कैसे करें लहसुनिया रत्न की पहचान

कैसे करें लहसुनिया रत्न की पहचान  

लहसुनिया विभिन्न रंगों में पाया जाता है- हरा, हल्का हरा, पीला तथा भूरा। यह अत्यंत कठोर एवं टिकाऊ रत्न है इसलिए इसका आभूषणों में भी उपयोग किया जाता है। यदि लहसुनिया को कैबोकाॅन के रूप में काटा जाए तो इसके ऊपर पड़ने वाला प्रकाश एक लंबी रेखा के रूप में दिखाई देता है। यह रेखा कैबोकाॅन की ऊपरी सतह पर दिखाई देती है। इसी रेखा के कारण इसे कैट्स आइकहते हैं जो बिल्ली की आंख की तरह दिखती है। यह रेखा (आंख) हमें लहसुनिया के अंदर बहुत ही महीन समानांतर सुइयों से प्रशोषित होने वाले प्रकाश के कारण दिखती है। यह आंख हमें समानांतर सुइयों से 900 वाली दिशा में समलंब दिखती है। आंख जितनी गहरी एवं सुंदर होगी उतना ही लहसुनिया महंगा होगा। लहसुनिया मुख्यतः श्री लंका, ब्राजील तथा चीन में पाया जाता है। कई प्राकृतिक रत्न ऐसे हैं जिन्हें लहसुनिया कह कर बेचा जाता है। क्योंकि ये दिखने में एक समान होते हैं तथा इनकी कीमत लहसुनिया के मुकाबले काफी कम होती है इसलिए बाजार में इन्हें भी लहसुनिया बता कर ऊंचे दामों पर बेचा जाता है। वैसे तो लहसुनिया की तरह दिखने वाले कई रत्न हैं परंतु बाजार में मुख्यतः क्वाटर््ज कैट्स आइ, सिलिमेनाइट कैट्स आइ, यूस्टेटाइट कैट्स आइ, ग्लास कैट्स आइ, टाॅर्मलीन कैट्स आइ, स्पाइनल कैट्स आइ, सिंथेटिक क्राइसोबेरिल कैट्स आइ उपलब्ध हैं। इनमें से कुछ रत्नों में कुछ चीजों को आंखों से देखकर हम यह अंदाजा लगा सकते हैं कि वह कौन सा रत्न है जैसे कि आंख का रंग परंतु निश्चित तौर पर इनकी एक रत्न विशेषज्ञ, रत्न प्रयोगशाला में रत्न परीक्षण यंत्रों द्वारा ही पहचान कर सकता है। आंख का रंग: जब बात लहसुनिया एवं उसकी तरह दिखने वाले रत्नों में अंतर करने की हो तो उसकी आंख का रंग देखकर यह अनुमान लगा सकते हैं कि वह लहसुनिया है या नहीं। ज्यादातर लहसुनिया की आंख के रंग में हल्का सा नीलापन होता है। वहीं बाजार में लहसुनिया कहकर मिलने वाली क्वाटर््ज कैट्स आइ की आंख का रंग सफेद होता है। यह लहसुनिया की आंख के मुकाबले थोड़ी चैड़ी भी होती है। यूस्टेटाइट एवं ग्लास कैट्स आइ की आंख का रंग ज्यादातर उसी रंग का होता है जिस रंग के वे खुद होते हैं जैसे कि हरे ग्लास कैट्स आइ में आंख का रंग हरा होगा। ग्लास कैट्स आइ को ग्लास की सूक्ष्मदर्शी महीन सुइयों को जोड़कर बनाया जाता है इसलिए यदि हम ग्लास कैट्स आइ को आंख की 900 वाली दिशा में किसी सूक्ष्मदर्शी से देखें तो वह हमें छोटे-छोटे बिंदुओं या मधुमक्खी के छत्ते के समान दिखाई देता है। इसे हम अंग्रेजी में भ्वदमलबवउइ म्ििमबज कहते हैं। आंख के रंग को देखना केवल एक प्रारंभिक लक्षण हैं। यह सुनिश्चित कर लेना कि अगर आंख के रंग में हल्का सा नीलापन दिखाई दे रहा है तो वह लहसुनिया ही होगा, गलत है। इसकी निश्चित पहचान रत्न प्रयोगशाला में ही हो सकती है। कुछ यंत्रों के नाम तथा उनके परिणाम, जिससे असली और नकली लहसुनिया को पहचाना जा सकता है, निम्नलिखित हैं। 1. ैचमबपपिब ळतंअपजल डमजमत 2. त्मतिंबजवउमजमते 3. च्वसंतपेबवचम 4. ैचमबजतवेबवचम 5. डपबतवेबवचम 1. ैच्म्ब्प्थ्प्ब् ळत्।टप्ज्ल्: इस प्रक्रिया में हम किसी रत्न की एस.जी. को एक खास तरल पदार्थ (जिसकी एस.जीहमें पहले से ज्ञात होती है) में डालकर आंकते हैं। परिणामस्वरूप यह निश्चित कर सकते हैं कि यह रत्न कौन सा है। अगर रत्न की एस.जी. तरल पदार्थ की एस.जी. से कम होती है तो वह उसमें ऊपर तैरने लगता है परंतु अगर वह उससे ज्यादा होती है तो वह उसमें डूब जाता है। रत्न की एस.जी. अगर तरल पदार्थ की एस.जी. के समान हो तो वह उसमें ैनेचमदकमक(न ऊपर न नीचे) रहता है। जैसे कि ब्रोफाॅर्म, जो तरल पदार्थ है, की एस.जी. 2.88 होती है। अब अगर इसमें क्वाटर््ज कैट्स आइ ;ैळ.2ण्66द्ध और काइरोबेरिल कैट्स आइ ;ैळ.3ण्71द्ध डालें तो लहसुनिया, जिसकी एस.जी. 2.88 से ज्यादा है, डूब जाएगा और क्वाटर््ज कैट्स आइ, जिसकी एस.जी. 2.88 से कम है, ऊपर तैर आएगा। एक और तरीके से रत्न को हवा में एवं पानी में वजन करके उसकी सही एसजी. नाप सकते हैं तथा यह ज्ञात कर सकते हैं कि यह कौन सा रत्न हो सकता है। 2. त्मतिंबजवउमजमत: रिफ्रैक्टोमीटर से हम किसी रत्न की प्रकाश को मोड़ने की शक्ति को एक मापक पर आंकते हैं हर रत्न की अपनी एक निर्धारित शक्ति होती है। जो अंकों में बताई जा सकती है। जैसे लहसुनिया की त्म्थ्त्।ब्ज्प्टम् प्छक्म्ग् (आर.आइ.) 1.746-1.755 तक या फनंतज्र ब्ंेजमलम की आर.आइ. 1.544-1.553 तक होती है। जो भी आर.आइ. त्मतिंबजवउमजमत के मापक पर दिखती है उससे यह देखते हैं कि यह आर.आइ. किस रत्न की हो सकती है। 3. च्वसंतपेबवचम: कुछ रत्न ैपदहसल त्मतिंबजपअम ;ैत्द्ध होते हैं तथा कुछ क्वनइसल त्मतिंबजपअम ;क्त्द्ध। क्त् रत्नों में कुछ एक अक्षीय न्दपंगपंस ;न्द्ध होते हैं तथा कुछ द्विअक्षीय ठपंगपंस ;ठद्ध होते हैं। च्वसंतपेबवचम में ैत् तथा क्त्, न् और ठ के स्वाभाविक च्ंजजमतदे को देखकर यह बता सकते हैं कि वह रत्न कौन सा हो सकता है। लाल, बैंगनी या जामुनी को छोड़कर और यदि रत्न पारदर्शी है तभी हम उसे च्वसंतपेबवचम पर देख सकते हैं। 4. ैचमबजतवेबवचम: स्पेक्ट्रोस्कोप रत्न की उस पर पड़ने वाले प्रकाश में से कुछ रंगों को रोकने की क्षमता को अपने मापक पर पतली एवं मोटी काली रेखाओं के रूप में दिखाता है। कुछ रत्न हर बार उस पर पड़ने वाले प्रकाश में से कुछ खास रंग को ही रोकते हैं जिन्हें कोई रत्न विशेषज्ञ ही पहचान सकता है। जब ैचमबजतवेबवचम में दिखने वाला च्ंजजमतद किसी रत्न के च्मजजमतद से मेल खाता है तो वह रत्न ज्ञात किया जा सकता है जैसे लहसुनिया को ैचमबजतवेबवचम से देखने पर 444दउ पर एक काली रेखा नजर आती है। इस रेखा का दिखना लहसुनिया की पहचान है। 5. डपबतवेबवचम: एक सूक्ष्मदर्शी से किसी सूक्ष्म चीज को हम बड़ा कर आसानी से देख सकते हैं। कुछ रत्नों में उनमें दिखने वाली चीजें केवल उस रत्न के लिए ही स्वाभाविक होती हैं, वे किसी और रत्न में नहीं दिखतीं जिससे कि वे उस रत्न की पहचान बन जाती हैं जैसे ळसंेे ब्ंजे मलम को सूक्ष्मदर्शी पर देखने पर हमें भ्वदमलबवउइ म्ििमबज नजर आ सकता है, ज्वनतउंसपदम ब्ंजेमलम में हमें पानी की महीन खड़ी परतें नजर आ सकती हैं। ैलदजीमजपब लहसुनिया के आने से असली लहसुनिया की पहचान करना अत्यधिक कठिन होता है। परंतु रत्न प्रयोगशाला में कुछ खास तरीकों से उसकी पहचान की जा सकती है।


रत्न विशेषांक  फ़रवरी 2006

हमारे ऋषि महर्षियों ने मुख्यतया तीन प्रकार के उपायों की अनुशंसा की है यथा तन्त्र, मन्त्र एवं यन्त्र। इन तीनों में से तीसरा उपाय सर्वाधिक उल्लेखनीय एवं करने में सहज है। इसी में से एक उपाय है रत्न धारण करना। ऐसा माना जाता है कि कोई न कोई रत्न हर ग्रह से सम्बन्धित है तथा यदि कोई व्यक्ति वह रत्न धारण करता है तो उस ग्रह के द्वारा सृजित अशुभत्व में काफी कमी आती है। फ्यूचर समाचार के इस विशेषांक में अनेक महत्वपूर्ण आलेखों को समाविष्ट किया गया है जिसमें से प्रमुख हैं- चैरासी रत्न एवं उनका प्रभाव, विभिन्न लग्नों में रत्न चयन, ज्योतिष के छः महादोष एवं रत्न चयन, रोग भगाएं रत्न, रत्नों का शुद्धिकरण एवं प्राण-प्रतिष्ठा, कितने दिन में असर दिखाते हैं रत्न, लाजवर्त मणि-एक नाम अनेक काम इत्यादि। इसके अतिरिक्त स्थायी स्तम्भों के भी महत्वपूर्ण आलेख विद्यमान हैं।

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