परमयोग: महर्षि पराशर के शास्त्र की यह एक विशेषता है कि इसमें सर्वत्र ‘धर्म’ (गुण-धर्म) के भेद से ‘धर्मों’ में भेद माना गया है। इसलिए एक ही ग्रह या भाव के विविध गुण-धर्म के आधार पर उसमें भेद किया जाता है। यह भेद इसलिए भी आवश्यक है कि इसके बिना न तो फलादेश की जटिलताओं को सुलझाया जा सकता है और न ही विलक्षण गति से चलने वाले जीवन के घटनाचक्र की शास्त्रसम्मत व्याख्या की जा सकती है। जो ग्रह केन्द्रेश है वही त्रिकोणेश हो जाए तो एक ही ग्रह केंद्र एवं त्रिकोण का स्वामी हो जाता है। इस स्थिति में एक ही ग्रह में केन्द्रेशत्व एवं त्रिकोणेशत्व साथ-साथ एवं सदैव रहते हैं। जिस प्रकार केंद्र एवं त्रिकोण के स्वामी साथ-साथ रहने से युति संबंध के प्रभाववश योगकारक हो जाते हैं, ठीक उसी प्रकार एक ही ग्रह के केंद्रेश एवं त्रिकोणेश होने पर उसमें केन्द्रेशत्व एवं त्रिकोणेशत्व की युति सदैव एवं निरंतर रहती है। इसलिए ऐसा एक ही ग्रह योगकारक माना जाता है।(1) ऐसे ग्रह की एक प्रमुख विशेषता यह है कि वह कभी भी न तो ‘इतर’ भाव का स्वामी हो सकता है और न ही दोषयुक्त हो सकता है। इसलिए वह अनुच्छेद 35 के अनुसार विशेष फलदायक कहलाता है। परिणामतः एक ही ग्रह के केंद्रेश और त्रिकोणेश होने पर उसे शुद्ध योगकारक एवं स्वयंकारक कहते हैं। ‘इतर’ भाव का स्वामी या दोषयुक्त न होने से उसे शुद्ध तथा केंद्र एवं त्रिकोण का स्वामी होने से उसे स्वयंकारक कहते हैं। इस प्रकार वृष एवं तुला लग्न में शनि, कर्क एवं सिंह लग्न में मंगल तथा मकर एवं कुंभ लग्न में शुक्र केंद्र एवं त्रिकोण का स्वामी होने के कारण स्वयंयोगकारक होते हैं। स्वयंयोगकारक ग्रह से अन्य त्रिकोणेश का संबंध हो जाए तो इससे अच्छा कौन सा योग हो सकता है?’’(2) तात्पर्य यह है कि योगकारक ग्रह स्वभावतः विशेष शुभ फलदायक होता है और उसका दूसरे शुभफलदायक त्रिकोणेश से संबंध हो जाए तो शुभत्व उत्कर्ष पर पहुंच जाता है। अतः स्वतः योगकारक ग्रह के साथ दूसरे त्रिकोणेश का संबध होना सर्वोत्तम राजयोग होता है। एकत्व का अभिप्राय: लघुपाराशरी के कुछ टीकाकारों(3) ने केंद्र त्रिकोणाधिपयोरेकत्त्वे योगकारकौ’’- यह पाठ मान कर इस श्लोक का यह अर्थ किया है कि केन्द्रेश का एक त्रिकोणेश से संबंध होना योगकारक है। उसका दूसरे त्रिकोणेश से संबंध हो तो क्या बात है ! किंतु ‘‘केंद्रत्रिकोणाधिपयोरेकत्त्वे’’ इसका अर्थ - ‘‘य एवं केन्द्राधीशः स एवं त्रिकोणाधीश इति केन्द्रत्रिकोणाधिपयोरेकत्वम्-अर्थात् जो ग्रह केंद्रेश है वहीं त्रिकोणेश हो तब केन्द्रेश एवं त्रिकोणेश में एकता होती है। यहां ‘योगकारकौ’ यह द्विवचनांत पाठ कुछ कठिनाइयां या भ्रांति उत्पन्न करता है। इसके स्थान पर ‘योगकारिता’ पाठ स्वीकार कर लिया जाए तो किसी प्रकार की कठिनाई या भ्रांति के लिए अवसर नहीं रहता। अतः ‘केन्द्रत्रिकोणाधिपयोरेकत्वे योगकारिता’- यह पाठ मूलपाराशरी एवं लघुपाराशरी के अनुकूल है और इसका अर्थ-केंद्र एवं त्रिकोण का स्वामी एक ग्रह होने पर वह योगकारक होता है,’ बहुसम्मत है। एक केंद्रेश के त्रिकोणेश से संबंध होने पर वे योगकारक होते हैं और उनका अन्य त्रिकोणेश से संबंध हो तो वे श्रेष्ठतर फल देते हैं। यह सर्वोत्तम योग वृष, तुला, कर्क, सिंह, मकर एवं कुंभ इन छः लग्नों में बनता है। इनमें से कर्क लग्न में स्वतः योगकारक मंगल से गुरु का संबंध होना तथा सिंह लग्न में स्वतः योगकारक मंगल का गुरु से संबंध होना आवश्यक है। किंतु कर्क लग्न में गुरु षष्ठेश तथा सिंह लग्न में गुरु अष्टमेश है। इसी प्रकार मकर लग्न में स्वतः योगकारक शुक्र का बुध से संबंध हो तथा कुंभ लग्न में स्वतः योगकारक शुक्र का बुध से संबंध होना अनिवार्य है। किंतु मकर लग्न में बुध षष्ठेश तथा कुंभ लग्न में वह अष्टमेश होता है। यहां यह स्वाभाविक शंका उत्पन्न होती है कि इस सर्वोत्तम योग में दूसरे त्रिकोणेश के षष्टेश या अष्टमेश होने पर क्या वह योग सर्वोत्तम रहेगा? इस विषय में मूलपाराशरी एवं लघुपाराशरी का स्पष्ट मत यह लगता है कि इस योग में एक केंद्रेश तथा दो त्रिकोणों के संबंध के कारण इतनी शुभता है कि दूसरे त्रिकोणेश का षष्ठेश या अष्टमेश होना उसे नष्ट नहीं कर सकता। यदि एक केंद्रेश एवं दो त्रिकोणेशों का संबंध सर्वोत्तम योग बनाता है तो क्या दो केन्द्रेश एवं एक त्रिकोणेश का संबंध एक केन्द्राधिपति के संबंध की अपेक्षा प्रबल नहीं होगा? और यदि वह केन्द्राधिपति लग्नेश हो तो वह योग अधिक प्रबल होना ही चाहिए जैसे मिथुन या कन्या लग्न में बुध का शुक्र के साथ संबंध तथा धनु या मीन लग्न में गुरु के साथ मंगल का संबंध। कारक ग्रहों में उत्तमता का तारतम्यः 1. एक केन्द्रेश का एक त्रिकोणेश से संबंध। 2. दो केन्द्रेशों का एक त्रिकोणेशों से संबंध। 3. एक केन्द्रेश का दो त्रिकोणेशों से संबंध। 4. दो केन्द्रेशों का दो त्रिकोणेशें से संबंध। 5. तीन केन्द्रेशों का दो त्रिकोणेशों से संबंध। 6. चारों केन्द्रेशों का दो त्रिकोणेशों से संबंध। इस प्रकार यदि चारों केन्द्रेशों और दोनों त्रिकोणेशों का परस्पर संबंध हो तो यह पाराशर शास्त्र के अनुसार कारकत्व योग का सबसे अनूठा एवं उत्तम उदाहरण होगा। विविध लग्नों में स्वतः योगकारक एवं अन्य त्रिकोणेशों की तालिका उपर प्रस्तुत है। कुंडली संख्या 1 में स्वतः योगकारक शनि का बुध के साथ युति संबंध परम योगी बनता है। कुंडली संख्या 2 में स्वतः योगकारक मंगल की नवमेश गुरु से युति तथा लग्नेश चंद्रमा से दृष्टि संबंध है। यहां दो केन्द्रेशों (लग्नेश एवं दशमेश) का दो त्रिकोणेशों (पंचमेश एवं नवमेश) के साथ संबंध और भी अच्छा योग बनाता है। यह कुंडली एक ऐसे व्यक्ति की है जो साधारण किसान के परिवार में जन्म लेकर भारत का प्रधानमंत्री बना। कुंडली संख्या 3 ऐसी महिला की है जो उच्च-मध्यम परिवार में उत्पन्न होकर भारत के प्रधानमंत्री की पुत्रवधू और बाद में केंद्रीय मंत्री बनी। इनकी कुंडली में स्वतः योगकारक मंगल का नवमेश गुरु के साथ दृष्टि संबंध है। कुंडली संख्या 4 एक ऐसे व्यक्ति की है जो साधारण परिवार में जन्म लेकर केन्द्रीय मंत्री बना तथा अपने निर्वाचन क्षेत्र में कई बार रिकार्ड मतों से विजयी हुआ। इनकी कुंडली में दो केन्द्रेश (लग्नेश एवं दशमेश) बुध का दो त्रिकोणेश शनि एवं शुक्र के साथ युति संबंध है। कुंडली संख्या 5 रूस की उस महान हस्ती की है जो साधारण परिवार में जन्म लेकर देश का प्रधानमंत्री बना और विश्व शांति के लिए नोबल-पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनकी कुंडली में तीन केंद्रेश दशमेश, लग्नेश एवं चतुर्थेश का पंचमेश मंगल के साथ पारस्परिक संबंध है।


रत्न विशेषांक  फ़रवरी 2006

हमारे ऋषि महर्षियों ने मुख्यतया तीन प्रकार के उपायों की अनुशंसा की है यथा तन्त्र, मन्त्र एवं यन्त्र। इन तीनों में से तीसरा उपाय सर्वाधिक उल्लेखनीय एवं करने में सहज है। इसी में से एक उपाय है रत्न धारण करना। ऐसा माना जाता है कि कोई न कोई रत्न हर ग्रह से सम्बन्धित है तथा यदि कोई व्यक्ति वह रत्न धारण करता है तो उस ग्रह के द्वारा सृजित अशुभत्व में काफी कमी आती है। फ्यूचर समाचार के इस विशेषांक में अनेक महत्वपूर्ण आलेखों को समाविष्ट किया गया है जिसमें से प्रमुख हैं- चैरासी रत्न एवं उनका प्रभाव, विभिन्न लग्नों में रत्न चयन, ज्योतिष के छः महादोष एवं रत्न चयन, रोग भगाएं रत्न, रत्नों का शुद्धिकरण एवं प्राण-प्रतिष्ठा, कितने दिन में असर दिखाते हैं रत्न, लाजवर्त मणि-एक नाम अनेक काम इत्यादि। इसके अतिरिक्त स्थायी स्तम्भों के भी महत्वपूर्ण आलेख विद्यमान हैं।

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