ कर बजाने में असुविधा होती है। इसलिए बजाने वाले शंख वामावर्ती ही होते हैं। मुख्यतः दक्षिणावर्ती शंख भारत के दक्षिण में हिंद महासागर में पाया जाता है। जीव विज्ञान में इसे टर्बिनेला पायरम कहा जाता है। दक्षिणावर्ती शंख मुख्यतया जलाभिषेक एवं तर्पण आदि में उपयोग में लाए जाते हैं। लेकिन इनकी कुछ किस्में बजाने वाली भी पाई जाती हैं। इनका उपयोग बजाने में प्रचलित नहीं है, क्योंकि ये केवल बाएं हाथ से पकड़कर ही बजाए जा सकते हैं। शंख की मौलिकता की पहचान एक्स-रे द्वारा की जाती है। कभी-कभी शंख के दोषों को दूर करने के लिए कृत्रिम रूप से उसकी पाउडर द्वारा फिलिंग कर दी जाती है या कोने आदि बना दिए जाते हैं। यह कथन सत्य नहीं है कि केवल महंगे शंख या टर्बिनेला पायरम जाति के शंख ही दक्षिणावर्ती शंख होते हैं। दक्षिणावर्ती शंख अनेक किस्मों में पाए जाते हैं। किसी में रेखाएं होती हंै किसी में नहीं। बिना रेखाओं वाले शंख भी नकली नहीं होते- केवल अन्य साधारण तथा प्राप्त जाति के होते हंै और इन्हें भी दक्षिणावर्ती शंख की तरह माना व पूजा गया है। इनके फल किसी भी प्रकार से महंगे या अप्राप्त जाति के दक्षिणावर्ती शंख के बराबर ही होते हैं। दक्षिणावर्ती शंख के उपयोग: दक्षिणावर्ती शंख से लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है - इसके बिना लक्ष्मी जी की आराधना पूजा सफल नहीं मानी जाती। दक्षिणावर्ती शंख से पितृ-तर्पण करने पर पितरों की शांति होती है। दक्षिणावर्ती शंख में जलभर कर गर्भवती स्त्री को सेवन कराने से संतान स्वस्थ व रोग मुक्त होती है। दक्षिणावर्ती शंख से शालिग्राम व स्फटिक श्री यंत्र को स्नान कराने से वैवाहिक जीवन सुखमय और लक्ष्मी का चिर स्थायी वास होता है। चंद्र ग्रह की प्रतिकूलता से होने वाले श्वास व हृदय रोगों की शांति के लिए दक्षिणावर्ती शंख की नित्य पूजा करें। दक्षिणावर्ती शंख की स्थापना से वास्तु दोषों का निवारण होता है।


शंख विशेषांक  आगस्त 2009

ज्योतिष में शंख का क्या महत्व है, विभिन्न शंखों की उपयोगिता, शंख कहां-कहां पाए जाते है, शंख कितने प्रकार के होते है तथा घर में या पूजास्थल पर कौन सा शंख रखा जाना चाहिए और क्यों? यह विशेषांक शंखों से आपका पूर्ण परिचय कराने में मदद करेगा.

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