शंख एक अध्ययन

शंख एक अध्ययन  

शंख एक अध्ययन यशकरन शर्मा भारतीय सभ्यता और संस्कृति के इतिहास में रुचि रखने वाले प्रत्येक हिंदू धर्मावलंबी के मन में शंख के प्रति विशेष आस्था है। प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान तथा जीवन में होने वाले 16 संस्कारों तथा अन्य कर्मकांडों में शंख का अपना अलग महत्व है। हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और गोपनीय कर्म ‘गुरु दीक्षा’ में शंख का महत्व किसी से छिपा नहीं है। गुरु शंख से शिष्य के कान में गुरु मंत्र फूंकता है। इस प्रक्रिया के प्रति आस्तिक समाज में विशेष श्रद्धा है। आरती के समय मंदिरों में शंख ध्वनि की जाती है। मान्यता है कि आरती के समय शंख ध्वनि करने वाले व्यक्ति के समस्त पाप समूल नष्ट हो जाते हैं। शंख ध्वनि का वैज्ञानिक आधार भारतीय वैज्ञानिकों के अनुसार शंख ध्वनि का वातावरण पर विशेष प्रभाव पड़ता है। शंख ध्वनि जहां तक पहुंचती है वहां तक के वातावरण में रहने वाले सभी किटाणु पूर्णतया नष्ट हो जाते हैं। इस तरह के सभी जीवाणु व रोग वातावरण में लगातार शंख ध्वनि होते रहने से पूर्ण रूप से समाप्त हो जाते हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार शंख में जल भरने के बाद मंदिर में रख देना चाहिए और फिर घर की सभी वस्तुओं पर छिड़क देना चाहिए। जिस तरह से किसी भी धातु के बर्तन में रखे हुए जल में उस धातु के गुण आ जाते हैं, उसी प्रकार शंख में रखे हुए जल में भी शंख के गुण आ जाते हैं। इस जल को मानव शरीर पर छिड़कने से संक्रामक रोग से उसकी रक्षा होती है और उसके जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान का आरंभ शंख ध्वनि से किया जाता है। हिंदू धर्म में इसे प्रार्थना करने की मुख्य वस्तु माना जाता है। प्रत्येक शंख का एक विशेष नाम होता है। विष्णु का शंख पांचजन्य शंख कहलाता है। अर्जुन शंख देवदत्त, भीम का पौंड्र, युधिष्ठर का अनंतविजय, नकुल का सुघोष और सहदेव का शंख मणिपुष्पक नाम से जाना जाता था। वैज्ञानिक महत्व: शंख को कानों के करीब ले जाने पर समुद्र की हिलोरों की सी हल्की-हल्की ध्वनि सुनाई पड़ती है। शंख की ध्वनि से उत्पन्न कंपन पृथ्वी की नकारात्मक व विध्वंसक शक्तियों को रोकने में समर्थ हो सकते हंै। इसके अतिरिक्त इन कंपनों के फलस्वरूप प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग से बचाव हो सकता है तथा ओजोन लेयर के सुराख भर सकते हैं। विज्ञान के अनुसार शंख बजाने से बजाने वाले के अंदर साहस, दृढ़ इच्छाशक्ति, आशा व उत्साह जैसे गुणों का संचार होता है। केवल वादक में ही नहीं, उस वातावरण में रहने वाले अन्य लोगों में भी इन गुणों का संचार होता है। लोकश्रुति के अनुसार शंख की ध्वनि से पशुओं को घबराहट होने लगती है, जिससे पूजा स्थल में ईश्वर ध्यान में पुजारी को सर्प इत्यादि खतरनाक जीव बाधा नहीं पहुंचाते। ऐसी भी मान्यता है कि शंख ध्वनि से बुरी आत्माएं दूर भागती हैं। शंख के इन्हीं गुणों के कारण पूर्वी भारत में प्राकृतिक आपदाएं व भूचाल इत्यादि आने पर शंखनाद करने की परंपरा आज भी प्रचलित है। इसके पीछे भावना यह होती है की भक्त जगत के पालनकर्ता (संरक्षक) को रक्षा के लिए पुकार रहा है। शंख का आयुर्वेदिक या औषधीय महत्व आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार शंख का विशेष औषधीय महत्व है। सावधनीपूर्वक शंख भस्म निर्मित दवाएं बहुत से रोगों को दूर कर देती हैं। योग साधना करते समय नियमित रूप से शंख बजाने से श्वास नली मजबूत होती है, हृदय रोग दूर होता है तथा रोगप्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है। शंख से जुड़े सभी धार्मिक विश्वास वैज्ञानिक आधार लिए हुए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ध्वनि के प्रसारण में सूर्य की किरणें बाधा उत्पन्न करती हैं। इसलिए शंख ध्वनि का उपयुक्त समय प्रातः काल या सायंकाल माना गया है, जब सूर्य की किरणों का घनत्व कम होता है। शंख ध्वनि समस्त संक्रामक रोगों के किटाणुओं को नष्ट करती है। भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस ने इस तथ्य को प्रयोगों के माध्यम से सत्य साबित किया। शंख ध्वनि का श्रवण हकलाहट तथा बहरापन को दूर करता है। जो व्यक्ति नियमित रूप से शंख बजाता है, उसे श्वास रोग, अस्थमा तथा फेफड़ों के रोग में आराम मिलता है। शंख ध्वनि कई प्रकार के रोगों को दूर कर सकती है। नियमित रूप से की गई शंख ध्वनि हवा तथा वातावरण को शुद्ध रखती है। ऐसा मान्यता है कि जब शंख बजाया जाता है तो यह पुण्य की पाप पर विजय का ऐलान करता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अत्यंत उच्च स्वर में महाभारत के युद्ध में शंखनाद करके पूरे संसार को चकित कर दिया था। शंख के प्रकार शंख कई प्रकार के होते हैं। इनमें प्रमुख इस प्रकार हैं। दक्षिाणावर्ती श्ंाख वामावर्ती शंख गणेश शंख गौमुखी शंख कौड़ी शंख मोती शंख दक्षिणावर्ती शंख: जो शंख दाहिनी (दक्षिण) ओर खुलता है, दक्षिणावर्ती शंख कहलाता है। यह बड़ा दुर्लभ होता है। यह सफेद रंग का होता है तथा इस पर भूरी रेखाएं होती हैं। धन के देवता कुबेर की दिशा दक्षिण है, इसलिए दक्षिणावर्ती शंख धन संपत्ति व ऐश्वर्य का प्रतीक माना जाता है। इसका आकार अनाज के दाने जैसा तथा नारियल जितना बड़ा हो सकता है। यह बहुत गहरे समुद्र में मिलता है। वामावर्ती शंख: यह शंख बाईंं ओर खुलता है, इसीलिए यह वामावर्ती शंख कहलाता है। यह शंख आसानी से मिल जाता है तथा सभी धार्मिक कार्यों में इसका प्रयोग होता है। अधिकतर शंख वामावर्ती होते हैं। ज्योतिषीगण इन शंखों को ऋणात्मक ऊर्जाओं को दूर करने हेतु प्रयोग करने की सलाह देते हैं। वामावर्ती शंख के बजाने से समस्त ऋणात्मक ऊर्जाएं समाप्त होती हैं तथा आस-पास के वातावरण व आत्मा का शुद्धिकरण होता है। गणेश शंख: यह शंख कीमती और सर्वाधिक प्रभावशाली राज्य शंखों में एक है। इस शंख की पूजा विघ्नों के नाश तथा सफलता प्राप्ति हेतु की जाती है। इस शंख को विद्या प्राप्ति और सौभाग्य तथा पारिवारिक उन्नति के लिए श्रेष्ठतम माना गया है। गौमुखी शंख: इस शंख का आकार गाय के मुंह जैसा होता है। इस पवित्र शंख की उपासना से सुख, सौभाग्य, सौंदर्य व समृद्धि की प्राप्ति होती है। कौड़ी शंख: इस शंख को प्राचीन भारत में ऐश्वर्य तथा वैवाहिक सुख का प्रतीक माना गया है। इसे संतान, संपŸिा व मान-सम्मान की रक्षा हेतु प्रयोग किया जाता है। मोती शंख: मोती जैसी चमक रखने वाले इस शंख को सौभाग्य का प्रतीक माना गया है। यह शंख जगदीश चन्द्र बोस भी अत्यतं दलु भर्् ा माना गया है।



शंख विशेषांक  आगस्त 2009

ज्योतिष में शंख का क्या महत्व है, विभिन्न शंखों की उपयोगिता, शंख कहां-कहां पाए जाते है, शंख कितने प्रकार के होते है तथा घर में या पूजास्थल पर कौन सा शंख रखा जाना चाहिए और क्यों? यह विशेषांक शंखों से आपका पूर्ण परिचय कराने में मदद करेगा.

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