षोडश वर्ग फलित ज्योतिष का महत्वपूर्ण अंग

षोडश वर्ग फलित ज्योतिष का महत्वपूर्ण अंग  

प्रश्न: फलित ज्योतिष में षोडश वर्ग का क्या महत्व है? उत्तर: जन्म पत्रिका का सूक्ष्म अध्ययन करने के लिए षोडश वर्ग विशेष सहायक होते हैं। इन वर्गों के अध्ययन के बिना जन्म कुंडली का विश्लेषण अधूरा है क्योंकि जन्म कुंडली से केवल जातक के शरीर, उसकी संरचना एवं स्वास्थ्य के बारे में विस्तृत अध्ययन किया जाता है जबकि षोडश वर्ग का प्रत्येक वर्ग जातक के जीवन के एक विशिष्ट कारकत्व या घटना के अध्ययन के लिए सहायक होता है। प्रश्न: बिना षोडश वर्ग अध्ययन के विश्लेषण अधूरा कैसे? उत्तर: जातक के जीवन के जिस पहलू के बारे में हम जानना चाहते हैं उस पहलू के वर्ग का जब तक हम अध्ययन नहीं करें तो विश्लेषण अधूरा ही रहता है। जैसे हम जातक की संपत्ति-संपन्नता के विषय में जानना चाहते हैं तो जरूरी है कि होरा वर्ग का अध्ययन करें या किसी के व्यवसाय के बारे में जानना है तो दशमांश का अध्ययन करना चाहिए। जातक के जीवन के विभिन्न पहलुओं को जानने के लिए किसी विशेष वर्ग का अध्ययन किये बिना फलित चूक सकता है। प्रश्न: षोडश वर्ग के भिन्न-भिन्न वर्गों से जातक के किन-किन पहलुओं का ज्ञान होता है? उत्तर: षोडश वर्ग में सोलह वर्ग हैं जो जातक के विभिन्न पहलुओं की जानकारी देते हैं। जैसे: होरा से संपत्ति व समृद्धि, द्रेष्काण से भाई-बहन, पराक्रम, चतुर्थान्श से भाग्य, चल एवं अचल संपत्ति, सप्तांश से संतान, नवांश से वैवाहिक जीवन व जीवन साथी, दशमांश से व्यवसाय व जीवन में उपलब्धियां, द्वादशांश से माता-पिता, षोडशांश से सवारी एवं सामान्य खुशियां, विंशांश से पूजा-उपासना और आशीर्वाद, चतुर्विंशांश से विद्या, शिक्षा, दीक्षा, ज्ञान आदि, सप्तविंशांश से बल एवं दुर्बलता, त्रिंशांश से दुःख, तकलीफ, दुर्घटना, अनिष्ट, खवेदांश से शुभ या अशुभ फलों का विवेचन, अक्षवेदांश से जातक का चरित्र, षष्ट्यांश से जीवन के सामान्य शुभ-अशुभ फल आदि अनेक पहलुओं का सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है। प्रश्न: षोडश वर्ग में कौन से वर्ग अधिक महत्वपूर्ण हैं? उत्तर: यूं तो सभी वर्ग महत्वपूर्ण हैं लेकिन आज के युग में जातक धन, पराक्रम, भाई-बहनों से वाद-विवाद, रोग, संतान, वैवाहिक जीवन, साझेदारी, व्यवसाय, माता-पिता और जीवन में आने वाले संकटों के बारे में अधिक प्रश्न करता है। इन प्रश्नों के विश्लेषण के लिए होरा, द्रेष्काण, सप्तांश, नवांश, दशमांश, द्वादशांश और त्रिंशांश काफी हंै क्योंकि आज का मानव इन्हीं से संबंधित अधिक प्रश्न करता है। प्रश्न: क्या षोडश वर्ग के अतिरिक्त भी और वर्ग होते हैं? उत्तर: षोडश वर्ग में सोलह वर्ग लिए गए हैं लेकिन इसके अतिरिक्त भी और चार वर्ग पंचमांश, षष्टांश, अष्टमांश और एकादशांश हंै। पंचमांश जातक की आध्यात्मिक प्रवृत्ति, पूर्व जन्मों के पुण्य एवं संचित कर्मों की जानकारी देता है। षष्टांश से जातक के स्वास्थ्य, रोग के प्रति अवरोधक शक्ति, ऋण, झगड़े आदि की विवेचना की जाती है। एकदशांश जातक की बिना प्रयास धन प्राप्ति को दर्शाता है। यह वर्ग पैतृक संपत्ति, शेयर, सट्टे के द्वारा स्थायी धन प्राप्ति की जानकारी देता है। अष्टमांश से जातक की आयु एवं आयुर्दाय के विषय में जानकारी मिलती है। प्रश्न: षोडश वर्ग पर कितना ध्यान देना चाहिए? उत्तर: जब किसी विषय विशेष का बहुत ही सूक्ष्म अध्ययन करना हो तब षोडश वर्ग पर पूर्ण ध्यान देना चाहिए। प्रश्न: क्या सभी वर्ग कुंडलियों का हर प्रश्न के लिए विचार करना चाहिए या किसी एक प्रश्न के लिए? उत्तर: वर्ग कुंडलियों में एक वर्ग से हर प्रश्न पर विचार नहीं होता है। किसी विशेष विषय के लिए संबंधित वर्ग पर विचार करना चाहिए। प्रश्न: षोडश वर्ग में भी क्या अलग-अलग भाव अलग-अलग पहलुओं को दर्शाते हैं? उत्तर: षोडश वर्ग में अलग-अलग भाव अलग पहलुओं को नहीं दर्शाते हैं। वर्ग कुंडली में वर्ग के लग्न और उसमें बैठे ग्रहों का ही महत्व है। प्रश्न: यदि कोई ग्रह वर्गोत्तम है और नीच है तो कैसे फल देगा? उत्तर: वर्गोत्तम ग्रह नीच हो तो फल कमजोर ही होगा। फल ग्रह के बलाबल पर निर्भर करता है, भले ही वह नीच का हो। प्रश्न: क्या वर्गोत्तम होना केवल नवांश से ही देखना चाहिए? उत्तर: वर्गोत्तम नवांश से ही नहीं बल्कि और वर्गो से भी देखना चाहिए क्योंकि जिस विषय विशेष का अध्ययन करना हो उससे संबंधित वर्ग में भी यदि ग्रह लग्न कुंडली की राशि में है तो वर्गोत्तम माना जाएगा। प्रश्न: षोडश वर्ग का उपयोग ज्योतिष में और कहां मिलता है? उत्तर: षोडश वर्ग का उपयोग षड्बल और विंशोपक बल में बलों को साधने में किया गया है। प्रश्न: क्या षोडश वर्गो में उच्च-नीचस्थ ग्रहों आदि को भी लग्न कुंडली की तरह देखना चाहिए? उत्तर: षोडश वर्गों में उच्च, नीच, स्वग्रही आदि का विचार करना चाहिए। वृहत पराशर होरा शास्त्र के अनुसार ‘‘स्वोच्च मूलत्रिकोणस्वभवनाधिपतेः तथा। स्वारूढात् केंद्र नाथानां वर्गां ग्राह्याः सुधीमता।। अस्तंगता ग्रहजिता नीचगा दुर्बलास्थता। शयनादिगतादुस्था उत्पन्ना योग नाशकाः।। अर्थात अपने उच्च, मूलत्रिकोण, स्वभवन वाले लग्न केंद्राधिपतियों के वर्ग शुभ होते हैं। अस्तंगत, पराजित, नीचगत, बलहीन, शयनादि अवस्था में स्थित ग्रहों के वर्ग अशुभ फलदायक और शुभ फलों के नाशकारक होते हैं। प्रश्न: षोडश वर्ग में वर्गों के देवता आदि का वर्णन होता है। उनके फल कथन कैसे किए जाएं? उत्तर: षोडश वर्ग में ग्रह अंश के अनुसार राशि गणना की जाती है और साथ ही अधिदेव का स्पष्टीकरण किया जाता है। देवता की प्रकृति के अनुसार ही फलकथन करना चाहिए। लेकिन सामान्य रूप से राशि के स्वामी के अनुसार ही फल कथन किया जाता है। प्रश्न: जातक के धन संबंधित पहलू की जानकारी के लिए होरा किस तरह से देखनी चाहिए? उत्तर: जन्म कुंडली की प्रत्येक राशि के दो समान भाग कर सिद्धांतानुसार जो वर्ग बनता है, होरा कहलाता है। इससे जातक के धन संबंधित पहलू का अध्ययन किया जाता है। होरा में दो ही लग्न होते हैं, सूर्य का अर्थात सिंह या चंद्र का अर्थात कर्क। ग्रह या तो चंद्र होरा में रहते हैं या सूर्य होरा में। वृहत पराशर होराशास्त्र के अनुसार गुरु, सूर्य एवं मंगल सूर्य की होरा में जातक को अच्छा फल देते हैं। चंद्र, शुक्र एवं शनि चंद्र की होरा में अच्छा फल देते हैं। बुध दोनों होराओं में फलदायक है। यदि सभी ग्रह अपनी शुभ फल वाली होरा में होंगे तो जातक को धन संबंधी समस्याएं नहीं आएंगी, जातक धनी होगा। यदि कुछ ग्रह शुभ होरा में और कुछ अशुभ होरा में होंगे तो फल मध्यम रहेगा। यदि सभी ग्रह अशुभ होरा में होंगे तो जातक निर्धन होता है। प्रश्न: दे्रष्काण जातक के जीवन के किस पहलू के विश्लेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है? उत्तर: द्रेष्काण जातक के भाई-बहनों से सुख, परस्पर संबंध, पराक्रम के बारे में जानकारी के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त इससे जातक की मृत्यु का स्वरूप भी मालूम किया जाता है। प्रश्न: द्रेष्काण से फलित करते समय किन बातों पर ध्यान रखना चाहिए? उत्तर: द्रेष्काण से फलित करते समय हमें कुंडली के तीसरे भाव के स्वामी, तीसरे भाव का कारक मंगल एवं मंगल से तीसरे स्थित ग्रह की स्थिति और उसके बल का ध्यान रखना चाहिए। यदि द्रेष्काण कुंडली में संबंधित ग्रह अपने शुभ स्थान पर स्थित हैं तो जातक को भाई-बहनों से विशेष लाभ होगा और उसके पराक्रम में वृद्धि होगी। आगे चल कर जातक का अंत समय भी सुखी होगा। इसके विपरीत यदि संबंधित ग्रह अपने अशुभ स्थान अर्थात द्रेष्काण में होंगे तो जातक को अपने भाई-बहनों से किसी प्रकार का सहयोग प्राप्त नहीं होगा। ऐसी भी संभावना हो सकती है कि जातक अपने मां-बाप की अकेली ही संतान हो। प्रश्न: सप्तांश वर्ग से संतान सुख का विश्लेषण कैसे करते हैं? उत्तर: जन्म कुंडली में पंचम भाव संतान का माना गया है, इसलिए पंचम भाव का स्वामी, पंचम का कारक ग्रह गुरु, गुरु से पंचम स्थित ग्रह और उसके बल का ध्यान रखना चाहिए। सप्तांश में संबंधित ग्रह अपने उच्च या शुभ स्थान पर हो तो शुभ फल प्राप्त होता है अर्थात संतान का सुख प्राप्त होता है। इसके विपरीत अशुभ और नीचस्थ ग्रह जातक को संतानहीन बनाता है या संतान होने पर भी सुख नहीं प्राप्त होता। सप्तांश लग्न और जन्म लग्न दोनों के स्वामियों में परस्पर मित्रता (नैसर्गिक और तात्कालिक) होनी आवश्यक है। प्रश्न: नवांश क्या है और इस वर्ग का ज्योतिष में क्या महत्व है? उत्तर: राशियों को नौ समान भागों में विभक्त कर तैयार वर्ग नवांश कहलाता है। यह बहुत ही महत्वपूर्ण वर्ग है। सभी वर्गों में इस वर्ग की चर्चा सबसे अधिक होती है। इस वर्ग को जन्म कुंडली का पूरक भी समझा जाता है। आमतौर पर नवांश के बिना फलित नहीं किया जाता। यह ग्रहों के बलाबल और जीवन के उतार-चढ़ाव को दर्शाता है। मुख्य रूप से यह वर्ग विवाह, वैवाहिक जीवन में खुशियां एवं दुख को दर्शाता है। लग्न कुंडली में जो ग्रह अशुभ स्थिति में हो और नवांश में वह शुभ हो तो ग्रह को शुभ फलदायी या हानि न पहुंचाने वाला माना जाता है। यदि ग्रह लग्न और नवांश दोनों में एक ही राशि पर हो तो ग्रह को वर्गोत्तम माना जाता है अर्थात विशेष शुभ फलदायी ग्रह हो जाता है। लग्नेश और नवांशेश दोनों का आपसी संबंध लग्न और नवांश कुंडली में शुभ हो तो जातक के जीवन में विशेष खुशियों को लाता है, वैवाहिक जीवन सुखमय होता है, जातक हर प्रकार के सुखों को भोगता हुआ जीवन व्यतीत करता है। वर-वधू के कुंडली मिलान में भी नवांश महत्वपूर्ण है। यदि लग्न कुंडलियां आपस में न मिलें लेकिन नवांश वर्ग मिल जाएं तो विवाह उत्तम माना जाता है और गृहस्थ जीवन आनंदमय रहता है। प्रश्न: क्या नवांश वर्ग में दृष्टियां भी कार्य करती हैं? उत्तर: नवांश वर्ग ही क्यों, किसी भी वर्ग में दृष्टि को नहीं देखा जाता। सिर्फ लग्न कुंडली में ही दृष्टि का महत्व है, अन्य किसी वर्ग में दृष्टि नहीं होती। प्रश्न: यदि नवांश वर्ग लग्न वर्ग का पूरक है तो क्या सिर्फ नवांश से ही फलित किया जा सकता है? उत्तर: पूरक होने का यह अर्थ नहीं कि हम मूल को भूल जाएं। बिना लग्न कुंडली के नवांश वर्ग ही नहीं किसी भी वर्ग से अकेले फलित नहीं किया जा सकता। प्रश्न: यदि नवांश वर्ग में ग्रहों की स्थिति एकदम खराब हो और लग्न कुंडली में बहुत ही अच्छी हो तो जातक को कैसा फल प्राप्त होगा? उत्तर: लग्न कुंडली में जातक को राज योग होते हुए भी राज योग का फल प्राप्त नहीं होगा। यदि नवांश वर्ग में ग्रहों की स्थिति विपरीत रहती है तो देखने में जातक संपन्न अवश्य नज़र आएगा लेकिन अंदर से खोखला होगा, स्त्री से परेशान रहेगा, जीवन में संघर्ष करता हुआ जीवन बिताएगा। प्रश्न: व्यवसाय के विषय में सूक्ष्म जानकारी के लिए कौन सा वर्ग देखना चाहिए और कैसे? उत्तर: व्यवसाय के लिए दशमांश वर्ग की सहायता ली जाती है। दशमांश अर्थात राशि के दस समान भाग कर जो वर्ग बनता है। वैसे देखा जाए तो जन्म कुंडली का दशम भाव जातक का कर्म क्षेत्र है जिसे देख कर यह अनुमान लगाया जाता है कि जातक का व्यवसाय कैसा रहेगा अर्थात जातक अपने व्यवसाय में बिना किसी रुकावट के कार्य करता रहेगा या नहीं। लेकिन व्यवसाय कैसा होना चाहिए और व्यवसाय में स्थिरता की जानकारी के लिए दशमांश वर्ग सहायक होता है। यदि दशमेश और दशम भाव में स्थित ग्रह दशमांश वर्ग में बल प्राप्त करते हैं तो जातक को व्यवसाय में विशेष सफलता प्राप्त होती है। प्रश्न: जातक व्यापार करेगा या नौकरी, यह दशमांश से कैसे मालूम होगा? उत्तर: जातक की कुंडली में दशम भाव में स्थित ग्रह यदि दशमांश कुंडली में स्थिर राशि में है और शुभ ग्रह से युक्त है तो जातक व्यापार में सफलता पाता है। दशमांश के लग्न का स्वामी और लग्नेश दोनों एक ही तत्व राशि के हों तो भी जातक व्यापार करता है। इसके विपरीत यदि दशम भाव स्थित ग्रह दशमांश कुंडली में चर राशि में स्थित हो और अशुभ ग्रह से युक्त हो तो जातक नौकरी करता है। दशमांश वर्ग लग्न स्वामी और लग्नेश में परस्पर शत्रुता जातक को व्यवसाय में अस्थिरता देती है। ऐसे कई योग देखने के बाद व्यवसाय के विषय में सूक्ष्मता से जाना जा सकता है। प्रश्न: व्यापार में कोई बहुत बड़े व्यापार में होता है, कोई छोटे में और नौकरी में कोई बहुत ऊंचे पद पर और कोई निम्न पद पर, क्या यह भी दशमांश से जाना जा सकता है? उत्तर: दशमांश हर तरह से व्यवसाय के संबंध में सहायता करता है। दशमांश में ग्रह विशेष शुभ है और कुंडली में भी ग्रह शुभ है या शुभ योगों में है तो जातक नौकरी में हो या व्यापार में, उच्चकोटि का काम ही करता है। एक आई.ए.एस. अधिकारी की कुंडली में नौकरी से संबंधित ग्रह उच्च कोटि के होंगे तभी वह इस पद पर पहुंचता है। व्यापारी की कुंडली में व्यापार से संबंधित ग्रह दशमांश और कुंडली दोनों में ही शुभ और उच्च कोटि के होने से एक बड़ा व्यापारी बनता है। प्रश्न: कैसे द्वादशांश वर्ग से जानें कि माता-पिता से जातक को कितना सुख है? उत्तर: लग्नेश और द्वादशांश लग्नेश इन दोनों में आपसी मित्रता इस बात का संकेत करती है कि जातक और उसके माता-पिता में आपसी संबंध अच्छे रहेंगे। इसके विपरीत ग्रह स्थिति से आपसी संबंध बिगड़ेंगे। इसके साथ ही लग्न कुंडली के चतुर्थ और दशम भाव के स्वामियों की द्वादशंाश वर्ग में स्थिति मित्र राशि में होनी चाहिए। इससे जातक को माता-पिता का पूर्ण सुख प्राप्त होता है। यदि ग्रह स्थितियां विपरीत रहेंगी तो जातक को सुख की इच्छा नहीं करनी चाहिए। प्रश्न: कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि मां से तो जातक की बहुत बनती है पर पिता से दुश्मनी, ऐसी स्थिति में द्वादशांश मंे क्या ग्रह स्थितियां होती हैं? उत्तर: यदि चतुर्थेश द्वादशांश में अशुभ ग्रहों से युक्त हो गया तो माता से नहीं बनेगी और दशमेश यदि शुभ ग्रहों से युक्त हो और शुभ स्थित हो तो जातक की पिता से बनेगी। इसके अतिरिक्त सूर्य और शनि की युति पिता-पुत्र में आपसी वैमनस्य पैदा करती है। इसी तरह चंद्र और शनि की युति माता-पुत्र में आपसी दूरियां पैदा करती है। प्रश्न: जातक के जीवन में अरिष्ट कार्य होते रहेंगे, यह कैसे जाना जाएगा? उत्तर: त्रिंशांश वर्ग में यदि सुख प्रदान करने वाले ग्रह शत्रु क्षेत्री या अशुभ स्थिति में हांे तो जातक के जीवन में अरिष्ट कार्य होते रहेंगे। प्रश्न: दुर्घटना कब होगी, क्या यह भी त्रिंशांश वर्ग से जाना जा सकता है? उत्तर: यह बात ग्रह-दशा पर निर्भर करती है। जो ग्रह लग्न कुंडली में सुख देने वाला है और त्रिंशांश में अशुभ है तो उसी ग्रह की दशा में जातक को कष्ट होगा। संबंधित ग्रह की गोचर स्थिति पर भी घटना निर्भर करती है। प्रश्न: खगोलशास्त्र के अनुसार षोडश वर्ग क्या दर्शाता है? उत्तर: खगोल शास्त्र के अनुसार राशि चक्र को बारह राशियों और 27 नक्षत्रों में बांटा गया है। मंद गति के ग्रह राशियों और नक्षत्रों में काफी समय तक रहते हैं अतः उसके आगे विभाग करने के लिए षोडश वर्ग की सहायता ली गई है जिसमें एक राशि अधिक से अधिक 60 भागों में बांट कर पूरे राशि चक्र को 720 भागों में विभक्त किया गया है। इससे सूक्ष्म फलकथन में सहायता मिलती है। प्रश्न: क्या षोडश वर्ग से ग्रह शांति के उपाय भी बताए जा सकते हैं? उत्तर: ग्रह शांति उस ग्रह की होती है जो कुंडली में अनिष्टकारी हो। यदि षोडश वर्ग में किसी वर्ग में ग्रह निर्बल है और लग्न कुंडली अशुभ फलदायी नहीं है तो उसका उपाय किया जा सकता है। सामान्यतः लग्न कुंडली और चलित से ही उपाय करना चाहिए।


रत्न विशेषांक  फ़रवरी 2006

हमारे ऋषि महर्षियों ने मुख्यतया तीन प्रकार के उपायों की अनुशंसा की है यथा तन्त्र, मन्त्र एवं यन्त्र। इन तीनों में से तीसरा उपाय सर्वाधिक उल्लेखनीय एवं करने में सहज है। इसी में से एक उपाय है रत्न धारण करना। ऐसा माना जाता है कि कोई न कोई रत्न हर ग्रह से सम्बन्धित है तथा यदि कोई व्यक्ति वह रत्न धारण करता है तो उस ग्रह के द्वारा सृजित अशुभत्व में काफी कमी आती है। फ्यूचर समाचार के इस विशेषांक में अनेक महत्वपूर्ण आलेखों को समाविष्ट किया गया है जिसमें से प्रमुख हैं- चैरासी रत्न एवं उनका प्रभाव, विभिन्न लग्नों में रत्न चयन, ज्योतिष के छः महादोष एवं रत्न चयन, रोग भगाएं रत्न, रत्नों का शुद्धिकरण एवं प्राण-प्रतिष्ठा, कितने दिन में असर दिखाते हैं रत्न, लाजवर्त मणि-एक नाम अनेक काम इत्यादि। इसके अतिरिक्त स्थायी स्तम्भों के भी महत्वपूर्ण आलेख विद्यमान हैं।

सब्सक्राइब

अपने विचार व्यक्त करें

blog comments powered by Disqus
.