वास्तु शास्त्र के महत्वपूर्ण सूत्र

वास्तु शास्त्र के महत्वपूर्ण सूत्र  

व्यूस : 12242 | दिसम्बर 2010

वास्तु शास्त्र के महत्वपूर्ण सूत्र फ्यूचर पॉइंट के सौजन्य से गृह वास्तु के 51 सूत्र

1. सफेद रंग की सुगंधित मिट्टी वाली भूमि ब्राह्मणों के निवास के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।

2. लाल रंग की कसैले स्वाद वाली भूमि क्षत्रिय, राजनेता, सेना व पुलिस के अधिकारियों के लिए शुभ मानी गई है।

3. हरे या पीले रंग की खट्टे स्वाद वाली भूमि व्यापारियों, व्यापारिक स्थलों तथा वित्तिय संस्थानों के लिए शुभ मानी गई है।

4. काले रंग की कड़वे स्वाद वाली भूमि अच्छी नहीं मानी जाती। यह भूमि शुद्रों के योग्य है।

5. मधुर, समतल व सुगंधित व ठोस भूमि भवन बनाने के लिए उपयुक्त है।

6. खुदाई में चींटी, दीमक, अजगर, साँप, हड्डी, कपड़े, राख, कोड़ी, जली लकड़ी व लोहा मिलना शुभ नहीं माना जाता।

7. भूमि की ढलान उत्तर और पूर्व की ओर हो तो शुभ होती है। छत की ढलान ईशान कोण में होनी चाहिए।

8. भूखंड के दक्षिण या पश्चिम में ऊँचे भवन, पहाड़, टीले या पेड़ शुभ माने जाते हैं।

9. भूखंड से पूर्व या उत्तर की ओर कोई नदी या नहर हो और उसका प्रवाह उत्तर या पूर्व की ओर हो तो शुभ होता है।

10. भूखंड के उत्तर, पूर्व या ईशान में भूमिगत जल स्रोत कुँआ, तालाब एवं बावड़ी शुभ माना जाता है।

11. भूखंड दो बड़े भूखंडों के बीच होना शुभ नहीं होता।

12. भवन दो बड़े भवनों के बीच होना शुभ नहीं होता।

13. आयताकार, वृताकार व गोमुखी भूखंड गृह वास्तु में शुभ होता है। वृताकार भूखंड में निर्माण भी वृताकार ही होना चाहिए।

14. सिंह मुखी भूखंड व्यवसायिक वास्तु के लिए शुभ होता है।

15. भूखंड का उत्तर या पूर्व या ईशान कोण में विस्तार शुभ माना जाता है।

16. भूखंड के उत्तर और पूर्व में मार्ग शुभ माने जाते हैं।

17. दक्षिण और पश्चिम में मार्ग व्यापारिक स्थल में लाभदायक माने जाते हैं।

18. भवन के द्वार के सामने मन्दिर, खंभा व गड़ढा शुभ नहीं माने जाते।

19. आवासीय भूखंड में बेसमेन्ट नहीं बनानी चाहिए।

20. बेसमेन्ट बनानी आवश्यक हो तो उत्तर और पूर्व में ब्रह्म स्थान को बचाते हुए बनानी चाहिए।

21. बेसमेन्ट की ऊँचाई कम से कम 9 फीट हो और 3 फीट तल से ऊपर हो ताकि प्रकाश और हवा आ जा सके।

22. कुँआ, बोरिंग व भूमिगत टंकी उत्तर, पूर्व या ईशान में बना सकते हैं। वास्तु पुरूष के अतिमर्म स्थानों को छोड़ कर।

23. भवन की प्रत्येक मंजिल में छत की ऊँचाई 12 फुट रखनी चाहिए। 10 फुट से कम तो नहीं होनी चाहिए।

24. भवन का दक्षिणी भाग हमेशा उत्तरी भाग से ऊँचा होना चाहिए।

25. भवन का पश्चिमी भाग हमेशा पूर्वी भाग से ऊँचा होना चाहिए।

26. भवन में नैत्य सबसे ऊँचा और ईशान सबसे नीचा होना चाहिए।

27. भवन का मुखय द्वार ब्राह्मणों को पूर्व में, क्षत्रियों की उत्तर में, वैश्य को दक्षिण में तथा शुद्रों को पश्चिम में बनाना चाहिए। इसके लिए 81 पदों का वास्तु चक्र बना कर निर्णय करना चाहिए।

28. द्वार की चौड़ाई उसकी ऊँचाई से आधी होनी चाहिए।

29. बरामदा घर के उत्तर या पूर्व में ही बनाना चाहिए।

30. खिड़कियाँ घर के उत्तर या पूर्व में अधिक तथा दक्षिण या पश्चिम में कम बनानी चाहिए।

31. ब्रह्म स्थान को खुला, साफ तथा हवादार रखना चाहिए।

32. गृह निर्माण में 81 पद वाले वास्तु चक्र में 9 स्थान ब्रह्म स्थान के लिए नियत किए गये है।

33. चार दीवारी के अन्दर सबसे ज्यादा खुला स्थान पूर्व में छोड़ें। उससे कम उत्तर में, उससे कम पश्चिम में, सबसे कम दक्षिण में छोड़ें।

34. दीवारों की मोटाई सबसे ज्यादा दक्षिण में, उससे कम पश्चिम में, उससे कम उत्तर में, सबसे कम पूर्व में रखें।

35. घर के ईशान कोण में पूजा घर, कँुआ, बोरिंग, बच्चों का कमरा, भूमिगत वाटर टैंक, बरामदा, लिविंग रूम, ड्राईंग रूम, व बेसमेंट बनाई जा सकती है।

36. घर की पूर्व दिशा में स्नान घर, तहखाना, बरामदा, कुँआ, बगीचा व पूजा घर बनाया जा सकता है।

37. घर के आग्नेय कोण में रसोई घर, बिजली के मीटर, जेनरेटर, इन्वर्टर व मेन स्विच लगाए जा सकते हैं।

38. घर की दक्षिण दिशा में मुखय शयन कक्ष, भण्डार, सीढ़ियाँ व ऊँचे वृक्ष लगाए जा सकते हैं।

39. घर के नैत्य कोण में शयन कक्ष, भारी व कम उपयोगी सामान का स्टोर, सीढ़ियाँ, ओवर हैड वाटर टैंक व शौचालय बनाये जा सकते हैं।

40. घर की पश्चिम दिशा में भोजन कक्ष, सीढ़ियाँ, अध्ययन कक्ष, शयन कक्ष, शौचालय व ऊँचे वृक्ष लगाए जा सकते हैं।

41. घर के वायव्य कोण में अतिथि घर, कुंवारी कन्याओं का शयन कक्ष, रोदन कक्ष, लिविंग रूम, ड्राईंग रूम, सीढ़ियाँ, अन्न भण्डार, व शौचालय बनाये जा सकते हैं।

42. घर की उत्तर दिशा में कुँआ, तालाब, बगीचा, पूजा घर, तहखाना, स्वागत कक्ष, कोषागार व लिविंग रूम बनाये जा सकते हैं।

43. घर का भारी सामान नैत्य कोण, दक्षिण या पश्चिम में रखना चाहिए।

44. घर का हल्का सामान उत्तर, पूर्व व ईशान में रखना चाहिए।

45. घर के नैत्य भाग में किरायेदार या अतिथि को नहीं ठहराना चाहिए।

46. सोते समय सिर पूर्व या दक्षिण की तरफ होना चाहिए। (मतान्तर से अपने घर में पूर्व दिशा में सिर करके सोना चाहिए, ससुराल में दक्षिण सिर करके, परदेश में पश्चिम सिर करके सोना चाहिए और उत्तर दिशा में सिर करके कभी नहीं सोना चाहिए।)

47. दिन में उत्तर की ओर तथा रात्रि में दक्षिण की ओर मुख करके मल मूत्र का त्याग करना चाहिए।

48. घर के पूजा गृह में बड़ी मूर्तियाँ नहीं होनी चाहिएं। दो शिवलिंग, तीन गणेश, दो शंख, दो सूर्य प्रतिमा, तीन देवी प्रतिमा, दो गोमती चक्र, व दो शलिग्राम नहीं रखने चाहिए।

49. भोजन सदा पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके ही करना चाहिए।

50. सीढ़ियों के नीचे पूजा घर, शौचालय व रसोई घर नहीं बनाना चाहिए।

51. धन की तिजोरी का मुँह उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। व्यवसायिक वास्तु के 42 सूत्र

1. व्यापारिक संस्थान के मालिक को दक्षिण-पश्चिम या दक्षिण पश्चिम (नै त्य) में इस प्रकार बैठना चाहिए कि उसका मुंह उत्तर या पूर्व की ओर हो।

2. दुकान व शोरूम में बिक्री का सभी सामान दक्षिण, पश्चिम एवं वायव्य में रखना चाहिए।

3. बिक्री काउन्टर पर खड़े सेल्समैन का मुँह पूर्व या उत्तर की ओर होना चाहिए।

4. कैश काउण्टर, मालिक या मैनेजर के स्थान के ऊपर कोई बीम नहीं होना चाहिए।

5. दुकान/शोरूम में भारी वस्तुएं या कम उपयोगी वस्तुए नैत्य में रखनी चाहिएं।

6. जो माल काफी दिनों से न बिक रहा हो उसे वायव्य कोण में रख दें, शीघ्र बिक जाएगा।

7. मुखय कार्यालय का प्रवेश द्वार उत्तर या पूर्व की ओर रखें।

8. कार्यालय में कैन्टीन आग्नेय कोण में ही बनानी चाहिए।

9. कार्यालय में खजांची व लेखा विभाग के कर्मचारियों को उत्तर दिशा में बिठाना चाहिए।

10. सभी केबिनों के द्वार अन्दर की ओर खुलने चाहिएं।

11. स्वागत कक्ष प्रवेश द्वार के समीप होना चाहिए व स्वागत कर्ता का मुँह पूर्व या उत्तर की ओर हो।

12. स्वागत कक्ष में उत्तर, पूर्व, ईशान की तरफ सजावटी पौधे व फूलों के गमले लगाए जा सकते हैं।

13. स्वीमिंग पूल उत्तर या पूर्व दिशा में बनाना चाहिए।

14. सीढ़ियों की संखया विषम होना शुभ होता है।

15. सार्वजनिक सुविधाएँ भवन के नैत्य या पश्चिमी भाग में बनानी चाहिएं।

16. रेस्टोरेंट का डाइनिंग हाल पश्चिम में बनाना चाहिए। आवश्यकता होने पर दक्षिण व पूर्व में भी बनाया जा सकता है।

17. रेस्टोरेन्ट में रसोई आग्नेय में तथा वितरण काउन्टर वायव्य में बनाया जा सकता है।

18. अस्पताल व नर्सिंग होम में दक्षिण का द्वार नहीं बनाना चाहिए।

19. अस्पताल का आपातकालीन वार्ड वायव्य के समीप उत्तर में बनाना चाहिए।

20. अस्पताल में गहन चिकित्सा कक्ष (प्ण्ब्ण्न्ण्) वायव्य में बनाना चाहिए।

21. अस्पताल में प्रसूति वार्ड ईशान एवं पूर्व के बीच बनाना चाहिए।

22. अस्पताल में शल्य चिकित्सा विभाग पश्चिम में बनाना चाहिए।

23. नैत्य कोण में कोई वार्ड नहीं बनाना चाहिए।

24. रोगियों के कमरे दक्षिण में नहीं बनाने चाहिएं।

25. रोगियों के सिर उत्तर दिशा में नहीं होने चाहिएं।

26. मुर्दा घर या पोस्टमार्टम का कमरा दक्षिण में बनाया जा सकता है।

27. लिफ्ट उत्तर या पूर्व में बनायी जा सकती है।

28. अस्पताल में नर्सों का होस्टल वायव्य एवं उत्तर के बीच में और डाक्टरों का होस्टल पश्चिम में बनाना चाहिए।

29. सिनेमा हाल में पर्दा वायव्य या उत्तर में होना चाहिए।

30. क्लब में आउटडोर गेम्स के स्टेडियम पूर्व, उत्तर या पश्चिम में बनाने चाहिए।

31. क्लब में जिम्नेजियम पश्चिम में पूर्वमुखी बनाना चाहिए।

32. क्लब में मदिरालय पश्चिम में कभी नहीं बनाना चाहिए।

33. योगाभ्यास व ध्यान के कमरे ईशान या पूर्व में होने चाहिएं।

34. विद्यालय में अध्यापन के कमरे पूर्व, उत्तर एवं पश्चिम में बनाने चाहिए।

35. पढ़ते समय विद्यार्थियों का मुँह उत्तर या पूर्व की ओर होना चाहिए।

36. विद्यालय में स्टाफ रूम वायव्य या उसके आसपास होना चाहिए।

37. दुकान में तराजू पश्चिम, दक्षिण या वायव्य में लगा सकते हैं।

38. बर्फखाने में बर्फ का संग्रह वायव्य में होना चाहिए।

39. ज्योतिष कार्यालय में ज्योतिषी के दाएं हाथ की तरफ पंचांग व पुस्तकें होनी चाहिएं।

40. केमिस्ट की दुकान में नैत्य में कोई दवाईयाँ नहीं रखनी चाहिएं।

41. पीने का पानी ईशान कोण में रखना चाहिए।

42. तैयार माल के सेम्पल, बिक्री विभाग से सम्बन्धित अधिकारी व कर्मचारी वायव्य कोण में होने चाहिए।

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वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2010

वास्तु का शाब्दिक अर्थ है 'वास' अर्थात् वह स्थान जहां पर निवास होता है। इस सृष्टि की संरचना में पंचतत्व (अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाष) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं तो भवन निर्माण करते समय में भी इनकी उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता।प्रस्तुत विषेषांक में 'वास्तु' से संबंधित समस्त महत्वपूर्ण जानकारी का उल्लेख है

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