रत्नों की पहचान कैसे करें

रत्नों की पहचान कैसे करें  

ज्योतिष में रत्नों की विशेष महिमा है। महर्षियों ने इन रत्नों के उन गुणों को पहचाना जिनसे ये ग्रहों से निकलने वाली रश्मियों को अवशोषित कर लेते हैं और इन्हें धारण करने वाले पर किसी ग्रह विशेष के पड़ने वाले दुष्प्रभावों में कमी आती है और अच्छे प्रभावों में वृद्धि होती है। लेकिन अलग-अलग ग्रहों के लिए अलग-अलग रत्न होते हैं और हर रत्न अपने से संबद्ध ग्रह की रश्मियों को ही एकत्र करता है, अन्य किसी ग्रह की रश्मियों को नहीं। यदि दो रत्न देखने में एक जैसे भी हों जैसे पुखराज एवं सुनहला या नीलम एवं नीली या माणिक्य एवं गार्नेट तो भी ज्योतिष के अनुसार इन दोनों की कार्य क्षमता में बहुत अंतर होता है। अतः किसी रत्न को हाथ में लेने से पहले सर्वप्रथम प्रश्न उठता है कि यह कौन सा रत्न है। देखने में बहुत कुछ एक जैसे दो रत्नों के मूल्यों में अत्यधिक अंतर हो सकता है जैसे कि 5-6 कैरेट के एक हीरे का मूल्य दस से बीस लाख रुपये तक हो सकता है जबकि कृत्रिम हीरे का केवल दस से बीस रुपये और यदि दोनों को मिला दिया जाए तो शायद देखने में कृत्रिम हीरा ही ज्यादा सुंदर दिखाई देगा। अतः यह परम आवश्यक है कि रत्न की पहचान सही से हो और आज के युग में जबकि मशीनीकरण का प्रचलन है एवं मशीनों द्वारा भी प्राकृतिक रत्न जैसे ही रत्नों का निर्माण संभव है। ऐसे में प्राकृतिक और कृत्रिम रत्नों में अंतर करना एवं रत्नों और उपरत्नों में अंतर कर पाना अत्यधिक कठिन हो गया है। केवल देखकर यह बता पाना अत्यंत कठिन है कि दिया हुआ पत्थर रत्न है, उपरत्न है या कृत्रिम रत्न है। प्रयोगशाला में अनेकानेक विधियां होती हैं जिनसे हम रत्नों की पहचान कर सकते हैं। रत्न के मुख्यतः निम्न गुणों को प्रयोगशाला में परीक्षण किया जाता है। 1. आपेक्षिक घनत्व (Density): हर रत्न का अपना घनत्व होता है। इसे मापने के लिए या तो अलग अलग आपेक्षिक घनत्व के द्रव्यों में रत्नों को डालकर यह जांचा जाता है कि उनका घनत्व किससे कम है और किससे ज्यादा । इसके अतिरिक्त घनत्व हाइड्रोस्टैटिक बैलेंस उपकरण द्वारा भी घनत्व का माप निकाला जाता है। 2. अपवर्तनांक (Refractive Index): हर रत्न का अपना अपवर्तनांक होता है जिसके द्वारा उसकी पहचान की जा सकती है। कुछ रत्नों का दोहरा अपवर्तनांक ;क्वनइसम त्प्द्ध होता है। रिफ्रैक्टोमीटर द्वारा यह अपवर्तनांक आसानी से मापा जा सकता है और इस प्रकार से माणिक्य, जिसका अपवर्तनांक 1.761 और 1. 770 है, को गार्नेट से अलग किया जा सकता है जिसका कि घनत्व तो माणिक्य जितना ही है लेकिन अपवर्तनांक उससे कहीं अधिक 1.775 और 1.790 के मध्य केवल एक है। 3. ध्रुवण (Polarization): कुछ रत्न दोहरा अपवर्तन (Double Refraction) दर्शाते हैं और उनमें भी कुछ रत्न एक अक्षीय ;न्दपंगपंसद्ध एवं कुछ द्वि अक्षीय ;ठपंगपंसद्ध होते हैं। पोलैरिस्कोप के मध्य में रत्न को रख दिया जाता है और दोनों ओर पोलराइजिंग फिल्टर्स तिरछी अवस्था ;ब्तवेे च्वेपजपवदद्ध में लगा दिए जाते हैं। इस स्थिति में प्रकाश एक ओर से दूसरी ओर नहीं पहुंच पाता है। लेकिन रत्न रख देने पर विशेष कोणों पर प्रकाश दिखने लगता है जिससे कि रत्न में ध्रुवण की पहचान की जाती है। 4. माइक्रोस्कोप में रत्न को देखना: रत्न प्रकृति में अनेक वर्षों में बन पाते हैं। जिन द्रव्यों एवं गैसों द्वारा ये बनते हैं वे इसके अंदर समाहित हो अलग से दिखाई देते हंै। ये अंतःस्थ द्रव्य व गैस (Inclusions) रत्न की पहचान करने में अत्यंत सहायक होते हैं। इनके आधार पर यह बताना भी संभव होता है कि ये किस स्थान से प्राप्त किए गए हैं। कृत्रिम रत्नों के द्रव्य व गैस प्राकृतिक द्रव्यों व गैसों से काफी भिन्न होते हैं क्योंकि कृत्रिम विधि में क्रिस्टलीकरण (Crysitilisation) बहुत तीव्र गति से किया जाता है। 5. कठोरता: 5. कठोरता:5. कठोरता: मोह स्केल में कठोरता 1 से लेकर 10 तक दर्शाई जाती है। इसके अंतर्गत 10 प्रकार के खनिज पदार्थ लिए जाते हैं जिनकी कठोरता 1 से लेकर 10 तक होती है- 1.टैल्क, 2.जिप्सम, 3.कैल्साइट, 4.फ्लोराइट, 5.एपेटाइट, 6.आॅर्थोक्लेज, 7.क्वाट्र्ज, 8.टोपाज, 9.कोरंडम, 10.हीरा। अधिक कठोरता वाला खनिज कम कठोरता वाले खनिज पर खरोंच डालने में सक्षम होता है। कौन सी कठोरता वाले खनिज की कलम रत्न पर खरोंच डालने में सक्षम है इस आधार पर उसकी कठोरता की पहचान की जाती है। 6. प्रतिदीप्ति (Fluorescence): कुछ रत्न पराबैंगनी प्रकाश में प्रतिदीपन (Fluorescene) दर्शाते हैं। इस विधि के अंतर्गत रत्न किसी भी तरंग ;ॅंअमसमदहजीद्ध वाली रश्मियों को अवशोषित कर उससे अधिक तरंग वाली रश्मियों को उत्सर्जित (Emit) करता है जिससे कि उसका रंग बदला हुआ नजर आता है। प्रतिदीप्त (Fluorescent) माणिक्य को जो कि गार्नेट से भी इस विधि से अलग किया जा सकता है। 7. स्पेक्ट्रोस्कोप द्वारा परीक्षण: यह एक बहुत ही अच्छी विधि है रत्नों को पहचानने की। इसमें रत्न के द्वारा जो रश्मि अवशोषित की जा रही है एवं जो संप्रेषित, उसका एक वर्णक्रम (Spectrum) देखकर दो रत्नों में अंतर कर सकते हैं। चित्र में रूबी और गार्नेट का वर्णक्रम दिखाया गया है जिसके द्वारा दोनों में अंतर करना बहुत ही आसान है। उपर्युक्त सभी विधियां प्रयोग में कुछ कठिन हैं। आज के इस कंप्यूटर युग में रत्न की पहचान के लिए विशेष इलेक्ट्राॅनिक उपकरण भी उपलब्ध हैं जिनके द्वारा रत्न को केवल स्पर्श कराकर पहचाना जा सकता है कि वह किस श्रेणी का है। ये उपकरण रत्न की ताप चालकता एवं परावर्तकता पर आधारित होते हैं। इन उपकरणों से बहुत ही सुविधापूर्वक कुछ सेकंड में ही रत्न को उपरत्न या कृत्रिम रत्न से अलग किया जा सकता है।


रत्न विशेषांक  फ़रवरी 2006

हमारे ऋषि महर्षियों ने मुख्यतया तीन प्रकार के उपायों की अनुशंसा की है यथा तन्त्र, मन्त्र एवं यन्त्र। इन तीनों में से तीसरा उपाय सर्वाधिक उल्लेखनीय एवं करने में सहज है। इसी में से एक उपाय है रत्न धारण करना। ऐसा माना जाता है कि कोई न कोई रत्न हर ग्रह से सम्बन्धित है तथा यदि कोई व्यक्ति वह रत्न धारण करता है तो उस ग्रह के द्वारा सृजित अशुभत्व में काफी कमी आती है। फ्यूचर समाचार के इस विशेषांक में अनेक महत्वपूर्ण आलेखों को समाविष्ट किया गया है जिसमें से प्रमुख हैं- चैरासी रत्न एवं उनका प्रभाव, विभिन्न लग्नों में रत्न चयन, ज्योतिष के छः महादोष एवं रत्न चयन, रोग भगाएं रत्न, रत्नों का शुद्धिकरण एवं प्राण-प्रतिष्ठा, कितने दिन में असर दिखाते हैं रत्न, लाजवर्त मणि-एक नाम अनेक काम इत्यादि। इसके अतिरिक्त स्थायी स्तम्भों के भी महत्वपूर्ण आलेख विद्यमान हैं।

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