सचिन तेंदुलकर यशकरन शर्मा सितारों की कहानी सितारों की जुबानी स्तंभ में हम जन्मपत्रियों के विश्लेषण के आधार पर यह बताने का प्रयास करेंगे कि कौन से ग्रह योग किसी व्यक्ति को सफलता के शिखर तक ले जाने में सहायक होते हैं। यह स्तंभ जहां एक ओर ज्योतिर्विदों को ग्रह योगों का व्यावहारिक अनुभव कराएगा, वहीं दूसरी ओर अध्येताओं को श्रेष्ठ पाठ प्रदान करेगा तथा पाठकों को ज्योतिष की प्रासंगिकता, उसकी अर्थवत्ता तथा सत्यता का बोध कराने में मील का पत्थर साबित होगा। अपने बीस साल के लंबे कैरियर में सचिन ने यह बात साबित कर दी है कि क्रिकेट के मौजूदा दौर में वह बेनजीर हैं। इस दौरान उन्होंने अनेक रिकॉर्ड तोड़े, अनेक खड़े किए। अभी उनके बल्ले की धार पैनी है - उन्हें कहां तक ले जाएगी यह समय के गर्भ में है। लेकिन फिर यह सचिन के साथ ही क्यों? मैदान में तो और भी एक से एक खिलाड़ी हैं, उनके साथ क्यों नहीं? जिज्ञासा स्वाभाविक है - कैसे? आइए, जानें प्रस्तुत आलेख में... पाकिस्तान के कराची स्टेडियम में जब एक 15 वर्षीय बालक भारत व पाकिस्तान के मध्य खेले जा रहे टेस्ट मैच में खेलने के लिए उतरा, तो किसी ने सोचा भी नहीं था कि वह इस युग का महानतम क्रिकेट खिलाड़ी बनेगा। सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट में इतने अधिक कीर्तिमान स्थापित कर दिए हैं कि उन्हें सचिन रमेश तेंदुलकर की बजाय सचिन रिकॉर्ड तेंदुलकर कहें तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इन्हें क्रिकेट का शाहंशाह, क्रिकेट का भगवान आदि नामों से भी जाना जाता है। क्रिकेट जगत में इनकी लोकप्रियता स्वाभाविक है। टेस्ट मैचों में सर्वाधिक शतक ठोकने का रिकॉर्ड तेंदुलकर के नाम है। तेंदुलकर न केवल टेस्ट क्रिकेट में, अपितु एक दिवसीय क्रिकेट में भी सर्वश्रेष्ठ हैं। मौजूदा दौर के खिलाड़ियों में समस्त विश्व से केवल एक नाम जो ब्रैडमैन एकादश में शामिल है वह सचिन रमेश तेंदुलकर का है। अभी हाल ही में आस्ट्रेलिया के विरुद्ध खेलते हुए तेंदुलकर ने क्रिकेट में 20 वर्षों के लंबे कैरियर को पूरा करते हुए एक और शतक बनाकर एक दिवसीय क्रिकेट में 17000 रनों का विशाल पहाड़ खड़ा करके यह साबित कर दिया कि अभी भी उनके अंदर काफी लंबे समय तक क्रिकेट खेलने की क्षमता है। सबसे अधिक शतकों व रनों के अतिरिक्त 90 से 99 रनों के बीच सबसे अधिक रन बनाने का रिकॉर्ड भी इन्हीं के नाम है। एक दिवसीय मैचों में इन्हें 56 बार मैन ऑफ द मैच का पुरस्कार मिला जो एक रिकॉर्ड है। इन्हें सर्वाधिक 14 बार मैन ऑफ द सीरीज चुना गया। मैन ऑफ द मैच में सर्वाधिक औसत का रिकॉर्ड इन्हीं के नाम है। सचिन एक दिवसीय क्रिकेट में 10,000 व 15000 रनों का आंकड़ा पार करने वाले विश्व के पहले खिलाड़ी हैं। 2007 के विश्व कप में इन्होंने सर्वश्रेष्ठ औसत 59.87 से सर्वाधिक 1796 रन बनाए। उन्हें विश्व कप में सब से अधिक मैन ऑफ द मैच का पुरस्कार मिला। 1996 के विश्व कप में इन्होंने 87.16 की औसत से सर्वाधिक 523 रन और फिर 2003 के विश्व कप में सर्वाधिक 673 रन बनाए। 2003 के विश्व कप में तो इन्हें सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का पुरस्कार भी मिला। एक दिवसीय मैचों में सब से अधिक अर्द्ध शतकों का रिकॉर्ड भी इन्हीं के नाम है। इस तरह, टेस्ट क्रिकेट के सर्वोच्च सम्मान, उपलब्धियां व रिकॉर्ड सचिन ने अपने नाम कर लिए। सचिन तेंदुलकर की लंबी रिकार्ड बुक पर नजर डालें तो बहुत आश्चर्य होता है। गत 20 नवंबर 2009 को सचिन ने 43 वां टेस्ट शतक बनाकर वन डे और टेस्ट मैचों में रनों के योग को 30,000 तक पहुंचाकर एक नया आसमान छू लिया। इतनी प्रतिभा, इतना सम्मान, इतनी लोकप्रियता कैसे? आइए जानें ज्योतिष के आइने से... सचिन रमेश तेंदुलकर का जन्म 21 अप्रैल 1973 को मुंबई में हुआ। लग्न कन्या है, जो प्रतियोगिता, परीक्षा व खेल जगत में सफलता के लिए उत्तम माना गया है। पराक्रमेश मंगल का उच्च राशि में होना विशेष महत्वपूर्ण है, क्योंकि मंगल स्वयं पराक्रम का नैसर्गिक कारक ग्रह होता है। मंगल की इस स्थिति के फलस्वरूप तेंदुलकर को खेल में अपना उत्कृष्ट पराक्रम दिखाने में सफलता मिली। सचिन तेंदुलकर की अद्वितीय प्रतिभा का कारण उनकी कुंडली में अष्टम भाव के राजयोग का होना है। कुंडली में अष्टम भाव में शुभ ग्रह शुक्र व उच्च राशिस्थ सूर्य के स्थित होने के अतिरिक्त अष्टमेश अष्टम भाव पर दृष्टि डाल रहा है। अष्टमेश स्वयं भी उच्च राशिस्थ है। अष्टम भाव से संबंधित सभी पक्षों के पूर्णतया बली व सकारात्मक होने के कारण इनके अंदर गुप्त व ईश्वरीय शक्ति विद्यमान है, जिसके फलस्वरूप इनमें अद्वितीय प्रतिभा व अद्भुत ऊर्जा का समावेश हो गया, क्योंकि ज्योतिष में अष्टम भाव को गुप्त शक्ति का स्रोत माना जाता है। अष्टम भाव के अतिरिक्त अष्टम से अष्टम अर्थात तृतीय भाव का स्वामी भी उच्च राशिस्थ अष्टमेश मंगल ही है। अष्टम (गुप्त शक्ति) व तृतीय भाव (पराक्रम) का बली होना ही इनकी सफलता का सबसे बड़ा कारक है। ज्योतिष में सिद्धांत है कि मंगल और गुरु की युति जातक को लौहपुरुष बना देती है। इनकी कुंडली के पंचम भाव में मंगल और गुरु की युति होने के फलस्वरूप इन्हें शारीरिक क्षमता के साथ-साथ मानसिक व आत्मिक बल प्रदान कर रही है। तेंदुलकर ने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में सन् 1989 में कदम रखा, जब उन पर दशम भाव में स्थित केतु की दशा प्रभावी थी। वर्ष के उत्तरार्द्ध में दशम भाव व इसमें स्थित केतु पर शनि व गुरु का गोचरीय प्रभाव आ जाने से इन्हें विशेष सम्मान व खयाति मिली। वर्ष 1990 में भी इसी प्रकार का ग्रह योग बना रहा, जिसके परिणाम स्वरूप इन्होंने टेस्ट क्रिकेट में अपना पहला शतक बनाया। आत्मा के स्थिर कारक सूर्य तथा चर कारक मंगल के उच्च राशिस्थ होने के फलस्वरूप तेंदुलकर मानसिक रूप से विशेष ऊर्जावान व पराक्रमी हैं। जनवरी 1991 से इन पर द्वितीयेश व भाग्येश शुक्र की महादशा प्रारंभ हुई, जो अष्टम भाव में उच्च राशिस्थ अष्टमेश से दृष्ट है तथा धन भाव को देख रहा है। सूर्य और मंगल की सहायता से यह शुक्र अष्टम भाव के राजयोग का निर्माण कर रहा है। ज्योतिष में सिद्धांत है कि जो भाव अपने स्वामी ग्रह या शुभ ग्रह से युक्त वा दृष्ट हो, अथवा उच्च राशिस्थ ग्रह से युक्त हो, उस भाव की वृद्धि होती है। इस प्रकार शुभ ग्रह शुक्र ने इनकी तकनीकी व शैली को और अधिक परिष्कृत कर दिया। अष्टम भाव का राजयोग जातक को ऐश्वर्यशाली भी बनाता है। दशानाथ शुक्र की धनेश होकर धन भाव पर दृष्टि के फलस्वरूप तेंदुलकर को शुक्र की दशा में प्रचुर मात्रा में धन लाभ होता रहा। शुक्र की यह दशा उन पर अभी जनवरी 2011 तक चलती रहेगी। नवंबर 2011 के बाद इनके धन भाव, धनेश, भाग्येश व सूर्य पर गोचरीय गुरु और शनि का संयुक्त प्रभाव होगा। इस प्रकार उस समय इन्हें और भी अधिक धन लाभ होगा। साथ ही इन पर विपरीत राजयोग कारक उच्च राशिस्थ सूर्य की महादशा भी प्रारंभ होगी, जो इन्हें अक्षय कीर्ति प्रदान करेगी। 09 सितंबर 1994 में इनके धन भाव में गोचर में गुरु, चंद्र, शुक्र व राहु स्थित थे। गोचर में लग्नेश बुध उच्च राशिस्थ था। गोचर का मंगल दशम में तथा शनि लग्न से छठे भाव में स्थित था। इस दिन तेंदुलकर ने एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैच में अपना पहला शतक बनाया। वर्ष 1998 में शुक्र की महादशा तथा मंगल की अंतर्दशा के समय तेंदुलकर ने लगातार तीन शतक बनाए। वर्ष 1999 में नीच के शनि के अष्टम भाव पर गोचर के समय तेंदुलकर को पीठ का दर्द रहने लगा तथा विश्व कप के दौरान इनके पिता प्रोफेसर रमेश तेंदुलकर का देहांत हो गया। 23 अगस्त, 1999 तक वर्षारंभ से ही गोचर के मंगल व शनि के बीच परस्पर दृष्टि योग बना हुआ था, जिसका प्रभाव अष्टम भाव पर प्रतिकूल था तथा पिता के कारक सूर्य व पिता के भाव स्वामी (नवमेश) शुक्र भी इस प्रतिकूल गोचरीय प्रभाव से पीड़ित थे। अप्रैल 1998 से वर्ष 2000 तक शनि नीच राशिस्थ होकर अष्टम भाव को प्रभावित करता रहा। इस समय तेंदुलकर को पीठ दर्द हुआ, पिता की मृत्यु हुई, इन्हें भारतीय क्रिकेट टीम की कप्तानी सौंपी गई लेकिन कप्तान के रूप में असफल रहे, इनकी तीव्र आलोचना भी हुई और अंततः इ्रन्होंने कप्तान का पद छोड़ दिया। वर्ष 2001 में शनि व गुरु का गोचरीय प्रभाव इनके भाग्य भाव में हुआ और इन्होंने फिर से सफल वापसी की। इनके लिए 2002 का वर्ष भी शुभ रहा। 2003 के विश्व कप में इन्होनें 673 रन बनाए और इन्हें मैन ऑफ द सीरीज का पुरस्कार मिला। इस प्रकार वर्ष 2003 में तेंदुलकर के लिए शनि की दशम भाव में ढैया तथा गोचर के गुरु का उच्च राशिस्थ होकर जन्मकुंडली के लाभ भाव, लाभेश, पराक्रम, दशम से दशमेश लग्नेश व दशमेश को प्रभावित करना अत्यंत लाभकारी सिद्ध हुआ। 2003 से 2008 तक तेंदुलकर का प्रदर्शन लगातार श्रेष्ठ होता गया और इन्होंने अनेक कीर्ति स्तंभ अर्जित किए। वर्ष 2009 में तेंदुलकर के बेमिसाल प्रदर्शन से सभी आश्चर्यचकित हैं। इस समय गोचर म चंद्र से ग्यारहवें भाव में होने के कारण शनि श्रेष्ठ है तथा जन्म लग्न, लग्नेश व दशमेश बुध सभी को प्रभावित कर रहा है। यदि कुंडली में श्रेष्ठ योग होने के कारण कुंडली विशेष बलवान हो जाए तो प्रतिकूल दशाएं जातक को अधिक हानि नहीं पहुंचा सकतीं तथा श्रेष्ठ दशाएं व श्रेष्ठ गोचर जातक को बुलंदी के शिखर पर पहुंचा सकता है। वर्ष 2011 के उत्तरार्द्ध की गोचरीय स्थिति का तथा उस समय की महादशा का विश्लेषण करने से प्रतीत होता है कि क्रिकेट का यह महानायक अभी और करिश्मे दिखाएगा। ज्योतिष ज्ञान अष्टम भाव के राजयोग से गुप्त ज्ञान, अद्वितीय प्रतिभा व ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। शनि के गोचर में श्रेष्ठ होने की स्थिति में लग्न, लग्नेश और दशमेश तीनों के प्रभावित होने पर विशेष खयाति लाभ होता है। राजयोग में सहायक ग्रह की महादशा विशेष लाभकारी सिद्ध होती है - जैसे प्रस्तुत कुंडली में शुक्र की। शनि और मंगल का परस्पर दृष्टि योग अनिष्टकारी सिद्ध होता है - जैसे तेंदुलकर की कुंडली में 1999 के वर्षारंभ से अगस्त तक के गोचर में। नीच के शनि का लग्न से अष्टम भाव में गोचर कष्ट, असफलता, स्वास्थ्य संबंधी परेशानी तथा मानहानि करवाता है। अनेक नीच व उच्च ग्रह पत्री में नीच भंग राजयोग बनाते हैं।

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