रुद्राक्ष का औषधीय उपयोग

रुद्राक्ष का औषधीय उपयोग  

आयुर्वेद में रुद्राक्ष को महा औषधि की संज्ञा दी गई है। इसके विभिन्न औषधीय गुणों के कारण रोगोपचार हेतु इसका उपयोग आदिकाल से ही होता आया है। जानकारी के अभाव में आम जन उसके इस लाभ से वंचित रह जाते हैं। पाठकों के लाभार्थ, किस रोग के उपचार में कौन-सा रुद्राक्ष उपयोगी होता है इसका एक विशद विश्लेषण यहां प्रस्तुत है। वात, पित्त अ©र कफ जन्य रोगों के शमन हेतु Û रुद्राक्ष के विषय में कहा गया है कि यह उष्ण अ©र अम्लीय ह¨ता है। अपने इस गुण के कारण यह त्रिदोष जन्य र¨ग¨ं का शमन करता है। अम्ल अ©र विटामिन सी युक्त ह¨ने क¢ कारण यह रक्त-शोधक तथा रक्त-विकार नाशक है। उष्ण ह¨ने क¢ कारण यह सर्दी अ©र कफ के असंतुलन से ह¨ने वाले सभी र¨ग¨ं को दूर करने में उपय¨गी है। रक्तचाप को सामान्य रखने अ©र हृदय र¨ग से मुक्ति हेतु Û रुद्राक्ष की माला धारण करने से उच्च रक्तचाप सामान्य होता है और हृदय रोगों से मुक्ति मिलती है। माला इस तरह धारण करें कि यह वक्षस्थल को स्पर्श करती रहे। Û रुद्राक्ष और स्वर्ण भस्म बराबर मात्रा में 1-1 रŸाी सुबह और शाम नियमित रूप से मलाई के साथ सेवन करें, रक्तचाप सामान्य हो जाएगा। Û रुद्राक्ष घिसकर आधा चम्मच प्याज के रस तथा शहद मिलाकर खाएं और फिर लौकी का रस पीएं। यह क्रिया नियमित रूप से करें, हृदयाघात से रक्षा होगी। चेचक जन्य पीड़ा से मुक्ति हेतु Û रुद्राक्ष और काली मिर्च समान भार में लेकर दोनों को पीस लें और मिश्रण का कपड़-छान कर चेचक के रोगी को बासी पानी क¢ साथ पिलाएं। ऐसा तीन दिनों तक करें, र¨गी क¨ जलन और बेचैनी से मुक्ति मिलेगी। Û कच्चे नारियल क¢ तेल में रुद्राक्ष का एक दाना तीन घंटे तक रखें। फिर दाने को चम्मच या किसी अन्य उपकरण से निकाल लें। ध्यान रहे, हाथ से कदापि न निकालें। फिर उस तेल से रोगी की मालिश करें, चेचक क¢ दाग भर जाएंगे अ©र चेहरे पर कांति आ जाएगी। यह प्रय¨ग एक से डेढ़ मास तक नियमित रूप से करें। स्मरण शक्ति की कमी, खांसी और दमा र¨ग से मुक्ति के लिए Û रुद्राक्ष क¨ दूध में उबालकर पीने से स्मरण शक्ति तीव्र होती है। Û दस मुखी रुद्राक्ष को गाय के ताजे दूध के साथ घिसकर दिन में तीन बार उसका सेवन करें। यह क्रिया नियमित रूप से करते रहें, कुछ ही दिनों में पुरानी से पुरानी खांसी से मुक्ति मिलेगी। Û पांच मुखी रुद्राक्ष के कुछ दानें फोड़कर उबाल लें और उस पानी का सेवन करें। ऐसा नियमित रूप से करें, दमे व श्वास रोग से राहत मिलेगी। Û रुद्राक्ष को घिसकर शहद के साथ दिन में 3 बार लें, खांसी से मुक्ति मिलेगी। Û एक भाग छह मुखी रुद्राक्ष और चार भाग सितोपलादि का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ नियमित रूप से लें, श्वास रोग से बचाव होगा। क¨लेस्टेराॅल के स्तर को सामान्य करने के लिए Û एक कप दूध उबालकर उसमें एक रुद्राक्ष तथा लहसुन की फांक रखें। कुछ देर छोड़ दें और फिर रुद्राक्ष को निकाल कर दूध का सेवन करें और लहसुन की फांक खा लें। ऐसा तीन महीने तक नियमित रूप से करते रहें, कोलेस्टेराॅल का स्तर सामान्य हो जाएगा। मानसिक शांति हेतु Û गाय के दूध में 4 रुद्राक्ष उबालकर दूध का सेवन करें, मानसिक रोग से मुक्ति मिलेगी और मन शांत रहेगा। यह क्रिया तीन माह तक करें। बवासीर एवं गुर्दे क¢ र¨ग से बचाव के लिए Û एक रुद्राक्ष और उसके चार गुने भार के बराबर अपामार्ग के बीज सवा लीटर पानी में खौलाएं। जब पानी का लगभग दसवां भाग रह जाए, तो उसमें गाय का दो गुना घी मिला दें। फिर इसकी 12 से 15 बूंदों की मात्रा का प्रतिदिन सेवन करें, बवासीर और गुर्दे की बीमारी से राहत मिलेगी। प्रदर र¨ग से मुक्ति हेतु Û प्रदर रोग से ग्रस्त स्त्रियां एक भाग रुद्राक्ष, दो भाग चैलाई की जड़ और दो भाग रस©त का चूर्ण बनाकर चार गुने पानी में मिलाएं और उसे मिट्टी क¢ पात्र में रात भर रखें। सुबह उसे छान लें और चावल क¢ ध¨वन क¢ साथ दस ग्राम की मात्रा में सेवन करें, प्रदर रोग से मुक्ति मिलेगी। रुद्राक्ष धारण से लाभ Û शिखा में अथवा मस्तक पर रुद्राक्ष धारण करें, सिर-दर्द, आंख¨ं के धुंधलेपन, नजला-जुकाम, दिमाग की कमज¨री, स्मरण शक्ति में कमी आदि से रक्षा होगी। Û कंठ में रुद्राक्ष धारण करें, टाॅन्सिल अपनी सामान्य स्थिति में रहेगा, स्वर का भारीपन दूर होगा तथा हकलाहट कम होगी। Û वात रोग के प्रकोप से मुक्ति हेतु दायीं भुजा तथा स्नायविक विकारों से मुक्ति हेतु बायीं भुजा पर रुद्राक्ष धारण करें। द¨न¨ं भुजाअ¨ं पर रुद्राक्ष धारण करने से ऊपर वर्णित र¨ग¨ं से मुक्ति के साथ-साथ पक्षाघात से भी बचाव ह¨ता है। Û कमर में रुद्राक्ष धारण करने से कमर दर्द, रीढ़ की हड्डी क¢ र¨ग, पेट की बीमारी आदि से मुक्ति मिलती है। महिलाअ¨ं क¢ लिए कमर में रुद्राक्ष धारण करना अत्यधिक लाभप्रद होता है। इससे उनका प्रदर र¨ग तथा अनियमित रजोधर्म से बचाव होता है। साथ ही, प्रसव भी सरलता से ह¨ता है। ध्यान रहे, रुद्राक्ष कमर में नाभि क¢ ऊपर ही धारण करें। ग्रह जन्य रोगों से मुक्ति तथा बचाव में रुद्राक्ष का उपयोग ब्रह्मांड में फैले ग्रह विभिन्न र¨गों के कारक हैं। विभिन्न मुखों वाले रुद्राक्ष विभिन्न ग्रह¨ं का प्रतिनिधित्व करते हैं। यहां किस ग्रह के कारण उत्पन्न रोग से मुक्ति हेतु कौन सा रुद्राक्ष धारण करना चाहिए, इसका एक संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत है। Û सूर्य मस्तिष्क ज्वर, शरीर में जलन, पित्त र¨ग, हृदय र¨ग, नेत्र-पीड़ा, हड्डी क¢ र¨ग आदि का कारक है। इन रोगों से मुक्ति हेतु एक अ©र बारह मुखी रुद्राक्ष धारण करें। Û मिर्गी, अपस्मार, नींद की कमी या नींद न आना, कफ, सर्दी, जुकाम, नजला, छाती में बलगम जमना, अतिसार, संग्रहणी, स्त्रिय¨ं क¢ रजोधर्म में अनियमितता, निम¨निया, सर्दी के कारण बुखार आदि चंद्र के कारण होते हैं। इनसे मुक्ति क¢ लिए दो मुखी रुद्राक्ष धारण करें। Û मंगल ग्रह जनित र¨ग¨ं जैसे उच्च रक्तचाप, रक्ताल्पता अथवा रक्त विकार, मज्जा क¢ र¨ग, गुल्म र¨ग आदि से बचाव हेतु तीन मुखी रुद्राक्ष धारण करें। Û बुध मस्तिष्क की बीमारिय¨ं, स्नायु रोग, स्मरण शक्ति की कमी, नाड़िय¨ं से संबंधित र¨ग, सांस की नली, गले एवं फ¢फडे़ क¢ र¨ग, नर्वस बे्रक-डाउन, चर्म र¨ग आदि का कारक है। इन रोगों से बचाव हेतु चार मुखी रुद्राक्ष धारण करें। Û जंघा एवं लीवर की बीमारियां, शरीर में चर्बी एवं क¨षिकाअ¨ं की वृद्धि से उत्पन्न र¨ग, अंतड़िय¨ं का ज्वर, पीलिया, गुर्दे की बीमारी आदि गुरु क¢ कारण होते हैं। इनसे बचाव हेतु पांच मुखी रुद्राक्ष धारण करें। Û शुक्र ग्रह मूत्र र¨ग, प्रमेह, मधुमेह, जननेंद्रिय र¨ग, शरीर के सूखने, गुर्दे के र¨ग, आंख¨ं की ज्य¨ति की कमी आदि का कारक है। इन रोगों क¢ शमनार्थ तीन तथा तेरह मुखी रुद्राक्ष धारण करें। Û शनि के कारण उत्पन्न र¨ग¨ं जैसे वायु विकार, ज¨ड¨़ं के दर्द, पक्षाघात, हड्डिय¨ं की कमज¨री, टांगों के दर्द, लड़खड़ाहट, निम्न रक्तचाप आदि से मुक्ति हेतु सात और चैदह मुखी रुद्राक्ष धारण करें। Û विषादि जन्य र¨ग, क¨ढ़ आदि राहु के कारण उत्पन्न र¨गों से मुक्ति हेतु आठ मुखी रुद्राक्ष धारण करें। Û क¢तु गुप्त र¨ग¨ं का कारक है। इन रोगों से मुक्ति तथा बचाव के लिए नौ मुखी रुद्राक्ष धारण करें। रुद्राक्ष-जल चिकित्सा स्वच्छ जल में रुद्राक्ष डुबाकर उस जल का सेवन करने से भी कुछ बीमारियां दूर होती हैं। किंतु रुद्राक्ष को जल में ज्यादा से ज्यादा तीन दिनों तक रखना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर पुनः नया रुद्राक्ष-जल तैयार कर लेना चाहिए। यहां कुछ रोगों से बचाव हेतु रुद्राक्ष-जल के उपयोग की विधि का विवरण प्रस्तुत है। Û रात को सोने से पहले रुद्राक्ष क¢ कुछ दानें स्वच्छ जल में डाल दें। प्रातः काल खाली पेट उस जल का सेवन करें, कब्ज तथा अन्य विभिन्न रोगों से मुक्ति मिलेगी। Û अकारण ही बेचैनी या घबराहट महसूस होती हो, या मितली आती ह¨, त¨ रुद्राक्ष-जल क¢ दो-तीन चम्मच थ¨ड़ी-थ¨ड़ी देर पर पीएं, आराम मिलेगा। Û आंख¨ं में जलन, धुंधलापन आदि से बचाव के लिए रुद्राक्ष-जल क¢ छींटे मारें और फिर उन्हें प¨ंछकर कुछ पल¨ं क¢ लिए बंद कर लें। यह क्रिया नियमित रूप से करते रहें, लाभ होगा। Û आंखों में दर्द या पीड़ा हो, अथवा किसी कारणवश सूजन आ गई हो, तो पांच मुखी रुद्राक्ष को घिसकर काजल की तरह लगाएं, आश्चर्यजनक लाभ मिलेगा। Û नाक क¢ द¨न¨ं छिद्र¨ं से रुद्राक्ष-जल खींचें, सर्दी, जुकाम और नजले से राहत मिलेगी। Û कान पक गया ह¨, मवाद आता ह¨, कम सुनाई पड़ता ह¨, त¨ रुद्राक्ष-जल की कुछ बूंदें कान में डालें, लाभ मिलेगा। Û सरसों के तेल में पांच मुखी रुद्राक्ष उबालकर उसे ठंडा होने के लिए कुछ देर छोड़ दें। फिर उसकी एक से दो बूंदें कान में डालें, दर्द दूर होगा। Û घाव, पक¢ फ¨डे़-फुंसियों आदि क¨ रुद्राक्ष-जल से धोएं, राहत मिलेगी। Û पांच मुखी रुद्राक्ष की भस्म को गोमूत्र अथवा गोबर और गंगाजल में मिलाकर चर्म रोग से ग्रस्त स्थान पर लगाएं, लाभ होगा। Û जिह्वा क¢ चटक जाने, स्वर में भारीपन आ जाने अथवा गले में किसी प्रकार का र¨ग ह¨ जाने पर रुद्राक्ष-जल के गरारे करें, आराम मिलेगा। रुद्राक्ष-भस्म, लेप तथा चूर्ण चिकित्सा Û ब्राह्मण जाति के नौ मुखी रुद्राक्ष की भस्म बना लें और तुलसी के पŸाों के रस के साथ उसका लेप बनाकर कुष्ठग्रस्त अंग पर लगाएं। लेप नियमित रूप से लगाते रहें, कुछ ही सप्ताहों में आराम मिलेगा। Û रुद्राक्ष को नीम की पŸिायों के साथ घिसकर खुजलीग्रस्त अंग पर उसका लेप करें। यह क्रिया नियमित रूप से करते रहें, खुजली से मुक्ति मिलेगी। Û रुद्राक्ष क¨ जल क¢ साथ चंदन की तरह घिस लें। फिर इस लेप क¨ फ¨डे़-फुंसियों पर लगाएं, लाभ होगा। यह लेप रक्त-द¨ष या एलर्जी क¢ चकत्तों को भी दूर करता है। Û रुद्राक्ष अ©र बावची का एक-एक भाग हरताल और ग¨मूत्र क¢ साथ पीसकर सफ¢द कुष्ठ से ग्रस्त स्थान पर उसका नियमित रूप से लेप करें, लाभ होगा। Û रुद्राक्ष अ©र बावची क¨ समभाग में नीम क¢ पत्तों क¢ साथ पीसकर लेप लगाने से खुजली तथा अन्य चर्म र¨ग दूर ह¨ते हैं। Û रुद्राक्ष, हल्दी अ©र हरी दूब क¨ समान भाग में छाछ क¢ साथ पीसकर लेप बनाएं और दाद, खाज, खुजली पर लगाएं, लाभ होगा। Û रुद्राक्ष, आंवले, यवक्षार अ©र राल का समान मात्रा में कंजी क¢ साथ लेप बनाकर सेहुंआ क¢ सफ¢द दागों पर लगाएं, कुछ ही दिन¨ं में दाग दूर होने लगेंगे। Û च¨ट या म¨च आ गई हो, या किसी अन्य कारण से शरीर क¢ किसी भाग में सूजन आ गई ह¨, त¨ रुद्राक्ष, साठी, स¨ंठ, देवदारु, सहजन अ©र सफ¢द सरस¨ं समान मात्रा में लेकर कंजी क¢ साथ पीसकर उसका प्रभावित भाग पर लेप करें, राहत मिलेगी। Û किसी जहरीले जानवर के काट लेने पर रुद्राक्ष क¨ घिसकर कटे हुए भाग पर लगाएं, विष का प्रभाव दूर हो जाएगा। Û विषैले बरसाती कीड़े, बिच्छू, ततैया आदि क¢ काट लेने पर उसका विष बड़ी़ पीड़ा देता है। ऐसी स्थिति में रुद्राक्ष, कलिहारी, मूली क¢ बीज, अतीस, कडुवी, तुंबी तथा त¨रई क¢ बीज समान मात्रा में लेकर कंजी क¢ साथ पीसकर उसका लेप प्रभावित भाग पर लगाएं, विष का प्रभाव तुरत दूर हो जाएगा। Û आग से जलने पर रुद्राक्ष अ©र चंदन क¨ पीसकर जले हुए स्थान पर लेप करें, शीतलता मिलेगी और घाव शीघ्र भर जाएगा। Û रुद्राक्ष, गेरु, गिल¨य, लाल चंदन तथा वंशल¨चन का समान मात्रा में चूर्ण बनाकर उसमें ग¨घृत मिलाकर लेप बना लें। फिर यह लेप नियमित रूप से शरीर पर लगाते रहें, घाव शीघ्र भर जाएंगे अ©र चेहरे पर पडे़ दाग, मुहांसे आदि मिट जाएंगे। Û रुद्राक्ष क¢ चूर्ण और म¨ती तथा मूंगे की भस्म का समान रूप से मिश्रण तैयार कर 2 ग्राम की मात्रा का नियमित रूप से सेवन करें, स्नायु की गड़बड़ी से मुक्ति मिलेगी। Û रुद्राक्ष क¢ चूर्ण क¨ तुलसी की डंडी क¢ चूर्ण में मिलाकर शहद क¢ साथ नियमित रूप से सुबह खाली पेट सेवन करें, खांसी दूर होगी। Û दो ग्राम रुद्राक्ष क¢ चूर्ण क¨ शहद में मिलाकर दो महीने तक भ¨जन क¢ बाद नियमित रूप से सेवन करें, शरीर की ऊर्जा बनी रहेगी। Û मिर्गी और अपस्मार की प्रारंभिक स्थिति में 1 ग्राम रुद्राक्ष क¢ चूर्ण क¨ 2 ग्राम सरस्वती क¢ साथ मिलाकर 10-15 दिन¨ं तक दिन में 2 बार सेवन करें, लाभ होगा। इस दौरान मछली, मांस, अंडे, अचार, अमचूर आदि न खाएं। Û छह मुखी रुद्राक्ष को जल के साथ घिसकर उसका लेप माथे पर नियमित रूप से लगाएं, मूच्र्छा नहीं आएगी। Û रुद्राक्ष चूर्ण की पिट्ठी में नींबू का रस अ©र चंदन का चूर्ण मिलाकर चेहरे पर कुछ दिन¨ं तक नियमित रूप से लेप करें, काले धब्बे दूर ह¨ जाएंगे। Û 2 ग्राम शुद्ध रुद्राक्ष का चूर्ण और आधा ग्राम मूंगे की भस्म क¨ शहद क¢ साथ मिलाकर जीभ पर लेप करें। यह क्रिया 21 दिनों तक नियमित रूप से करते रहें, जीभ की लड़खड़ाहट, तुतलाहट, हकलाहट, जलन आदि से मुक्ति मिलेगी। ध्यान रहे, यह लेप करने क¢ बाद तीस मिनट तक कुछ भी ग्रहण नहीं करें। Û रुद्राक्ष के 10-15 दानों क¨ तिल क¢ 200 मिली ग्राम तेल में आधे घंटे तक उबालें। फिर नीचे उतारकर ठंडा कर लें अ©र छान लें। अब निमोनियाग्रस्त व्यक्ति की छाती पर इस तेल की मालिश करें, उसे राहत मिलेगी। इसकी मालिश से छाती क¢ दर्द से भी बचाव होता है। Û घुटन¨ं तथा शरीर के किसी अन्य ज¨ड़ पर सूजन आ गई हो, तो रुद्राक्ष और सीताफल क¢ पत्त¨ं क¢ चूर्ण समान रूप से मिलाकर सरस¨ं क¢ तेल क¢ साथ मालिष करें, सूजन कम होगी। Û स्वर्णमाक्षिक और दो मुखी रुद्राक्ष की भस्मों क¨ बराबर की मात्रा में मिला लें और दूध, दही या मलाई के साथ 1 रत्ती सुबह और 1 रत्ती षाम नियमित रूप से लें, रक्तचाप सामान्य रहेगा। Û एक ग्राम रुद्राक्ष तथा एक ग्राम स्वर्ण भस्मों क¨ मिलाकर 21 दिन¨ं तक दिन में द¨ बार नियमित रूप से गाय के दूध के मट्ठे या मक्खन क¢ साथ सेवन करें, अनिद्रा दूर होगी। इस दौरान उष्ण पदार्थों से परहेज करें। शीघ्र लाभ हेतु दवा के सेवन के साथ-साथ रोज शाम को टहलें। सुंदरता में निखार की कमी को दूर करने हेतु Û रुद्राक्ष, दालचीनी, लाल चंदन, कुल्थी अ©र कूठ समान भाग में लेकर पानी मिलाकर उबटन बनाएं तथा उसका शरीर पर लेप करें। लेप सूखने क¢ पष्चात स्वच्छ जल से इसे ध¨ दें या स्नान करें। साबुन, षैंपू आदि का प्रय¨ग नहीं करें। ऐसा नियमित रूप से करते रहें, कुछ ही दिन¨ं में शरीर से दुर्गंधयुक्त पसीने का निकलना बंद हो जाएगा अ©र स©ंदर्य में निखार आएगा। Û रुद्राक्ष से चार गुना बादाम की गिरी और मसूर की दाल इतने ही गुलाब जल क¢ साथ पीसकर चेहरे पर लेप करें और लेप के सूख जाने पर ध¨ डालें। यह क्रिया नियमित रूप से करते रहें, चेहरा कांतिमय अ©र आभायुक्त ह¨ जाएगा। Û रुद्राक्ष, काली मिर्च और वंषल¨चन समान मात्रा में लेकर लेप बना लें और उसका नियमित रूप से चेहरे पर लेप करें, कुछ ही दिनों में कील-मुहांसे मिट जाएंगे। Û गुलाब जल में आठ मुखी रुद्राक्ष व बादाम की गिरी का चूर्ण मिलाकर चेहरे पर लगाएं और एक घंटे बाद धोएं। यह क्रिया नियमित रूप से करते रहें, सुंदरता में वृद्धि होगी। गुप्त र¨गों से मुक्ति हेतु Û रुद्राक्ष की मात्रा का दोगुना हर्रे, रस©त अ©र सिरस की छाल चार गुना की मात्रा में लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बनाएं और कपडे़ से छान कर शहद मिलाकर घाव¨ं पर लगाएं। यह लेप नियमित रूप से करते रहें, उपदंष शीघ्र दूर होगा। Û तीन मुखी रुद्राक्ष क¨ पत्थर पर घिसकर नाभि पर लगाने से धातु र¨ग से बचाव ह¨ता है । Û 14 मुखी रुद्राक्ष का जल के साथ लेप बनाकर प्रतिदिन रात्रि को मस्तक पर लगाएं, कामशक्ति का विकास होगा। अन्य बीमारियों से मुक्ति हेतु रुद्राक्ष का उपयोग Û रुद्राक्ष को प्याज के रस के साथ घिसकर सिर के गंजे भाग पर लगाएं, गंजापन दूर होगा। Û दस ग्राम दूब के रस के साथ एक ग्राम रुद्राक्ष की भस्म सुबह-शाम नियमित रूप से लें, बवासीर से राहत मिलेगी। Û रुद्राक्ष को नीम की छाल के साथ घिसकर शरीर के कुष्ठग्रस्त भाग पर लेप करें, कुष्ठ का बढ़ना रुक जाएगा। Û रुद्राक्ष के दाने को बकरी के दूध में घिसकर सेवन करें तथा शरीर के प्रभावित भाग की सिकाई करें। यह क्रिया नियमित रूप से करें, गठिये का दर्द कम होगा। Û तुलसी के रस के साथ रुद्राक्ष की भस्म दो माह तक नियमित रूप से लें, शरीर में शर्करा की मात्रा सामान्य हो जाएगी और मधुमेह से मुक्ति मिलेगी। Û चार मुखी रुद्राक्ष को उबालकर उस जल सेवन करें। यह क्रिया नियमित रूप से करें, पेशाब की जलन से मुक्ति मिलेगी। Û चैदह मुखी रुद्राक्ष को घिसकर सफेद चंदन के साथ माथे पर लगाएं, अवसाद से मुक्ति मिलेगी। Û रुद्राक्ष के कुछ दानों को पानी से भरे तांबे के लोटे में रात भर छोड़ दें। सुबह उस जल का सेवन करें। यह क्रिया नियमित रूप से करें, थाइराॅइड से रक्षा होगी। शीघ्र लाभ हेतु रुद्राक्ष के 12 दानों की माला गले पर बांधें। Û रुद्राक्ष चूर्ण 2 ग्राम, सौंफ 4 ग्राम तथा मिश्री 8 ग्राम पानी से भरे तांबे के लोटे में भिगोकर पानी में ही मसल लें और उसका सेवन करें, एसिडिटी दूर होगी। Û रुद्राक्ष की भस्म 1 ग्राम, वंश लोचन 1 ग्राम और भंृग शृंग की भस्म 1 ग्राम शहद में मिलाकर 6 माह तक सेवन करें, तपेदिक से मुक्ति मिलेगी। Û बार-बार हिचकी आती हो, तो एक-एक ग्राम रुद्राक्ष व मोर पंख की भस्म शहद के साथ सेवन करें। Û एक भाग रुद्राक्ष तथा चार भाग शुद्ध घी में भुने आंवले के चूर्ण को कांजी के साथ पीसकर नियमित रूप से मस्तक पर लेप करें, नकसीर से छुटकारा मिलेगा। Û शूद्र वर्ण का रुद्राक्ष स्त्री की कमर में बांध दें, गर्भ की रक्षा होगी। Û पांच मुखी रुद्राक्ष को तुलसी के रस में घिसकर उसमें नींबू का रस मिलाकर चेहरे पर क्रीम की तरह लगाएं। लेप नियमित रूप से करें, कुछ ही दिनों में त्वचा में निखार आएगा और दाग-धब्बे मिट जाएंगे। Û एक भाग रुद्राक्ष और चार भाग तिल के फूलों का चूर्ण बनाकर छान लें। फिर शहद के साथ मिलाकर बालों की जड़ों में लगाएं और एक घंटे बाद धो लें। यह क्रिया नियमित रूप से करते रहें, बाल शीघ्र ही बढ़ने लगेंगे। रुद्राक्ष के काढ़े से र¨ग निवारण रुद्राक्ष का काढ़ा भी बनता है जो अनेक र¨ग¨ं का शमन करता है। यह शरीर को स्वस्थ रखता है और खून साफ करता है। इसके सेवन से चुस्ती और फुर्ती बनी रहती है। रुद्राक्ष का काढ़ा बनाने की विधि और उसके सेवन का विवरण यहां प्रस्तुत है। Û रुद्राक्ष, किशमिश, हर्रे अ©र अडू़से की जड़ की छाल समान मात्रा में लेकर बत्तीस गुना जल में मिलाकर ख©लाएं और 1/8 अंश रह जाने पर उतार लें। फिर 2 से 3 ग्राम की मात्रा में शहद मिलाकर प्रातः काल नियमित रूप से सेवन करें, सांस की बीमारी, खांसी अ©र पित्त जन्य र¨ग दूर होंगे। Û रुद्राक्ष, शुष्ठी, कुटकी, गिल¨य, दारुहल्दी, पुनर्नवा और नीम की छाल क¨ समान मात्रा में लेकर पीस लें अ©र ऊपर वर्णित विधि के अनुसार जल में मिलाकर काढ़ा बनाएं। फिर उतारकर थोड़ी देर के लिए छोड़ दें। जब थोड़ा गुनगुना रह जाए, तो उसका सेवन करें। यह क्रिया नियमित रूप से करते रहें, श्वास, पीलिया, पेट तथा पसलिय¨ं क¢ दर्द से मुक्ति मिलेगी। यह काढ़ा श¨थ को भी दूर करता है। Û रुद्राक्ष, देवदारु, चित्रक, शुष्ठी, गिल¨य, दारुहल्दी, हर्रे और पुनर्नवा का समभाग में ऊपर वर्णित विधि क¢ अनुसार काढ़ा बनाकर सेवन करें, हाथ, पैर, चेहरे, उदर आदि की सूजन दूर होगी।


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