वास्तु के कुछ उलझे नियम

वास्तु के कुछ उलझे नियम  

किसी भी घर, आॅफिस या उद्योग को वास्तु सम्मत बनाने में ऐसे अनेकानेक बिंदु एवं नियम आते हैं जब कि एक नियम मानें तो दूसरे नियम की उपेक्षा होती है। किसी भी घर या आॅफिस को पूर्णतया वास्तु सम्मत बनाना तो संभव ही नहीं हो पाता। कई बार परिस्थितिवश भी वास्तु नियमों का पालन कठिन या असंभव हो जाता है। ऐसी स्थिति में जो नियम अधिक फलदायी होते हैं, उन्हें चुनना ही उचित है। यदि ईशान व नैर्ऋत्य कोण में ठीक से नियमों का पालन कर लिया जाए, तो वह स्थान अनुकूल और उपयोगी हो सकता है। किन नियमों का पालन कैसे करें, आइए एक दृष्टि में देखें। ईशान बड़ा व खुला होना: ईशान में वास्तु पुरुष का मस्तिष्क माना गया है। यदि ईशान बंधा हो, या स्थान कम या कटा हो, तो मस्तिष्क काम नहीं करता। निर्णय गलत हो जाते हैं। मेहनत करके भी लाभ नहीं होता। इस कोण को सर्वदा स्वच्छ व सुगंधमय रखना चाहिए ताकि घर में अधिक से अधिक ऊर्जा का प्रवेश हो। इस कोण में जल स्रोत या फव्वारा भी उŸाम होता है, लेकिन गंदे पानी का निकास इस ओर से नहीं होना चाहिए। इसके अतिरिक्त यह कोण अन्य सभी स्थानों से नीचा होना चाहिए। नीचे होने के कारण बारिश का पानी इसी ओर से बाहर निकलता है। यह शुभ माना गया है, क्योंकि वर्षा का पानी पूर्ण शुद्ध जल होता है। इसी ओर चापाकल या भूमिगत पानी की टंकी होना भी शुभ है। सकारात्मक ऊर्जा सदैव प्राप्त हो इसलिए दैव प्रतिष्ठा भी इसी कोण में की जानी चाहिए। यदि ईशान ठीक हो, तो मानसिक कष्ट, धन का अपव्यय व स्वास्थ्य संबंधी कष्ट नहीं होते हैं। इस ओर चटकीले व हल्के रंगों का उपयोग करना चाहिए। नैर्ऋत्य ऊंचा व सूखा होना: नैर्ऋत्य कोण में वास्तु पुरुष के पैर होते हैं। वास्तु पुरुष स्थिर रह सके इसलिए यह कोण ठोस, ऊंचा व सूखा रहना चाहिए। यदि कोण नीचा होता है, तो रहने वाले निश्चय ही रोग का शिकार हो जाते हैं। यदि यह खुला हो, तो सकारात्मक ऊर्जा का निकास हो जाता है और नकारात्म ऊर्जा जातक को रोगी बना देती है। चोर आदि उस स्थान पर कब्जा कर लेते हैं। यदि इस कोण में पानी बहता हो, तो व्यय बढ़ जाते हैं। केवल नैर्ऋत्य एवं ईशान कोण को सही रखा जाए, तो अधिकांश वास्तु दोष दूर हो जाते हैं। नैर्ऋत्य कोण में भूखंड अवश्य ही समकोणिक (900 का) होना चाहिए। कोई भी भवन निर्माण पहले इसी कोण में किया जाए एवं बाकी कोणों से 1-2 फुट अधिक रखा जाए, तो निर्माण दोषमुक्त रहता है और कोई व्यवधान नहीं आता। पानी की टंकी: पानी की टंकी भवन को भार प्रदान करती है। अतः टंकी को नैर्ऋत्य में रखने को मान्यता दी जाती है। लेकिन नैर्ऋत्य कोण हमेशा सूखा रहना चाहिए और वहां किसी तरह की गतिविधि नहीं होनी चाहिए। पानी की टंकी से पानी की गति बनी रहती है। कभी पानी रिसता है, ओवरफ्लो भी करता है जिससे कोण सूखा नहीं रह पाता। अग्नि कोण में पानी नहीं होना चाहिए। ब्रह्मस्थल खुला एवं हल्का होना चाहिए। ईषान, पूर्व व उŸार भी हल्के होने चाहिए। अतः पानी की टंकी को दक्षिण, पष्चिम या वायव्य कोण में ही रखना श्रेष्ठ है। लेकिन भूमिगत शुद्ध जलाशय यथासंभव ईशान में रखें और सेप्टिक टैंक वायव्य या पश्चिम कोण में ही बनाएं। सीढ़ियां: वास्तु नियमों के अनुसार नैर्ऋत्य अन्य सभी कोणों से भारी और बंद होना चाहिए। चहल-पहल या गतिविधि ईशान में होनी चाहिए और नैर्ऋत्य स्थिर या रुका होना चाहिए। इसीलिए नैर्ऋत्य में भंडार गृह को सबसे अधिक मान्यता दी गई है। यदि नैर्ऋत्य में सीढ़ियां बना दी जाती हैं, तो यह कोण भारी और ऊंचा हो जाता है। लेकिन गतिविधि एवं किसी भी तल पर प्रवेश स्थान नैर्ऋत्य कोण हो जाता है। इसीलिए सीढ़ियां नैर्ऋत्य में शुभ नहीं होतीं, अपितु ईशान में सभी तलों पर सुप्रवेश प्रदान करती हैं। शहरों में छोटे भूखंड होने के कारण प्रवेश सामने से ही रखना पड़ता है। यदि भूखंड ईशान, उŸार या पूर्वमुखी हो, तो सीढ़ियों को ईशान कोण में रखना उŸाम हो जाता है। इससे प्रवेश द्वार व ईशान में गतिविधि के नियम अच्छी प्रकार से लागू हो जाते हैं। ऊंचाई अधिक न हो इसके लिए छत तक सीढ़ियों को न ले जाकर उच्चतम तल तक ही ले जाएं। छत के लिए सीढ़ियां उच्चतम तल से किसी और कोण से ले जाएं जैसे दक्षिण या पश्चिम से। अन्यथा छत पर नैर्ऋत्य भाग में एक कमरा बना दें ताकि सीढ़ी की ऊंचाई का दोष भी न रहे। बेसमेंट: वास्तु नियम के अनुसार दक्षिण या पश्चिम भूखंड पर भवन अधिकांशतः नैर्ऋत्य, दक्षिण या पश्चिम की ओर बनाया जाता है, ताकि ईशान, उŸार या पूर्व खुला रहे और नैर्ऋत्य अधिक भारी हो। यदि भवन के नीचे ही बेसमेंट बना दिया जाए, तो ईशान ऊंचा व भारी हो जाता है। अतः या तो बेसमेंट पूर्व व उŸार में भवन से अधिक भूखंड की सीमा तक बनाएं या ईशान में बेसमेंट से अधिक गहरा पानी का टैंक बनवाएं। पूर्व या उŸार के गलियारे में बेसमेंट की सतह व छत दोनों नीचे रखी जा सकती हैं ताकि भूमितल पर यह स्थान पार्किंग आदि के लिए उपयोग में लाया जा सके। साथ ही भवन के नीचे बेसमेंट को हवा व रोशनी के लिए स्थान प्राप्त हो सके।


वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2009

वास्तु का मौलिक रूप एवं मानव जीवन पर इसका प्रभाव एवं महत्व, स्कूल / कालेज, अस्पताल, मंदिर, उद्दोग एवं कार्यालय हेतु वास्तु नियम, ज्योतिषीय उपायों द्वारा वास्तु ज्योतिष निवारण, बिना तोड़-फोड किए वास्तु उपाय दी गए है.

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