महत्वाकांक्षा का मूल्य

महत्वाकांक्षा का मूल्य  

अपने व्यस्त जीवन के बीच अचानक किसी चिर-परिचित अत्यंत प्रिय सखी का लंबे अंतराल के बाद मिलना कितना सुखदायी होता है यह मंैने हाल ही में जाना। प्रिया से मेरी बचपन से ही दोस्ती थी। स्कूल में उसके साथ पढ़ना, खेलना एवं स्कूल का काम करना मुझे बहुत अच्छा लगता था। उसकी छोटी बहनों से भी मेरा खास स्नेह था। स्कूल के बाद काॅलेज में हमने एक साथ प्रवेश लिया और प्रिया ने काॅलेज से बी. ए. पास ही किया था कि उसका विवाह हो गया। उसके बाद उससे संपर्क ही नहीं हो पाया और अब लगभग 25-30 वर्षों के बाद उससे मिलकर सारे बीते पल याद आ गए और अनायास ही पलके भीग आईं। प्रिया के साथ उसकी छोटी बहन गीता भी थी जो उस वक्त बहुत छोटी थी और जिसे हमने गोद में खिलाया था। गीता से मिलकर बहुत खुशी मिली। उसके पहनावे से साफ झलक रहा था कि उसका विवाह किसी धनाढ्य परिवार में हुआ है। हीरे के जड़ाऊ हार, कंगन आदि आभूषणों में उसका रूप और निखर आया था। प्रिया और गीता के साथ बहुत देर तक एक साथ गुजारे हुए समय को याद कर हम हंसते रहे। लेकिन गीता को देख कर मुझे लगा कि शायद वह कुछ कहना चाह रही है पर संकोच कर रही है। जाते हुए गीता ने मेरा कार्ड लिया और अपने घर आने की दावत भी दी। घर आकर मैं अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त हो गई। अचानक गीता का फोन आया और उसने तुरंत मिलने की इच्छा व्यक्त की तो मैंने उसे बुला लिया। गीता एकदम बुझी-बुझी सी लग रही थी। मेरे प्यार से पूछने पर वह फफक पड़ी। उसके अनुसार विनीत से उसका दूसरा विवाह हुआ था। बचपन से वह बहुत महत्वाकांक्षी रही थी और जीवन के हर सुख को भरपूर रूप से भोगने की शुरू से उसकी लालसा रही थी। पहले पति के साथ उसका जीवन साधारण रूप से बीत रहा था जो उसे रास नहीं आया और उसने विनीत से विवाह करने का फैसला किया। विनीत राजघराने से ताल्लुक रखता है। नवाबों की भांति उसके शौक भी नवाबों की तरह ही हैं और गीता से उसका यह चैथा विवाह है। उम्र में तीस वर्ष का फर्क ! गीता कैसे इस विवाह के लिए तैयार हो गई यह जानकर मैं हैरान रह गई। भौतिक सुख और महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए गीता ने विनीत की अधेड़ उम्र को अनदेखा कर दिया था और अब उसे इस बात की चिंता थी कि क्या वह विनीत को लंबे समय तक खुश रख सकेगी अथवा उसका हाल भी विनीत की पिछली जीवन संगिनियों जैसा हो जाएगा? सभी भौतिक सुख एवं ऐशोआराम होते हुए भी वह मानसिक सुख से वंचित थी। यह कैसा संयोग था ! आइये विनीत और गीता की कुंडलियों का अवलोकन करें। सर्वप्रथम विनीत की जन्म कुंडली पर ज्योतिषीय दृष्टि से विश्लेषण करें कि उसके जीवन में बहु विवाह योग ग्रहों की स्थिति से कैसे घटित हुआ। निम्न ज्योतिष शास्त्रीय प्रमाण के अनुसार उसकी कुंडली में सभी बहुभार्या योग घटित हो रहे हैं। कलत्रे भानोः कुटुम्बी बहुदारसक्त। कुटुम्ब कलत्रनाथाभ्यां समेतेग्र्रहनायकेर्वा कलत्रसंख्यां प्रवदन्ति सन्तः।। कलत्रेशे बहुगुणे तुंगवक्रादिहेतुभिः बहुभार्य नरं विद्यादुदयक्र्षगतेऽपिवा।। (सर्वार्थ चिंतामणि) उसकी कुंडली में कुटुंबेश मंगल और सप्तमेश बुध की मंगल और शुक्र के साथ सप्तम स्थान में युति होने से चार विवाहों का योग बना। इसके अतिरिक्त सप्तम स्थान में सप्तमेश बुध के वक्र होने के कारण बहुभार्या योग का सृजन हुआ। सूर्य और मंगल की युति के कारण उसके गृहस्थ जीवन में स्थायित्व नहीं बन सका जिससे उसका एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा और तीसरे के बाद चैथा विवाह हुआ। इसके अतिरिक्त सप्तम में शुक्र-मंगल की युति के कारण भोग-विलासिता के प्रति अधिक रुझान होने के कारण भी वह अपनी किसी एक स्त्री के साथ लंबे समय तक नहीं रह सका। वर्गोत्तम नवमांश होने से उसके जीवन में धन, वैभव, संपत्ति और अधिकार की कोई कमी नहीं है। वह राजसी जीवन व्यतीत कर रहा है तथा सितंबर 2012 तक गुरु ग्रह की महादशा उसके लिए शुभ फल कारक रहेगी। इस दशा के दौरान उसके मान सम्मान, व्यावसायिक उन्नति प्राप्त करने की अच्छी संभावना रहेगी। गीता की जन्मकुंडली का विश्लेषण करने पर यह ज्ञात होता है कि लग्न, लाभ एवं पराक्रम भावों पर बृहस्पति की पूर्ण दृष्टि के कारण प्रारंभिक जीवन से ही गीता की प्रवृत्ति महत्वाकांक्षी रही। लग्नेश बुध के छठे भाव में मंगल की राशि में स्थित होने से स्थिर विचारधारा की कमी तथा उसके मन में अपने कार्यों के बिगड़ने का भय हमेशा बना रहा। सातवें भाव में बृहस्पति और राहु की धनु राशि में युति के कारण गुरु-चांडाल योग बनने से एवं स्त्रियों के लिए गुरु ग्रह के पति कारक होने से अर्थात भावेश एवं भावकारक गुरु के पाप प्रभाव में होने से वह अपने प्रथम जीवन साथी के साथ अधिक दिनों तक तालमेल बनाए नहीं रख सकी। बृहस्पति ग्रह की अपने ही घर में स्थित होकर लाभ स्थान पर मित्र दृष्टि होने तथा कुटंुबेश चंद्रमा के दशम भाव में बृहस्पति की राशि में स्थित होने और सुखेश एवं पंचमेश की युति के कारण उसका दूसरा विवाह धनाढ्य परिवार में हुआ। भविष्य में केतु की महादशा में शनि की अंतर्दशा के दौरान अर्थात जून, 2006 तक धैर्य एवं संयम बनाए रखना आवश्यक है। उसके पश्चात स्थिति सामान्यतः ठीक रहेगी।


रत्न विशेषांक  फ़रवरी 2006

हमारे ऋषि महर्षियों ने मुख्यतया तीन प्रकार के उपायों की अनुशंसा की है यथा तन्त्र, मन्त्र एवं यन्त्र। इन तीनों में से तीसरा उपाय सर्वाधिक उल्लेखनीय एवं करने में सहज है। इसी में से एक उपाय है रत्न धारण करना। ऐसा माना जाता है कि कोई न कोई रत्न हर ग्रह से सम्बन्धित है तथा यदि कोई व्यक्ति वह रत्न धारण करता है तो उस ग्रह के द्वारा सृजित अशुभत्व में काफी कमी आती है। फ्यूचर समाचार के इस विशेषांक में अनेक महत्वपूर्ण आलेखों को समाविष्ट किया गया है जिसमें से प्रमुख हैं- चैरासी रत्न एवं उनका प्रभाव, विभिन्न लग्नों में रत्न चयन, ज्योतिष के छः महादोष एवं रत्न चयन, रोग भगाएं रत्न, रत्नों का शुद्धिकरण एवं प्राण-प्रतिष्ठा, कितने दिन में असर दिखाते हैं रत्न, लाजवर्त मणि-एक नाम अनेक काम इत्यादि। इसके अतिरिक्त स्थायी स्तम्भों के भी महत्वपूर्ण आलेख विद्यमान हैं।

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