शंखों का रहस्यमय संसार

शंखों का रहस्यमय संसार  

शंखों का रहस्यमय संसार पं. सीताराम त्रिपाठी शास्त्री प्राचीन गं्रथ शंख संहिता एवं हिन्दू संस्कृति, दर्शन तथा ज्योतिष विज्ञान में शंखों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। सर्वविदित है कि शंखों की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई। शंखों की उत्पत्ति के रहस्य का संक्षिप्त विवरण यहां प्रस्तुत है। श्लोक: लक्ष्मी कौस्तुभ पारिजातक सुरा धन्वन्तरीश्चंद्रमा। गावः कामदुधाः सुरेश्वर रम्भादिदेवांगनां अश्वः सप्तमुखऽ हरिधेनु शंखो विषं चाम्बुधे। रत्नानीती चतुर्दश प्रतिदिन कुर्वंतु मंगलम् शंख साधक की मनोकामना पूरी कर उसके जीवन को सुखमय बनाता है। वेद-पुराणों में भी उल्लेख है कि जहां नियमित रूप से शंखनाद होता है, वहां अनिष्टकारी तत्वों का प्रवेश नहीं होता। भारतीय संस्कृति में शंख को मांगलिक चिह्न के रूप में स्थान प्राप्त है। सभी धार्मिक कृत्यों में इसका प्रयोग होता है। नौ निधियों में शंख भी एक अमूल्य निधि है। गीता में उल्लेख है कि युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण का विश्व प्रसिद्ध पांचजन्य शंख महाभारत संग्राम में विजय का प्रतीक बना। गीता के प्रथम अध्याय के श्लोक 12 से 16 तक शंखों का माहात्म्य है। महाभारत काल में युद्ध भूमि में रोजाना विजय काल पर शंखनाद किया जाता था। शंखों को आयुर्वेद चिकित्सा में भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। आयुर्वेद में शंख भस्म का प्रयोग आज भी प्रमुख रूप से प्राचीन काल से होता आ रहा है। शंख की भस्म के प्रयोग से विभिन्न रोगों से मुक्ति मिलती है। इसी प्रकार शंख से पानी पीने से भी विभिन्न रोगों से बचाव होता है। शंख नाद करने वाले व्यक्ति को श्वास व हृदय की बीमारी नहीं होती है। वैज्ञानिक स्तर पर भी इसकी प्रामाणिकता सिद्ध हो चुकी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि शंख ध्वनि के प्रभाव से आसपास का वातावरण व पर्यावरण शुद्ध होता है। शंखों के प्रकार: शंख अनेक प्रकार के होते हैं, जिनमें प्रमुख शंखों का उल्लेख यहां प्रस्तुत है। श्री गणेश शंख: यह एक चमत्कारी शंख है। इसकी आकृति भगवान गणपति जैसी है। यह पीताभ होता है। इसकी लंबाई 2 से 5 इंच तक होती है। इसकी उत्पŸिा हिमालय में कैलाश मानसरोवर में अधिक होती है। इसकी सूंड़ से बाणगंगा निकली होती है। स्थापना विधि: स्न्नानादि से निवृत्त होकर प्रामाणिक गणेश शंख को भी स्नानादि करा दें। फिर ‘श्री गणेश शंखाय नमः गणेश शंखाय मम गृह धनवर्षा कुरु-कुरु स्वाहा।’ मंत्र का मूंगे की माला से 108 बार जप कर प्राण प्रतिष्ठा कर अपने घर में या व्यवसाय स्थल पर उसकी स्थापना करें, आर्थिक समस्या मुक्ति मिलेगी, घर में स्थिर लक्ष्मी का वास होगा। इसके प्रभाव से बीमार उद्योग पुनः चालू हो जाते हैं। यह शंख कर्ज व वास्तु दोष से मुक्ति का अचूक साधन है। इसके जल से स्नान करने से ग्रहों के प्रतिकूल प्रभावों से भी मुक्ति मिलती है। ध्यान रहे, इसे जाग्रत करने के लिए इसकी आराधना जल तत्व वाले मूंगे, मोती या शंख की माला से ही करनी चाहिए। विष्णु शंख: यह शंख श्वेताभ होता है। इसकी रूपाकृति भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ जैसी होती है। शास्त्रों में इस शंख को चंद्र शंख की संज्ञा दी गई है। यह शंख अधिकतर कैलाश मानसरोवर, लक्षद्वीप, गोवा, अरब सागर, हिंद महासागर और प्रशांत महासागर पया जाता है। वैज्ञानिक शोध के अनुसार इस शंख फाॅस्फोरस, गंधक, कैल्सियम की मात्रा अधिक होती है। कोई गर्भवती नारी इसके जल का प्रयोग करे, तो उसकी संतान सुंदर व स्वस्थ होगी। इसके अतिरिक्त इस शंख के प्रयोग से साधक के व्यवसाय में उन्नति होती है और दरिद्रता से मुक्ति मिलती है। विष्णु शंख की स्थापना विधि: स्नानादि से निवृत्त होकर प्रामाणिक विष्णु शंख को ‘¬ नम: विष्णु शंखाय मम सर्व मनोवांछित फल प्रदान कुरु-कुरु स्वाहा।’ मंत्र से सिद्ध व प्राण प्रतिष्ठित करें। फिर इस मंत्र का 108 बार शंख की माला से जप कर फूंक मारें तथा व्यवसाय स्थल पर या भवन में ईशान कोण में स्थापित करें। शंख में जल भरकर 5 बार आचमन करें यह क्रिया नियमित रूप से करें, चमत्कारी प्रभाव सामने आएंगे। जिस व्यक्ति के घर में विष्णु शंख होता है, उसे संसार के सभी भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। पूर्णिमा की रात को विष्णु शंख में गंगाजल भरकर चंद्र की साक्षी में रख कर प्रातः उसका सेवन करने से हृदयाघात जैसी बीमारियों से बचाव होता है। गोमुखी शंख: इस शंख की उत्पŸिा मीठे पानी के समुद्रों में अधिक होती है। यह मुख्यतः मालद्वीप, अंडमान निकोबार द्वीप समूह, श्रीलंका, के हिंद महासागर, अरब सागर व बंगाल की खाड़ी के समुद्रों में पाया जाता है। कैलास मानसरोवर में सफेद रंग व पीत वर्ण की आभा वाले गोमुखी शंख पाए जाते हैं। इसकी आकृति गाय के मुंह जैसी होने के कारण इसे गोमुखी शंख कहा जाता है। पौराणिक शास्त्रों में इसका नाम कामधेनु गोमुखी शंख है। शंख के ऊपर गाय सींगों जैसे सींग निकले होते हैं। इसे मनोकामना पूर्ति का एक प्रमुख साधन माना जाता है। यह दुर्लभ व चमत्कारी है। गोमुखी शंख की स्थापना विधि: स्नानादि के बाद आक के पत्ते पर प्रामाणिक गोमुखी शंख को रख कर उस पर ‘¬ नमः कामधेनु गोमुखी शंखाय मम सर्व कार्य सिद्धि कुरु-कुरु स्वाहा।’ मंत्र का 108 बार जप कर फूंक मारें। फिर शंख में गंगाजल और लाल गाय का दूध भरकर उससे आचमन करें तथा घर और व्यवसाय स्थल पर उसका छिड़काव करें। इस क्रिया से मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। इस शंख के जल पान करने और इसका नाद करने से असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है। पांचजन्य शंख: यह भगवान कृष्ण का शंख है जिसका निनाद उन्होंने महाभारत के युद्ध के मैदान में किया था। इसका वर्णन गीता के श्लोकों में यत्र-तत्र है। इस शंख की स्थापना से वास्तु दोष से मुक्ति मिलती है और घर में प्रकृति के पांचों तत्वों का सामंजस्य बना रहता है। मान्यता है कि पांचजन्य का नाद करने से कोर्ट कचहरी के मामलों में विजय मिलती है। राजनेताओं को चुनावों में विजय के लिए पांचजन्य का नाद करना चाहिए। धर्म गं्रथों में इसे विजय प्रदाता और समृद्धि, यश, कीर्ति और मनोकामना पूर्ति करने वाला बताया गया है। यह विवादों से मुक्ति दिलाता है। इसका आकार वामावर्ती शंख की तरह होता है। इसमें पंचांगुली बनी होती है। यह शंख मानसरोवर व अन्य समुद्री तटों पर मिलता है। पांचजन्य की स्थापना विधि: घर, कार्यालय, कारखाने को वास्तु दोष से मुक्त रखने के लिए इस शंख की स्थापना घर के मध्य या मुख्य द्वार पर अथवा ईशान कोण में एक फुट गहरे गड्ढे में वास्तुपुरुष की तरह उलट कर करनी चाहिए। स्थापना के बाद इस पर हवन का विधान भी है। स्थापना के पूर्व शंख को सिद्ध और प्राण प्रतिष्ठित कर लेना चाहिए। मोती शंख: यह शंख मोती की तरह सफेद और चमकदार होता है। इसकी ऊंचाई चार से पांच इंच होती है। इसका आकार पिरामिड जैसा होता है। इसकी उत्पŸिा कैलाश मानसरोवर में होती है। उच्च गुणवŸाा के मोती भी इसी शंख में उत्पन्न होते हैं। इसके अतिरिक्त यह अरब सागर, हिंद महासागर तथा कई द्वीपसमूहों आदि में भी पाया जाता है। इस शंख में गंगाजल रखकर उससे नियमित रूप से आचमन करने से हृदय व श्वास रोगों से रक्षा होती है। मोती शंख की स्थापना विधि: ‘¬ नमः मोती शंखायः मम शरीरस्यः असाध्य रोग शीघ्र मुक्ति प्रदान कुरु-कुरु स्वाहाः।’ मंत्र का शंख की माला से 108 बार जप कर मोती शंख को सिद्ध और जाग्रत करना चाहिए। प्रमाणिक मोती शंख प्राप्त कर अपने घर में पूजा स्थल पर स्थापित करें। हृदय रोगी को यह प्रयोग अवश्य करना चाहिए। मोती शंख में अनेक औषधीय गुण भी हैं। हृदय रोगियों को इसमें गंगाजल भरकर कुछ समय रखने के बाद उसका सेवन करना चाहिए। मान्यता है कि इस शंख के जल से भोजन बनाने से भोजन रोगाणुओं से मुक्त होता है। इसकी भस्म का करेल के रस और गाय के दूध के साथ सेवन करने से मधुमेह से रक्षा होती है। त्वचा रोग से बचाव के लिए इसकी भस्म को नारियल के तेल के साथ मिला कर लेप करना चाहिए। एक रŸाी शुद्ध शिलाजीत को गर्म दूध में मिलाकर उसे शंख में भरकर सेवन करने से शारीरिक और स्मरण शक्ति में अत्यंत वृद्धि होती है। दक्षिणावर्ती शंख: यह शंख दाईं तरफ खुला होता है। यह जिस घर में रहता है उसमें स्थायी लक्ष्मी का वास होता है। इस शंख की पूजा आराधना करने वाले व्यक्ति की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस अति दुर्लभ और मूल्यवान शंख में सारे ब्रह्मांड की कल्पना की गई है। इस शंख की स्थापना से साधक की उसके शत्रुओं से रक्षा होती है, रोग, अज्ञान, दरिद्रता से मुक्ति मिलती है और वह दीर्घायु होता है। दक्षिावर्ती शंख की स्थापना विधि: इस शंख को ‘¬ हीं श्रीं श्रीधर करस्थाय लक्ष्मीप्रियाय दक्षिणावर्त शंखाय मम चिन्तित फलं प्राप्तार्थाय नमः।’ मंत्र का शंख की माला से 108 बार जप कर सिद्ध और प्राण प्रतिष्ठित कर घर में अथवा व्यवसाय स्थल पर स्थापित करें। इसमें सफेद गाय का दूध रखकर आचमन करने का विधान है। यह शंख साक्षात लक्ष्मी का रूप है। इसकी स्थापना मात्र से लक्ष्मी का स्थायी वास, व्यवसाय में उन्नति और दरिद्रता का नाश होता है तथा कर्ज से मुक्ति मिलती है। अन्नपूर्णा शंख: यह अत्यंत दुर्लभ और अति मूल्यवान होता है। यह 3 से 20 किलोग्राम तक का होता है। यह देखने में अत्यंत चित्ताकर्षक होता है। प्राचीन काल में सिद्ध ऋषि-महर्षि अन्नपूर्णा शंख की महिमा से पूर्णतः परिचित थे तथा इसका प्रयोग अधिक करते थे। अन्नपूर्णा शंख की स्थापना विधि: स्नानादि से निवृत्त होकर एकांत स्थान में श्वेत आक के पत्तों पर अपना नाम लिखकर ‘¬ नमः अन्नपूर्णा शंखाय मम गृह अन्न, धन, जय, विजय, मनोवांछित फलं प्रदान कुरु-कुरु स्वाहा।’ मंत्र का 108 बार जप कर उन पत्तों पर इस शंख की स्थापना करें। फिर 21 दिन तक नियमित रूप से उक्त मंत्र का उक्त संख्या में ही जप करें। इस क्रिया से शंख अभिमंत्रित हो जाता है। अभिमंत्रित हो जाने पर कार्य सिद्धि हेतु शंख के समक्ष ‘¬ नमः अन्नपूर्णा शंखाय मम गृह अन्नपूर्णा शंख देहि-देहि स्वाहा।’ का जप करते हुए साधना करें। अन्नपूर्णा शंख एक अति चमत्कारी शंख होता है। जिस घर में यह शंख स्थापित होता है वह धन धान्य से भरा होता है।



शंख विशेषांक  आगस्त 2009

ज्योतिष में शंख का क्या महत्व है, विभिन्न शंखों की उपयोगिता, शंख कहां-कहां पाए जाते है, शंख कितने प्रकार के होते है तथा घर में या पूजास्थल पर कौन सा शंख रखा जाना चाहिए और क्यों? यह विशेषांक शंखों से आपका पूर्ण परिचय कराने में मदद करेगा.

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