प्रश्न कुडलियों का विश्लेषण

प्रश्न कुडलियों का विश्लेषण  

यह जातक एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं कुछ समय से इनके कार्यालय में नौकरी छंटनी शुरू हुई ऐसे में इनका परेशान होना स्वाभाविक था। क्योंकि इनकी नौकरी पर भी खतरा हो सकता था। इसी परेशानी के दौर में इन्होंने प्रश्न किया ”क्या इनकी नौकरी को खतरा हो सकता है? क्या नौकरी में बदलाव का वक्त है और नई नौकरी कैसी व कहां हो सकती है ?“ आइए इनके प्रश्न को प्रश्न कुंडली के माध्यम से देखें। शीर्षोदय, चर लग्न व चर नवांश स्थिति में परिवर्तन दर्शाता है। केंद्र व त्रिकोण में शुभ, अशुभ ग्रहों का मिश्रित प्रभाव है। लग्न चंद्र के नक्षत्र में है जो दशमेश है अतः प्रश्न नौकरी से संबंधित है। लग्न पर केवल शनि की दृष्टि है जो चतुर्थेश व पंचमेश है, लग्नेश का दशम में स्थित होना भी व्यवसाय से संबंधित प्रश्न दर्शाता है। लग्नेश दशम में राहु केतु अक्ष में स्थित है जो किसी परेशानी का संकेत है। दशमेश चंद्र दशम भाव से अष्टम में बाधाएं दर्शाता है। दशम भाव में अष्टमेश की स्थिति, षष्टेश गुरु का चतुर्थ भाव से दशम की दृष्टि देना व लग्नेश का द्वादशेश से इत्थशाल नौकरी में बाधाएं दर्शा रहे हैं। साथ ही किसी प्रकार के तनाव को भी व्यक्त करते हैं। लग्नेश का पाप ग्रहों से संबंध अत्याधिक तनाव देता है। लग्नेश का दसवें भाव में बैठकर मंदगति ग्रह जो चैथे भाव में बैठा हो से संबंध हो तो नौकरी से निलंबन होता है (शुक्र व गुरु का इत्थशाल)। दशमेश का अपनी नीच राशि के स्वामी से पूर्ण इत्थशाल (चंद्र/मंगल) भी नौकरी से निलंबन दर्शाता है। (नोट - अगर इस इत्थशाल में द्वितीयेश व एकादशेश का संबंध हो तो भ्रष्टाचार का आरोप लग सकता है। सूर्य का एकादश भाव से अपनी राशि का होना व दशमेश चंद्र से कंबूल योग में लिप्त होना अच्छी नौकरी मिलने का संकेत है। लग्नेश का द्वादश में बैठे द्वादशेश से इत्थशाल नौकरी का संबंध बाहर से दर्शाते हैं। द्वितीयेश का नवम में स्थित होकर पंचम में बैठे दशमेश से पूर्ण इत्थशाल व द्वादशेश से भी पूर्ण इत्थशाल विदेश या घर से दूर पैसे का फायदा दर्शाते हैं। इन सभी योगों के आधार पर जातक से कहा गया कि उनकी नौकरी में अच्छे बदलाव का संकेत है इसलिए वर्तमान नौकरी जा सकती है नई नौकरी का संबंध बाहर से हो सकता है। 7 सितंबर 2009 को जब बुध वक्री हुआ तो जातक को छंटनी के कारण अपनी अच्छी नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा। आइए अब इनकी जन्म कुंडली में इस घटना की पुष्टि का प्रयास करें। यह सिंह लग्न की कुंडली है जिसके दशम भाव में शनि(व) जो कि सप्तमेश व षष्टेश है स्थित है। दशम भाव अन्य 4 ग्रहों गुरु (पंचमेश, अष्टमेश), सूर्य (लग्नेश) बुध(व) (द्वितीयेश, एकादशेश) व मंगल (चतुर्थेश व नवमेश) से प्रभावित है। दशम भाव का संबंध 2 त्रिक भाव के स्वामियों षष्टेश शनि व अष्टमेश गुरु से है। लग्न/लग्नेश, दशम/दशमेश का संबंध यदि त्रिक भाव के स्वामियों या पंचम, पंचमेश से हो तो आजीविका संबंधी कष्ट आ सकता है। प्रश्न पूछे जाते वक्त दशा गुरु, शुक्र, राहु की थी। महादशा नाथ गुरु जो कुंडली का अष्टमेश है चतुर्थ में बैठकर दशम भाव को प्रभावित कर रहा है। गुरु दशम भाव से भी अष्टमेश है। अतः गुरु की दशा नौकरी में किसी प्रकार की बाधा देने में सक्षम है। अंतर्दशानाथ शुक्र जो स्वयं दशमेश है अपने से अष्टम भाव (लग्न से पंचम) में स्थित है। षष्टेश, अष्टमेश पंचमेश की दशा या उनमें स्थित ग्रहों की दशा में व्यवसाय में कष्ट आ सकता है। इस प्रकार पंचमेश, अष्टमेश गुरु व पंचम में स्थित दशमेश शुक्र की दशा जातक की नौकरी के संबंध में घातक सिद्ध हुई व जातक को अपनी नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा। दशानाथ व अंतर्दशानाथ मानसिक परेशानी को व्यक्त करता है। Û गोचर में भी महादशानाथ गुरु राहु से पीड़ित होकर लग्न से छठवें भाव (त्रिक भाव) में गोचर कर रहे थे। Û अमात्यकारक मंगल भी अब नीच होकर त्रिक लग्न में 12वें भाव में (त्रिक) गोचर कर रहे हैं साथ ही राहु, केतु के अक्ष में है। Û प्रश्न पूछे जाते वक्त दशमेश शुक्र भी द्वादश भाव में राहु, केतु से पीड़ित थे। महादशानाथ, अंतर्दशानाथ, प्रत्यंतर्दशानाथ तीनों ही जन्म कुंडली के त्रिक स्थानों (6, 8, 12) में गोचर कर रहे थे यह भी व्यवसाय संबंधी परेशानी को व्यक्त करता है। कहा जा सकता है कि कुंडली में ग्रह योगों के कारण बनी संभावनाएं उचित दशा व गोचर आने पर फलीभूत होती है। इसी प्रकार एक प्रतिकूल दशा व प्रतिकूल गोचर ने जातक को नौकरी संबंधी परेशानी दी व मानसिक रूप से विचलित किया। यही हमारी प्रश्न कुंडली भी दर्शा रही थी। उनके प्रश्न में यही स्पष्ट था। अब जातक के पास बाहर से नौकरी के कई अच्छे अवसर हैं। दिवाली की शाम जब लोग दिवाली पूजन की तैयारी कर रहे थे तब यह महिला अपनी बहु व उसके गर्भस्थ शिशु की स्वास्थ्य के बारे में चिंतित थी। बहु को अचानक ही परेशानी शुरू हुई थी अतः महिला जानना चाहती थी कि क्या बहु का गर्भस्थ शिशु ठीक है या उसका कुछ अनिष्ट होने वाला है उसकी प्रश्न कुंडली लगाई गई जो इस प्रकार थी। द्विस्वभाव लग्न, द्विस्वभाव नवांश जो कई ग्रहों से प्रभावित है अस्थिरता दर्शाते हैं। लग्न के नवांश का स्वामी गुरु किसी और के नवांश में बैठ कर पंचम भाव को देखता है जो जीव चिंता दर्शाती है। इसमें लग्न का सातवां नवांश जीव चिंता बता रहा है। चंद्र पंचमेश होकर अपने ही नक्षत्र में है जो संतान प्रश्न की पुष्टि कर रहा है। सूर्य ने अभी-2 राशि परिवर्तन किया है। संतान प्रश्न में अष्टम भाव में नीच का सूर्य परेशानी का पूरा संकेत है। साथ ही यह सूर्य नीच के मंगल से दृष्ट है जो अनिष्टकारी है। लग्नेश गुरु का पंचमेश चंद्र से इत्थशाल भी संतान चिंता व्यक्त करता है। लग्नेश गुरु नीच के हैं जो राहु केतु अक्ष में स्थित है साथ ही मंगल के दृष्टि प्रभाव में है। संतान के संबंध में यह स्थिति अशुभ है। द्वादश भाव जो कि गर्भस्थ शिशु का माना गया है मंगल (नीच) से दृष्ट है जो गर्भपात का संकेत देता है। पंचम भाव में 2 क्रूर (अग्नि तत्व) ग्रह, (मंगल, केतु) उपस्थित होकर पीड़ा को अत्याधिक बढ़ा रहे हैं। नीच के मंगल पंचम में स्थित होकर गर्भ नाश का संकेत दे रहे हैं। लग्न व चंद्र सप्तमेश बुध, अष्टमेश शुक्र व द्वादशेश शनि का प्रभाव है जो ठीक नहीं है। संतान कारक गुरु स्वयं नीच के हैं व राहु से पीड़ित है जो गर्भ नाश का योग बनाते हैं। इस प्रकार पंचम भाव व पंचमेश पर गुरु की दृष्टि भी गर्भस्थ शिशु की रक्षा नहीं कर पाएगी ऐसा कहा गया। अगले दिन ही उक्त महिला की पुत्रवधू का गर्भपात हो गया। अब इसे इनकी जन्म कुंडली से देखते हैं। तुला लग्न की इस कुंडली में पंचमेश शनि जो योगकारक भी है लग्न में उच्च के होकर स्थित है जो दर्शाते हैं कि महिला को अपनी संतान का सुख अवश्य ही प्राप्त होगा। पंचम भाव पर किसी ग्रह का प्रभाव नहीं है। सप्तांश में पंचम भाव में 5 ग्रहों का प्रभाव है। प्रश्न पूछे जाते वक्त जातिका की दशा चंद्र, शुक्र, शुक्र थी। दशानाथ चंद्र लग्न कुंडली का दशमेश है जो पंचम भाव से षष्टेश है अतः संतान के संबंध में ठीक नहीं है। यह चंद्र लग्न से तृतीय भाव में अष्टमेश शुक्र के साथ निकट अंशों में है साथ ही यह तृतीयेश व षष्टेश गुरु के साथ गृह यृद्ध में शामिल है। इसकी दशा अशुभता दे सकती है। सप्तांश में भी चंद्र अष्टमेश होकर पंचम भाव में स्थित है जो संतान के लिए ठीक नहीं है। अंतर्दशानाथ, प्रत्यंदर्शानाथ शुक्र लग्न कुंडली के अष्टमेश हैं व सप्तांश कुंडली के षष्टेश व एकादशेश होकर पंचम भाव में स्थित है। सप्तांश में छठा भाव पंचम से द्वितीय व एकादश भाव पंचम से सप्तम होने के कारण पंचम भाव के लिए प्रबल कारक भाव है। अतः चंद्र में शुक्र की दशा संतान के लिए अनिष्टकारी रही और गर्भस्थ शिशु का गर्भपात हो गया। अब गोचर पर नजर डालते हैं - Û गोचर में पंचमेश शनि लग्न से बारहवें भाव यानि पंचम भाव से अष्टम में गोचर कर रहे थे। त्रिक भाव होने के कारण यह अशुभ है। Û प्रश्न के वक्त पंचमेश शनि अष्टमेश शुक्र द्वादशेश बुध से भी पीड़ित थे। Û संतान कारक गुरु नीच के राहु से पीड़ित थे। Û महादशा नाथ चंद्र अंतर्दशा नाथ व प्रत्यंतरदशा नाथ शुक्र दोनों ही त्रिक भाव (12वें) में गोचर में थे जो पंचम से अष्टम भाव है। अतः यह दशा संतान जन्म के संबंध में अशुभ सिद्ध हुई। इस प्रकार जो बात प्रश्न कुंडली से दिखाई दी थी वही जन्मकुंडली में भी स्पष्ट हुई। जो प्रश्न व लग्न कुंडली की साम्यता को व्यक्त करता है। एक शाम लंदन में रहने वाली मेरी सहेली का फोन आया वो बहुत ही परेशान थी। उसने बताया कि उसकी बहन का लड़का कुछ दिनों से लापता है जिसकी कोई खबर नहीं है। वह इंजीनियरिंग कालेज का छात्र है। उसने जानना चाहा कि वह लड़का कहां है, सुरक्षित है या नहीं व कब तक उसके वापस आने की संभावना है? क्या पुलिस इस केस में मदद करेगी। मैंने उसी वक्त उसकी प्रश्न कुंडली लगाई। समय भारत का ही लिया गया क्योंकि ज्योतिषी जहां होता है प्रश्न कुंडली में समय वहीं का लिया जाना उचित है। स्थिर शीर्षोदय लग्न व स्थिर नवांश प्रश्न की सफलता को प्रभावित करते हैं जो स्थिति में परिवर्तन नहीं दर्शाते। सम लग्न का दूसरा नवांश मूल चिंता बताता है। लग्न के नवांश का स्वामी सूर्य किसी और के नवांश में बैठकर लग्न को देखता है जो जीवन चिंता बताता है। अष्टमेश बुध सप्तम भाव में बैठकर लग्न को निकटतम अंशों में देखता है जो गुप्त विवाह का संकेत हो सकता है। लग्नेश मंगल का सप्तमेश व द्वादशेश शुक्र से इत्थशाल शादी के साथ-2 घर से दूर जाने का संकेत देता है। चंद्र का इस युति में इशराफ बीते समय में हुई घटना दर्शा रहा है। सप्तम भाव में क्रूर ग्रह मार्ग में परेशानी व छठे में मंगल शत्रु भय दर्शाते हैं। लग्न शनि के नक्षत्र में है जो दशम में बैठकर सप्तम भाव को देखता है कार्य क्षेत्र व विवाह संबंधी प्रश्न की ओर संकेत देता है। चैथे भाव में शुभ ग्रह बताता है कि व्यक्ति सुरक्षित है। चैथे भाव में गुरु बिना विलंब तुरंत वापसी की सूचना भी देता है। लग्न की डिग्री राहु/केतु की डिग्री के बिल्कुल करीब मानसिक परेशानी व्यक्त करती है। 10वें में पाप ग्रह जल्द वापसी का सूचक है साथ ही यह भी बताता है कि पुलिस सहायता नहीं करेगी। (दसवें भाव में पाप प्रभाव) चंद्र पर भी राहु/केतु का प्रभाव है व चंद्र की राशि कर्क में केतु स्थित है जो मानसिक परेशानी बताता है। 6, 7 भाव में कोई ग्रह हो और गुरु केंद्र में हो तो भी व्यक्ति (लापता) तुरंत वापस आता है। कुंडली में यह योग उपस्थित है। लग्नेश, सप्तमेश का छठे भाव में इत्थशाल घर से भाग कर किए गए प्रेम विवाह को सूचित करता है। इन्हें बताया गया कि आपकी बहन के लड़के ने घर से जाकर प्रेम विवाह कर लिया है। वह सुरक्षित है परंतु भयभीत है व मानसिक परेशानी में है। जब चंद्र चतुर्थ भाव में गोचर में आएगा तो वह घर आ सकता है या उसकी सूचना आ सकती है। 15 जून को जब चंद्र कुंभ राशि में थे तो लड़के के किसी मित्र ने फोन पर सूचना दी कि लड़के ने अपनी सहपाठी से कोर्ट में शादी कर ली है वह सुरक्षित है परंतु लड़की वालों के डर से मानसिक रूप से बहुत परेशान है। आइए जन्मकुंडली की स्थिति देखें। वृषभ लग्न की इस कुंडली में देखें तो लग्नेश शुक्र सप्तमेश मंगल के साथ अष्टम भाव में स्थित है। साथ-साथ शनि भी इस योग में शामिल है। अष्टमेश वक्री गुरु भी द्वितीय भाव से इस योग को दृष्टि दे रहे हैं। यह योग गुप्त तरीके से विवाह होगा इस बात की पुष्टि करता है क्योंकि इसका संबंध अष्टम भाव से है। प्रश्न पूछे जाने के वक्त जातक की दशा शुक्र/शनि/शुक्र थी। महादशा नाथ शुक्र लग्नेश व षष्टेश होकर अष्टम भाव में शनि से गृह युद्ध में हारा हुआ है। अतः ऐसे लग्नेश से जो षष्टेश हो, गृह युद्ध में हारा हो साथ ही अष्टम भाव में हो शुभ फल की आशा नहीं की जा सकती। (गृह युद्ध में हारे ग्रह की दशा अशुभता देती है) नवांश में भी शुक्र वक्री पंचमेश व अष्टमेश गुरु के साथ पंचम भाव में है। अंतर्दशानाथ शनि योग कारक है परंतु यह भी अष्टम भाव से संबंध बना रहे हैं साथ ही गृह युद्ध में है। ये मारकेश (सप्तमेश, द्वादशेश) मंगल के प्रभाव में भी है। अशुभ ग्रह की महादशा में योगकारक ग्रह की अंतर्दशा अत्यंत ही अशुभ होती है। नवांश में भी शनि उच्च के द्वादशेश चंद्र व मंगल से दृष्ट है। प्रत्यंतर्दशा नाथ की चर्चा की जा चुकी है। गोचर ने महादशा नाथ शुक्र जो लग्नेश है सप्तमेश से युक्त हो बारहवें भाव (त्रिक) में गोचर कर रहे थे। तृतीय भाव राहु/केतु अक्ष से प्रभावित होकर जातक के पराक्रम को बढ़ा रहा था। राहु/केतु लग्न चार्ट के राहु/केतु पर ही गोचर कर रहे थे। इन सभी प्रतिकूल दशाओं और गोचर में जातक की बुद्धि को भ्रमित किया उसका पराक्रम बढ़ाया जिसके फलस्वरूप जातक ने अपनी सहपाठी के साथ घर से भागकर कोर्ट में शादी कर ली। लड़की वालों ने जातक को जान से मारने की धमकी दी है जिसके कारण वह भयभीत है। इस प्रकार हमने देखा जो प्रश्न कुंडली बता रही थी वो जन्म कुंडली में भी स्पष्ट था। जन्म व प्रश्न कुंडली की एकरूपता सिद्ध होती है। शार्टकट से पैसा कमाना, नाम कमाना आज के मानव की फितरत है ऐसे में चाहे उसे कुछ भी करना पड़े। पैसे और नाम के लिए भला राजनीति से अच्छी कौन सी जगह हो सकती है। कुछ ऐसी ही सोच लिए एक शाम एक युवक मेरे पास आया। उसने बताया कि उसके पिता के बड़े-बड़े राजनितिज्ञों से संबंध है वह इलेक्शन लड़ना चाहते हैं। पैसा भी वो कितना ही खर्च करने को तैयार है। लेकिन फिर भी टिकट को लेकर चिंतित हैं उसने जानना चाहा कि क्या उसके पिता को इलेक्शन लड़ने के लिए टिकट मिलेगा या नहीं? एक दूसरे उम्मीदवार को लेकर भी चिंतित था। उसने पूछा कि क्या वो मेरे पिता से ज्यादा अच्छी स्थिति में है ? क्योंकि सिर्फ उसी से मेरे पिता को खतरा हो सकता है। मैंने उसी वक्त प्रश्न कुंडली का सहारा लिया। इस प्रकार के प्रश्न में प्रश्न कुंडली चमत्कारिक रूप से कार्य करती है। आइए देखें प्रश्न कुंडली ने क्या संकेत दिए। उभयोदय, द्विस्वभाव लग्न, द्विस्वभाव नवांश प्रश्न की सफलता में संदेह उत्पन्न करता है। लग्न शनि के नक्षत्र में है जो लाभेश होकर सप्तम में स्थित है अतः प्रश्न पद प्राप्ति से संबंधित है। लग्न को चतुर्थेश व सप्तमेश बुध निकटतम अंशों से देखता है जो पुनः पद प्राप्ति के प्रश्न को बताता है। चंद्र भी बुध के नक्षत्र में स्थित होकर इसी बात की पुष्टि करता है। लग्न में कोई ग्रह उपस्थित नहीं है लग्न पर शुभ व पाप दोनों प्रकार का दृष्टि प्रभाव है लग्न बली नहीं है। Û सातवां भाव जो प्रतिद्वंद्वी का है उसमें उच्च का सप्तमेश स्थित है साथ ही पाप ग्रह शनि भी है जो गुरु से दृष्ट है अतः सातवें भाव लग्न की अपेक्षा अधिक बली है। परंतु यह भी मंगल से दृष्ट है। नियम है कि लग्नेश व सप्तमेश में जो बली होगा वही विजयी होगा। Û यहां लग्नेश जो कर्मेश भी है गुरु नीच के हंै व वक्री है साथ ही राहु/केतु अक्ष में स्थित है। ये मंगल की दृष्टि से पीड़ित भी है अतः बहुत ही निर्बल है। Û सप्तमेश उच्च के होकर अपने भाव में स्थित है गुरु से दृष्ट है लेकिन वक्री होने व मंगल से दृष्ट होने के कारण ये भी पूर्ण बली नहीं है। ये शनि से युक्त है जो सप्तम भाव के लिए पंचमेश/षष्टेश है। अतः पंचमेश के कारण कुछ अच्छे की संभावना हो सकती है। Û नवांश में भी लग्नेश व दशमेश बुध नीच के हो गए हैं साथ ही शनि/मंगल से प्रभावित होकर निर्बल है अतः प्रश्न की सफलता में संदेह है। Û चैथे भाव में बैठा अशुभ ग्रह भी ठीक नहीं है। वक्री सप्तमेश के कारण इनसे कहा गया कि हो सकता है आपका प्रतिद्वंद्वी अपना नाम वापस ले लें। हुआ भी यही टिकट मिलने के कुछ दिन पहले उस उम्मीदवार ने अपना नाम वापस ले लिया। लेकिन क्योंकि प्रश्न इनके भी पक्ष में नहीं था अतः इलेक्शन का टिकट इन्हें भी हासिल नहीं हुआ व इनके सारे प्रयास असफल रहे। इन सज्जन की कुंडली में जन्म समय पूरी तरह ठीक ना होने के कारण हम इनके पुत्र की कुंडली से इस घटना की पुष्टि का प्रयास करेंगे। कुंभ लग्न की इस कुंडली में पिता के कर्म स्थान का विचार इस कुंडली के नवम से दशम अर्थात् षष्ठ भाव से किया जाएगा। इसमें सूर्य की उपस्थिति उच्च पद दर्शाती है। प्रश्न पूछे जाते वक्त जातक की दशा शुक्र/केतु की थी। जो दशा छिद्र भी है। शुक्र नवमेश है व साथ ही नवम भाव से अष्टम के स्वामी होकर नवम से द्वादश में नीच के हैं जो पिता को किसी प्रकार का कष्ट भी बताते हैं। साथ ही शुक्र 64वें नवांश के स्वामी है जो मानसिक परेशानी देने में सक्षम है। अंतर्दशा नाथ केतु नवम भाव से द्वितीयेश व सप्तमेश मारक मंगल के साथ स्थित है। साथ ही द्वादशेश बुध से भी युक्त है। दशाओं में 2/12 अक्ष है जो परेशानी बता रही है। गोचर देखें तो गोचर में पिता का कर्म भाव यानि लग्न से छठा भाव पीड़ित है। यहां राहु/केतु अक्ष है साथ ही नीच के वक्री गुरु की दृष्टि है जो किसी प्रकार की राहत नहीं देते। अतः हम कह सकते हैं कि यह समय जातक के पिता के लिए मानसिक परेशानी लेकर आया व कोई उपलब्धि नहीं प्राप्त हुई। अपनी हर संभव कोशिश के बाद भी ये चुनाव का टिकट पाने में नाकाम रहे। इस प्रकार एक बार फिर प्रश्न व जन्म कुंडली की साम्यता प्रकट हुई। इस स्थिति में मैं एक बात और कहना चाहूंगी कि जातक की आने वाली दशा सूर्य की है जो नवम भाव से लाभेश होकर नवम से दशम में स्थित है कर्क राशि जो स्वयं राजसिक राशि है उसमें राजसिक ग्रह व ग्रह सूर्य की उपस्थिति साथ ही सूर्य की दशा बताती है कि जल्द ही जातक के पिता किसी न किसी बड़े पद पर आसीन होंगे।


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