वास्तु और ज्योतिष

वास्तु और ज्योतिष  

वास्तु और ज्योतिष पं. जय प्रकाश शर्मा (लाल धागे वाले) वास्तु शास्त्र ज्योतिष की ही एक शाखा है। बिना ज्योतिष ज्ञान के वास्तु शास्त्र अधूरा है। एक अच्छे वास्तु शास्त्री को कदम-कदम पर ज्योतिष की जरूरत महसूस होती है। वास्तु शास्त्र में प्रत्येक दिशा को एक ग्रह से जोड़ा गया है। ऐसे में एक वास्तु विशेषज्ञ के लिए प्रत्येक ग्रह के गुण, धर्म व स्वभाव का ज्ञान जरूरी हो जाता है। वहीं, वास्तु सुख की प्राप्ति के लिए अनुष्ठान, भूमि पूजन, नींव खनन, कुआं खनन, शिलान्यास, द्वार स्थापन, गृह प्रवेश आदि के मुहूर्त व शुभाशुभ ज्ञान के लिए ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान जरूरी होता है। एक जैसे दो मकानों में रहने वाले दो परिवारों में अलग-अलग समस्याएं व परस्पर विरोधी फल मिलने के कारणों का विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि उनके गृह प्रवेश मुहूर्त व जन्मपत्रियों में भिन्नता है। जन्मपत्री द्वारा निर्धारित प्रारब्ध और संचित कर्मों के फल को हमें भुगतान ही होगा। अनुकूल वास्तु के द्वारा हम अपनी कठिनाइयों को कम अवश्य कर सकते हैं, समाप्त नहीं कर सकते। वास्तु और ज्योतिष एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। जीवन के घटनाक्रम में आने वाले संकटों के निवारण के लिए यदि वास्तु के साथ-साथ ज्योतिषीय पहलू पर भी विचार कर लिया जाए, तो समस्या का निदान ढूंढ़ने में आसानी होगी। किसी व्यक्ति को किस प्रकार के वास्तु की प्राप्ति होगी? वह बना बनाया घर लेगा या भूमि लेकर स्वयं बनाएगा? पैतृक घर मिलेगा या मिले हुए को भी बेच देगा? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर के लिए ज्योतिष की सहायता लेना चाहिए। ग्रहों के गुण, धर्म, स्वभाव व दोष सूर्य पुरुष जाति का, रक्तवर्ण तथा पित्त प्रकृति का ग्रह है। यह पूर्व दिशा का स्वामी है। यह आत्मा, आरोग्य, स्वभाव, राज्य, देवालय का सूचक एवं पितृ कारक है। पूर्व दिशा में दोष या जन्मपत्री में सूर्य के पीड़ित होने पर पिता से संबंध कटुता रहती है। सूर्य की इस स्थिति के फलस्वरूप सरकार से परेशानी, सरकारी नौकरी में परेशानी, सिरदर्द, नेत्र रोग, हृदय रोग, चर्म रोग, अस्थि रोग, पीलिया, ज्वर, क्षय रोग व मस्तिष्क की दुर्बलता आदि हो सकते हैं। चंद्रमा स्त्री जाति का, श्वेतवर्ण तथा जलीय प्रकृति का ग्रह है। यह वायव्य दिशा का स्वामी है। यह मन, चित्तवृत्ति, शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य, संपत्ति व माता का कारक है। वायव्य दिशा में दोष या जन्मपत्री में चंद्रमा के दूषित होने पर माता से संबंध में कटुता, मानसिक परेशानियां, अनिद्रा, दमा, श्वास रोग, कफ, सर्दी जकुाम, मत्रू रागे , स्त्री हाने की स्थिति में मासिक धर्म संबंधी रोग, पित्ताशय की पथरी, निमोनिया आदि हो सकते हैं। मंगल पुरुष जाति का, रक्तवर्ण तथा अग्नि तत्व पित्त प्रकृति का ग्रह है। यह दक्षिण दिशा का स्वामी है। यह धैर्य और पराक्रम का स्वामी, भाई का कारक तथा रक्त एवं शक्ति का नियामक कारक है। दक्षिण दिशा में दोष या जन्मपत्री में मंगल के पीड़ित होने पर भाइयों से संबंध में कटुता, क्रोध की अधिकता, दुर्घटनाएं, रक्त विकार, कुष्ठ रोग, फोड़ा-फुंसी, उच्च रक्त चाप, बवासीर, चेचक, प्लेग आदि हो सकते हैं। बुध नपुंसक जाति का, श्यामवर्ण, पृथ्वी तत्व तथा त्रिदोष प्रकृति का ग्रह है। यह उत्तर दिशा का स्वामी है। यह ज्योतिष, चिकित्सा, शिल्प, कानून तथा व्यवसाय का स्वामी है। उत्तर दिशा में दोष या जन्मपत्री में बुध के पीड़ित होने पर विद्या-बुद्धि संबंधी पेरशानियां, वाणी दोष, मामा से संबंध में कटुता, स्मृति लोप, मिर्गी, गले के रोग, नाक के रोग, उन्माद, मतिभ्रम, व्यवसाय में हानि, शंकालुता, विचार में अस्थिरता आदि हो सकते हैं। गुरु पुरुष जाति का, पीतवर्ण आकाश तत्व वाला ग्रह है। यह ईशान दिशा का स्वामी है। इसके द्वारा पारलौकिक एवं आध्यात्मिक सुखों का विशेष रूप से विचार किया जाता है। ईशान कोण में दोष और जन्मपत्री में गुरु के पीड़ित होने पर पूजा पाठ के प्रति विरक्ति, देवताओं, गुरुओं और ब्राह्मणों पर आस्था में कमी, आय में कमी, संचित धन में कमी, विवाह में देरी, संतानोत्पत्ति में देरी, मूर्च्छा, उदर विकार, कान का रोग, गठिया, कब्ज, अनिद्रा आदि कष्ट हो सकते हैं। शुक्र स्त्री जाति का श्याम और गौरवर्ण, तथा जलीय तत्व वाला ग्रह है। यह आग्नेय दिशा का स्वामी है। यह काव्य, संगीत, वस्त्राभूषण, वाहन, स्त्री, काम तत्व व सांसारिक सुखों का कारक है। आग्नेय दिशा में दोष या जन्मपत्री में शुक्र के पीड़ित होने पर पत्नी सुख में बाधा, प्रेम में असफलता, वाहन से कष्ट, शृंगार के प्रति अरुचि, नपुंसकता, हर्निया, मधुमेह, धातु एवं मूत्र संबंधी रोग, स्त्री होने की स्थिति में गर्भाशय संबधी रोग आदि हो सकते हैं। शनि नपुंसक जाति का, कृष्ण वर्ण तथा वायु तत्व का ग्रह है। यह पश्चिम दिशा का स्वामी है। इसकी स्थिति के आधार पर आयु, बल, दृढ़ता, विपत्ति, यश व नौकर-चाकरों का विचार किया जाता है। यह व्यक्ति को दुर्भाग्य तथा संकटों के चक्कर में डालकर अंत में शुद्ध और सात्विक बना देता है। पश्चिम दिशा में दोष या जन्मपत्री में शनि के पीड़ित होने पर नौकरों से क्लेश, नौकरी में परेशानी, वायु विकार, लकवा, रीढ़ की हड्डी में तकलीफ, भूत-प्रेत का भय, चेचक, कैंसर, कुष्ठ रोग, मिर्गी, नपुंसकता, पैरों में तकलीफ आदि हो सकते हैं। राहु कृष्ण वर्ण का एक क्रूर ग्रह है। यह नैत्य दिशा का स्वामी है। इसकी स्थिति के आधार पर गुप्त युक्ति बल, कष्ट और त्रुटियों का विचार किया जाता है। नैत्य कोण में दोष या जन्मपत्री में राहु के पीड़ित होने पर दादा से परेशानी, मन में अहंकार की भावना की उत्पत्ति, त्वचा रोग, कुष्ठ रोग, मस्तिष्क रोग, भूत-प्रेत का भय आदि हो सकते हैं। राहु की तरह केतु भी कृष्ण वर्ण का एक क्रूर ग्रह है। इसकी स्थिति के आधार पर नाना से परेशानी, किसी के द्वारा किए गए जादू-टोने से परेशानी, छूत की बीमारी, रक्त विकार, दर्द, चेचक, हैजे, चर्म रोग का विचार किया जाता है। यह मोक्ष का कारक है।


रुद्राक्ष विशेषांक  मई 2010

रुद्राक्ष की उत्पत्ति व प्राप्ती स्थल, धारण नियम व विधि, रुद्राक्ष के प्रकार, औषधीय उपयोग, ज्योतिषीय महत्व और उपाय के रूप में इसके प्रयोग आदि विषयों पर ज्ञानवर्धन हेतु आज ही पढ़े फ्यूचर समाचार का रुद्राक्ष विशेषांक। ज्योतिष प्रेमियों के लिए विचार गोष्ठी स्तंभ के अंतर्गत वैवाहिक जीवन दोष एवं निवारण विषय पर की गई ज्योतिषीय परिचर्चा अत्यंत उपयोगी है।

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