ऐनीमिया : जीवित होते हुए भी मृत के समान

ऐनीमिया : जीवित होते हुए भी मृत के समान  

ऐनीमिया जीवित हाते हएुएु भी मतृ के समान आचार्य अविनाश सिंह शरीर को रोजमर्रा के कामकाज लायक शक्ति के लिए लौह, प्रोटीन, विटामिन 'सी', फौलिक ऐसिड आदि की आवश्यकता होती है। ये तत्व रक्त को शक्ति तथा स्फूर्ति देने में बहुत सहायक होते हैं। अगर भोजन में इन पदार्थों की मात्रा अधिक नहीं होती, तो रक्त की कमी हो सकती है, जिसे रक्ताल्पता, या ऐनीमिया भी कहते हैं। एनीमिया, अर्थात रक्ताल्पता एक ऐसी बीमारी है, जो जीवित व्यक्ति को मृत बना देती है। इससे व्यक्ति की मृत्यु तो नहीं होती, लेकिन शरीर स्वस्थ नहीं रहता। चक्कर आना, सांस फूलना, काम में जी न लगना, जल्द थकावट आना आदि भी इसी रोग के लक्षण हैं। ऐनीमिया चार प्रकार का होता है : 1. लौह की कमी वाला ऐनीमिया। 2. मेगालोब्लास्टिक ऐनीमिया। 3. हेमोलाईटक ऐनीमिया। 4. अप्लास्टिक ऐनीमिया। लौह की कमी वाला ऐनीमिया : यह ऐनीमिया लौह की कमी के कारण होती है। पौष्टिक भोजन कम खाने के कारण रक्त में लौह तत्व की कमी हो जाती है, जिससे रक्त की कोशिकाओं में हिमोग्लोबिन नहीं बनता। मेगालोब्लास्टिक ऐनीमिया : इस तरह का ऐनीमिया विटामिन बी12 और फौलिक ऐसिड की कमी के कारण होता है। बी12 और फौलिक ऐसिड रक्त के लाल कणों की कोशिकाओं की परिपक्वता के लिए आवश्यक होते हैं। इनकी कमी के कारण रक्त की लाल कोशिकाओं में परिपक्वता नहीं आती। इसलिए अपरिपक्व रक्त की कोशिकाओं के कारण होने वाली ऐनीमिया को मेगालोब्लास्टिक ऐनीमिया कहते हैं। हेमोलाईटक ऐनीमिया : इस प्रकार की ऐनीमिया रक्त के लाल कणों की कोशिकाओं के टूटने के कारण होती है। इसके तीन कारण होते हैः 1. वंशानुगत विकार 2. रक्त कणों पर आघात 3. मलेरिया जैसे संक्रमण। अप्लास्टिक ऐनीमिया : इस प्रकार की ऐनीमिया तब होती है, जब हड्डियों में मज्जा बनना बंद हो जाता है। इसके कारण अधिक नशीले और रासायनिक पदार्थों का सेवन और घातक बीमारी होते हैं। ज्यादातर ऐनीमिया की शिकायत लौह की कमी और मेगालोब्लास्टिक के कारण होती है। इसमें रक्त के लाल कणों में लौह, हिमोग्लोबिन, फौलिक ऐसीड और विटामिन बी12 की कमी होती है। यह भोजन की गलत आदतों तथा कुपोषण के कारण बच्चों, बूढ़ों और खास कर गर्भवती युवतियों को होती है। उपचार : रक्त की वृद्धि के लिए ऐसी वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए, जिनमें लोहा और विटामिन बी12 हों। अंकुरित अनाज, दूध, दही, छिलका युक्त दाल, सोयाबीन, हरे पत्ते वाली सब्जियों में विटामिन बी12 और लोहा अधिक होते है। हरी सब्जियों में उपस्थित फौलिक ऐसिड का खून को बढ़ाने से सीधा संबंध है। फौलिक ऐसिड की कमी बी12 की कमी से पहले उभरती है, जिससे पाचन बिगड़ने लगता है, जीभ पर छाले एवं दिमाग कमजोर पड़ने लगता है। इनकी कमी से स्मरण शक्ति भी नष्ट होने लगती है। शराबियों और वृद्धों में फौलिक ऐसिड की कमी प्रायः देखी गयी है। अंकुरित अनाज का उपयोग करने से भी बड़ी तेजी से रक्त की वृद्धि होती है। अंकुरित अनाज जीवन शक्ति का भंडार होता है। इसमें भोजन के लगभग सभी तत्व होते हैं। इसलिए भोजन में अंकुरित अनाज का उपयोग करें। शहद और दूध भी रक्त वृद्धि में सहायक होते हैं। घरेलू उपाय : मुनक्का : 10-12 मुनक्का धो कर रात को भिगों दें। बारह घंटे बाद मुनक्का के बीज निकाल कर चबा कर खा लें। एक माह के सेवन से ही खून में वृद्धि हो जाएगी। इससे खून की सफाई भी हो जाएगी और अगर गर्मियों में नाक से खून बहता है, तो वह भी बंद हो जाएगा। किशमिश : किशमिश को भी गर्म पानी में प्रातः धो कर साफ कर लें और फिर उन्हें कच्चे दूध में डुबो दें और कुछ देर बाद किशमिश सहित दूध उबाल लें और फिर किशमिश खा कर ऊपर से दूध पी लें। इससे रक्त में वृद्धि होती है और ऐनीमिया ठीक हो जाती है। इससे निम्न रक्तचाप, यकृत की खराबी, बदहजमी भी ठीक होते हैं। अंगूर का रस एक प्याला सुबह-शाम के भोजन के एक घंटे बाद लेने से एक माह में रक्त की कमी दूर हो जाती है। इसके अलावा पाचन शक्ति बढ़ती है। अफरा और दिल के दौरे भी ठीक हो जाते हैं। पालक का रस 125 ग्राम की मात्रा में कुछ दिन तक पीने से ऐनीमिया ठीक हो जाती है। टमाटर में लौह तत्व दूध से दुगना होता है। इसलिए इसके सेवन से रक्त की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है, जिससे यकृत की स्फूर्ति बढ़ती है। अंगूर, पालक, टमाटर, के अतिरिक्त आंवला, पीपर, गाजर, चुकंदर, बथुआ, चौलाई, मेथी, अनार, मूली की पत्तियां, सेब, संतरा आदि सभी रक्तवर्धक हैं। गाजर, आंवला, चुकंदर का रस एक प्याला दिन में दो बार पीने से खून की हर प्रकार की कमी दूर होती है और चेहरा लाल हो जाता है, जिससे खूबसूरती बढ़ती है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण : ज्योतिषीय दृष्टि से काल पुरुष की कुंडली का पंचम भाव यकृत, अर्थात लीवर का है। यहां पर रक्त बनता है। चंद्र ग्रह शरीर में तरल पदार्थों का कारक है और खून भी तरल पदार्थ है। मंगल ग्रह शरीर की हड्डियों में मज्जा का कारक है, जो रक्त के लाल कणों और हिमोग्लोबिन को सुनिश्चित करता है। गुरु ग्रह लीवर का कारक है। इन सभी का संबंध खून से है। इसलिए इनका दुष्प्रभावों में होना व्यक्ति के रक्त में विकार उत्पन्न करता हैं, जिनमें एक ऐनीमिया, अर्थात रक्ताल्पता है। विभिन्न लग्नों में रक्ताल्पता रोग : मेष लग्न : बुध पंचम भाव में, लग्नेश एकादश भाव में शनि से दृष्ट हो और सूर्य षष्ठ भाव में गुरु-राहु से दृष्ट, त्रिक भावों में हो और चंद्र अस्त हो, तो रक्ताल्पता जैसा रक्त विकार होता है। वृष लग्न : शनि अष्टम भाव में, गुरु राहु, या केतु से युक्त पंचम भाव में, पंचमेश और लग्नेश सूर्य से अस्त हों, और चंद्र पर शनि की दृष्टि हो, तो रक्ताल्पता जैसा रोग होता है। मिथुन लग्न : मंगल की दृष्टि पंचम भाव, पंचमेश और लग्नेश पर हो, चंद्र मंगल से युक्त हो, लग्नेश सूर्य से अस्त हो कर तृतीय, या षष्ठ भाव में हो और गुरु पर शनि, या राहु की दृष्टि हो, तो रक्ताल्पता होती है। कर्क लग्न : मंगल त्रिक स्थानों में शनि से युक्त, या दृष्ट हो, लग्नेश चंद्र राहु से दृष्ट, या युक्त हो, लग्न पर भी राहु, या केतु की दृष्टि हो, गुरु षष्ठ भाव में हो, तो रक्ताल्पता होती है। सिंह लग्न : लग्नेश सूर्य षष्ठ भाव में, बुध पंचम भाव में, राहु केतु से युक्त, या दृष्ट हो, शनि पंचम भाव पर दृष्टि रखे और चंद्र भी शनि से दृष्ट, या युक्त हो, तो रक्त विकार हो कर रक्ताल्पता होती है। कन्या लग्न : पंचम भाव, पंचमेश पर मंगल की दृष्टि हो, चंद्र पंचम भाव में गुरु से दृष्ट, या युक्त हो और उसपर राह-ु कते ु की दृि ष्ट हा े तथा लग्नश्े ा मगं ल से युक्त हो, तो रक्ताल्पता होती है। तुला लग्न : गुरु लग्न, या पंचम भाव में मंगल से युक्त हो, लग्नेश शुक्र और बुध दोनों सूर्य से अस्त हो कर षष्ठ, या अष्टम भाव में हों, चंद्र राहु, या केतु, या शनि से युक्त, या दृष्ट हो, तो रक्ताल्पता जैसा रोग होता है। वृश्चिक लग्न : बुध पंचम भाव में हो और अस्त न हो, सूर्य षष्ठ भाव में राहु-केतु से दृष्ट हो, चंद्र शनि से युक्त, या दृष्ट हो और लग्नेश मंगल भी शनि से प्रभावित हो रहा हो, गुरु त्रिक भावों में हो, तो रक्ताल्पता देते हैं। धनु लग्न : शुक्र पंचम भाव में, बुध सप्तम में, सूर्य अष्टम में शनि से युक्त हो, गुरु षष्ठ भाव में राहु-केतु से दृष्ट, या युक्त हो, मंगल और चंद्र युक्त या एक दूसरे पर दृष्टि रखें, तो रक्ताल्पता होती है। मकर लग्न : गुरु पंचम भाव में, या पंचम भाव पर दृष्टि रखे, लग्नेश त्रिक भावों में और चंद्र नीच राशि में मंगल से दृष्ट हो और मंगल शनि से दृष्ट, या युक्त हो और पंचमेश अस्त हो, तो रक्ताल्पता होती है। कुंभ लग्न : पंचमेश बुध षष्ठ भाव में और षष्ठेश पंचम भाव में गुरु से दृष्ट, या युक्त हों, लग्नेश शनि अष्टम भाव में राहु से युक्त, या दृष्ट हो, तो रक्त विकार से रक्ताल्पता होती है। मीन लग्न : शुक्र लग्न, या पंचम भाव में हो और लग्नेश षष्ठ, या अष्टम भाव में हो और राहु-केतु से युक्त, या दृष्ट हो, मंगल पंचम भाव में और पंचमेश अष्टम भाव में हों तथा लग्न, या पंचम भाव पर शनि की दृष्टि हो, तो रक्ताल्पता होती है। उपर्युक्त सभी योग चलित कुंडली पर आधारित हैं। रोग की उत्पत्ति संबंधित ग्रह दशा-अंतर्दशा और गोचर ग्रह के प्रतिकूल रहने से होता है। जब तक दशा-अंतर्दशा प्रतिकूल रहेंगे, शरीर में रोग रहेगा। उसके बाद ठीक हो जाएगा। लेकिन ठीक अवस्था में भी पाचन संस्थान में कोई व्याधि रहेगी।


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