चंगेज खान यद्गाकरन शर्मा सितारों की कहानी सितारों की जुबानी स्तंभ में हम जन्मपत्रियों के विश्लेषण के आधार पर यह बताने का प्रयास करते हैं कि कौन से ग्रह योग किसी व्यक्ति को सफलता के शिखर तक ले जाने में सहायक होते हैं। यह स्तंभ जहां एक ओर ज्योतिर्विदों को ग्रह योगों का व्यवहारिक अनुभव कराएगा, वहीं दूसरी ओर अध्येताओं को श्रेष्ठ पाठ प्रदान करेगा तथा पाठकों को ज्योतिष की प्रासंगिकता, उसकी अर्थवत्ता तथा सत्यता का बोध कराने में मील का पत्थर साबित होगा। विश्व के इतिहास में महानतम योद्धेद्धाओं की सूचूची में मंगंगोलेल साम्रा्राज्य के संस्ंस्थापक चंगंगेजेज खान का नाम सूरूरज की तरह चमकता रहेगेगा। कहते हैैंं कि चंगंगेजेज खान के जन्म के समय उसकी हथेलेली पर पाए गए खूनून के धब्बे को देखेखकर भविष्यवक्ताओं ने यह भविष्यवाणी की थी कि चंगंगेजेज खान तेजेजस्वी योद्धेद्धा बनेगेगा। कौनैन से ग्रह्रह योगेग ने इन्हें महापराक्रमी औरैर जगन्नायक अजेयेय योद्धेद्धा बनाया? आइए जानें।ं। चंगेज खान श्रेष्ठतम स्तर का सैनिक व युद्ध कौशल से युक्त था। उसके साम्राज्य में पूरा चीन, मध्य एशिया और भारत की सिंधु नदी तक का क्षेत्र शामिल था। चंगेज खान के पिता की मृत्यु के समय इनकी आयु मात्र 13 वर्ष की थी। चंगेज खान ने जीवन भर लगातार युद्ध लड़ते हुए मात्र 43 वर्ष की अवस्था में आते-आते अपनी शक्ति व सत्ता का विशेष सुदृढ़ीकरण कर लिया था। चंगेजखान ने अपने जीवन की उतरार्द्ध पारी में अपने साम्राज्य को पश्चिम में तुर्कीस्तान की जकार्टिस नदी और बोखारा तक फैलाया। उसकी सेनाएं जॉर्जिया, इंडस, पेशावर और लाहौर होते हुए चीन पहुंची और वह पूरे चीनी साम्राज्य का शासक बन बैठा। चंगेज खान उतरी पूर्वी एशिया की खानाबदोश/भ्रमणशील जातियों का एकीकरण करके सत्ता में आया। चंगेज खान ने एक ऐसे साम्राज्य की नींव रखी जो उसकी मृत्यु के बाद एक अत्यंत विशाल साम्राज्य में परिवर्तित हो गया। महान सैन्यशक्ति प्रभुत्व स्थापित करने के अतिरिक्त चंगेज खान ने मंगोल साम्राज्य की लेखन प्रणाली के लिए ऊधुर लिपि को अपनाया। उसने मंगोल साम्राज्य में धार्मिक सहिष्णुता की भावना को बढ़ावा दिया। आज के मंगोल चंगेज खान को मंगोलिया के संस्थापक पिता के रूप में सम्मानित करते हैं। चंगेज खान लंबे ऊंचे छरहरे बदन, लाल दाढ़ी और हरी आंखों वाला चमकदार व्यक्तित्व था। कौन से ग्रह योग ने चंगेज खान को विश्व प्रसिद्ध एवं पराक्रमी योद्धा बनाया इसका अध्ययन करने हेतु प्रस्तुत है इनकी जन्मपत्री का संक्षिप्त विश्लेषण। जन्मकुंडली के तृतीय भाव, तृतीयेश व मंगल से जातक के पराक्रम तथा व्यक्तिगत, सामाजिक व राजनैतिक प्रभाव का विचार किया जाता है। चंगेज खान की जन्मपत्री में चं, रा. व केतु को छोड़कर अन्य सभी छः ग्रह तृतीय भाव में विराजमान हैं। ज्योतिष में नियम है कि जिस भाव पर जितने अधिक ग्रहों का प्रभाव होता है वह भाव उतना अधिक बली हो जाता है। इस कारण चंगेजखान महान पराक्रमी व अद्वितीय कार्यक्षमता वाले वीर योद्धा बने। युद्ध व पराक्रम का कारक मंगल कर्क लग्न के लिए विशेष कारक माना जाता है। ऐसे कारक मंगल का पांच ग्रहों से संयुक्त होकर व वर्गोत्तमी होकर इस भाव में बैठना इनके महान युद्ध कौशल का कारक बना। इसके अतिरिक्त पराक्रमेश बुध तृतीय भाव में स्वगृही व उच्च राशिस्थ है जिसने इन्हें तुरंत निर्णय लेने की तथा तुरंत निर्णय लेकर शत्रु पर टूट पड़ने की क्षमता प्रदान की। निष्कर्षतः कह सकते हें कि तृतीय भाव से पराक्रम विचार हेतु भाव, भावेश व कारक तीनों की स्थिति श्रेष्ठतम होने के कारण कुंडली में महान योद्धा बनने का योग पूर्णतया सफल सिद्ध हुआ। तृतीय भाव में स्थित शुक्र नीच भंग राजयोग बनाकर इस भाव को अतिरिक्त बल प्रदान कर रहा है। चंगेज खान एक घुमक्कड़ और विजेता था। सारावली के अनुसार जब किसी जातक की कुंडली में षडग्रही योग हो तो ऐसा जातक घूमने फिरने वाला खानाबदोष, योद्धा और अच्छे आचरण वाला व्यक्ति होता है। लग्नेश केंद्र में केतु के साथ स्थित होकर जातक को तेजस्वी, हिंसक, खतरनाक और धूर्त बनाता है क्योंकि केतु को अग्निकारक, आगलगाऊ, दाहक, उत्तेजक और विद्रोहात्मक ग्रह माना जाता है। साहस, हिम्मत और पराक्रम के तृतीय भाव में पंचमेश, भाग्येश, चतुर्थेश, सप्तमेश, दशमेश, द्वितीय, तृतीयेश व लाभेश आदि की युति श्रेष्ठ राजयोग का निर्माण कर रही है। अर्थात् लग्नेश केंद्र में केतु के साथ बैठकर चंगेज खान को तेजस्वी बना रहा है और शेष सभी केंद्रेश, त्रिकोणेश, द्वितीयेश व लाभेश पराक्रम भाव में पराक्रमेश के साहचर्य में प्रबल राजयोग का सृजन कर रहे हैं। जिस तरह से तृतीय भाव पर अनेकानेक ग्रहों के प्रभाव से चंगेज खान पराक्रमी हुआ उसी प्रकार इन सभी ग्रहों की भाग्य भाव पर दृष्टि के प्रभाव से महाभाग्यवान भी हुआ। लघु जातक सर्वस्व के अनुसार जब सभी ग्रह चंद्रमा से बारहवें भाव में अवस्थित होकर छठे भाव पर दृष्टि डालें तो एक विचित्र राजयोग का निर्माण होता है जिसके तहत जातक 68 वर्ष तक जीवित रहता है। यह राजयोग चंगेज खान पर पूरी तरह से लागू हुआ और वह जीवन पर्यंत युद्ध लड़ता रहा। इस कुंडली से यह भी देखा जा सकता है कि इसमें सभी छहों ग्रह चंद्रमा से द्वादश भाव में स्थित होकर अनफा योग का सृजन कर रहे हैं जो यह स्पष्ट करते हैं कि जातक बलिष्ठ, प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी, सम्मानित और शौकीन प्रवृत्ति का होगा। चंद्रमा व शुक्र मन कोमल भावनाओं कलात्मक प्रवृत्ति तथा सांसारिक सुखों के प्रतीक ग्रह हैं। इन दोनों के पीड़ित होने से जातक कोमल भावनाओं को न समझने वाला क्रूर व्यक्ति होता है। शायद इसलिए चंगेज खान को भी मनुष्य के वेश में दैत्य समझा जाता है। राहु यदि कुंडली में बलवान हो तो वह जिस भाव में बैठता है उस भाव से संबंधित प्रभाव को जीवन के 42वें वर्ष में प्रकट करता है। चंगेज खान की कुंडली में पराक्रमी राजा व बलवान योद्धा बनने के सभी योग विद्यमान हैं तथा राहु राजयोग के दशम भाव में स्थित है इसलिए 43 वर्ष की अवस्था में वह एक सफल व सुदृढ़ साम्राज्य की नींव स्थापित करने में सफल हुआ। - ज्योतिष शिक्षा - जन्मकुंडली के तृतीय भाव, तृतीयेश व मंगल से जातक के पराक्रम तथा व्यक्तिगत, सामाजिक व राजनैतिक प्रभाव का विचार किया जाता है। चंगेज खान की जन्मपत्री में छः ग्रह तृतीय भाव में विराजमान हैं। जिस भाव पर जितने अधिक ग्रहों का प्रभाव होता है वह भाव उतना अधिक बली हो जाता है। जिस तरह से तृतीय भाव पर अनेकानेक ग्रहों के प्रभाव से चंगेज खान पराक्रमी हुआ उसी प्रकार इन सभी ग्रहों की भाग्य भाव पर दृष्टि के प्रभाव से महाभाग्यवान भी हुआ। सारावली के अनुसार जब किसी जातक की कुंडली में षडग्रही योग हो तो ऐसा जातक घूमने फिरने वाला खानाबदोष व योद्धा होता है। लग्नेश केंद्र में केतु के साथ बैठकर चंगेज खान को तेजस्वी बना रहा है और शेष सभी केंद्रेश, त्रिकोणेश, द्वितीयेश व लाभेश पराक्रम भाव में पराक्रमेश के साहचर्य में प्रबल राजयोग का सृजन कर रहे हैं। लघु जातक सर्वस्व के अनुसार जब सभी ग्रह चंद्रमा से बारहवें भाव में अवस्थित होकर छठे भाव पर दृष्टि डालें तो राजयोग का निर्माण होता है। चंद्रमा व शुक्र दोनों के पीड़ित होने से जातक कोमल भावनाओं को न समझने वाला क्रूर व्यक्ति होता है। राहु यदि कुंडली में बलवान हो तो वह जिस भाव में बैठता है उस भाव से संबंधित प्रभाव को जीवन के 42वें वर्ष में प्रकट करता है।

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वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2010

वास्तु का शाब्दिक अर्थ है 'वास' अर्थात् वह स्थान जहां पर निवास होता है। इस सृष्टि की संरचना में पंचतत्व (अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाष) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं तो भवन निर्माण करते समय में भी इनकी उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता।प्रस्तुत विषेषांक में 'वास्तु' से संबंधित समस्त महत्वपूर्ण जानकारी का उल्लेख है

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