रुद्राक्ष के मुख और प्रकार

रुद्राक्ष के मुख और प्रकार  

रुद्राक्ष के मुख और प्रकार नवीन चितलांगिया अपने अनेकानेक गुणों के कारण रुद्राक्ष मानव जाति के लिए अत्यंत उपयोगी है। रुद्राक्षों में साधारणतया एक से सत्ताइस धारियां होती हैं, जिन्हें मुख कहा जाता है। इन्हीं मुखों के आधार पर उनका वर्गीकरण किया गया है और इन्हीं के अनुरूप उनके फल होते हैं। यहां अलग-अलग मुखों के रुद्राक्षों का विशद विवरण प्रस्तुत है। एक मुखी रुद्राक्ष एकवक्त्रः शिवः साक्षाद्ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ एकमुखी रुद्राक्ष साक्षात् शिव स्वरूप है। यह ब्रह्महत्या के पाप का शमन करता है। यह सर्वसिद्धिदायक एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदाता रुद्राक्ष है। एकमुखी रुद्राक्ष को लक्ष्मीस्वरूप भी कहा गया है। ज्योतिष के दृष्टिकोण से सूर्य इसका शासक है। इसे सूर्य के शुभ फलों की प्राप्ति व अशुभ फलों से मुक्ति हेतु धारण किया जाता है। एकमुखी रुद्राक्ष के मुखयतः दो रूपों में पाया जाता है - गोलाकार और काजू दाना। गोलाकार एक मुखी रुद्राक्ष अत्यंत दुर्लभ है। असम के जंगलों में पाया जाने वाला एकमुखी रुद्राक्ष गोलाकार न होकर कुछ फैला हुआ वलयाकार होता है। मान्यता है कि हिमालय के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों के सघन वनों में पाया जाने वाला एक मुखी श्वेत रुद्राक्ष सर्वोत्तम होता है, जो अत्यंत दुर्लभ है। इसके दर्शन से शिव के साक्षात् दर्शन के समान फल मिलता है। नेपाल में पाया जाने वाला बडे़ आकार का एकमुखी रुद्राक्ष अच्छी जाति का उत्तम होता है। एकमुखी अर्ध चंद्राकार (काजू दाना) रुद्राक्ष यह रुद्राक्ष दक्षिण भारत के रामेश्वरम के घने जंगलों में पाया जाता है। यह भी गोलदाना के समान ही फलदायी होता है। दो मुखी रुद्राक्ष द्विवक्त्रो देवदेवेशो गोवधं नाशयेद्धु्रवम्॥ द्विमुखी रुद्राक्ष देवी (पार्वती) और देवता (शंकर) का स्वरूप है अर्थात अर्धनारीश्वर रूप है। इसे धारण करने से गोवध जैसे पापों मुक्ति, मोक्ष और वैभव की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त शरीर की अनेक व्याधियां दूर होती हैं। ज्योतिष में दोमुखी रुद्राक्ष चंद्र का प्रतिनिधित्व करता है। चंद्र के कारण उत्पन्न रोगों से मुक्ति के लिए भी इसे धारण किया जाता है। यह गुरु-शिष्य, पिता-पुत्र, पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका इत्यादि के संबंधो को प्रगाढ़ करता है। तीन मुखी रुद्राक्ष त्रिवक्त्रस्त्वनलः साक्षात्स्त्रीहत्यां दहति क्षणात्॥ त्रिमुखी रुद्राक्ष साक्षात अनल (अग्नि) देव स्वरूप है। यह स्त्री हत्या जैसे पापों से मुक्ति दिलाता है। इसे ब्रह्मा-विष्णु-महेश का स्वरूप माना गया है। इसका संबंध इच्छा, ज्ञान और क्रिया के शक्तिमय रूप तथा भूमि (पृथ्वी), आकाश और पाताल क्षेत्रों से है। इसका शासक मंगल है। इसे बुद्धि-विकास हेतु तथा रक्तचाप नियंत्रण के साथ-साथ रक्तविकार से मुक्ति हेतु धारण किया जाता है। यह ब्रह्मशक्ति व खुशहाली दिलानेवाला रुद्राक्ष है। चार मुखी रुद्राक्ष चतुर्वक्त्रः स्वयं ब्रह्मा नरहत्यां व्यपोहति॥ चतुर्मुखी रुद्राक्ष ब्रह्मा स्वरूप है। इसे धारण करने से नर-हत्या जैसे जघन्य पापों से मुक्ति मिलती है। यह चारों वेदों का द्योतक एवं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाला तथा अभीष्ट सिद्धिदायक परम गुणकारी रुद्राक्ष है। इसे सभी जातियों के लोग धारण कर सकते हैं। इसका शासक बुध है। इसे धारण करने से जातक के बुद्धि का विकास होता है, स्नायु एवं मानसिक रोगों से मुक्ति मिलती है, मन में सात्विक विचारों का संचार होता है और धर्म के प्रति आस्था होती है। पांच मुखी रुद्राक्ष पंचवक्त्रः स्वयं रुद्रः कालाग्निर्नाम नामतः अभक्ष्यभक्षणोद् भूतैरगम्यागमनोद्भवैः मुच्यते सर्वपापैस्तु पंचवक्त्रस्य धारणात्॥ पंचमुखी रुद्राक्ष कालाग्नि रुद्र का स्वरूप है। यह अभक्ष्य भक्षण और पर स्त्री गमन जैसे पापों से मुक्ति दिलाता है। यह पंच ब्रह्मा का स्वरूप और पंचतत्वों का प्रतीक भी है। यह दुःख-दारिद्र्यनाशक, स्वास्थ्यवर्धक, आयुवर्धक, सर्वकल्याणकारी, पुण्यदायक एवं अभीष्ट सिद्धिदायक है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से यह बृहस्पति का प्रतिनिधित्व करता है। इसे जंघा व लीवर की बीमारियों और बृहस्पति के कारण उत्पन्न कष्टों व अरिष्टों से मुक्ति हेतु धारण किया जाता है। छह मुखी रुद्राक्ष षड्वक्त्रः कार्तिकेयस्तु स ध्रार्यो दक्षिण करे, ब्रह्महत्याभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः यह शिवकुमार भगवान कार्तिकेय है का स्वरूप है। इसे शत्रुंजय रुद्राक्ष भी कहा जाता है, क्योंकि यह शत्रुओं का शमन करता है। इसे दायीं भुजा पर धारण करने से ब्रह्महत्या जैसे पापों से मुक्ति मिलती है, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर पर नियंत्रण होता है और जातक के अंदर आत्मशक्ति, संकल्पशक्ति, ज्ञानशक्ति आदि जाग्रत होती हैं। इसे ऋद्धि-सिद्धि प्रदायक षडानन भगवान गणेश का स्वरूप भी माना जाता है। शुक्र इसका शासक है। इसे सुखमय दाम्पत्य, प्रेम और काम-शक्ति में वृद्धि तथा शुक्र जनित रोगों से मुक्ति व बचाव हेतु धारण किया जाता है। इसे धारण करने से व्यक्ति वाक्पटु होता है और चर्म रोग, हृदय रोग तथा नेत्र रोग दूर होते हैं। सात मुखी रुद्राक्ष सप्तवक्त्रो महाभागो ह्यनंगो नाम नामतः, तद्वारणन्मुच्यते हि स्वर्णस्तेयादि पातकै :॥ सप्तमुखी रुद्राक्ष कामदेव स्वरूप है, महाभाग है। इसे धारण करने से स्वर्ण की चोरी, गोवधादि पापों से मुक्ति मिलती है। यह सप्तऋषियों का प्रतीक और सात माताओं का मिश्रित स्वरूप है। यह व्यक्ति को अंहकार से बचाता है। इसका शासक शनि है। इसे धारण करने से शनि जनित अरिष्टों का शमन होता है, जातक को आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति होती है, भूमि का सुख मिलता है, धनागमन एवं व्यापार में वृद्धि होती है। सातमुखी रुद्राक्ष वात रोगों एवं मृत्यु तुल्य कष्टों से छुटकारा देता है। आठ मुखी रुद्राक्ष अष्टवक्त्रो महासेनः साक्षाद्देवो विनायकः, अन्नकूटं तूलकूटं स्वर्णकूटं तथैव च । दुष्टान्वस्त्रियं वाथ संस्पृशश्च गुरूस्त्रियम् , एवमादीन पापानि हंति सर्वाणि धारणात् ॥ विघ्नास्तस्य प्रणश्यंति याति चांते परम् पदम्, भवंस्येते गुणा सर्वे हृष्टवक्त्रस्य धारणात । अष्टमुखी रुद्राक्ष साक्षात विनायक (गणेश) स्वरूप है। इसके धारण से विभिन्न पापों से मुक्ति मिलती है तथा अंत में परमपद प्राप्त होता है। आठमुखी रुद्राक्ष को बटुक भैरव का रूप भी माना गया है। इसे धारण करने वाले व्यक्ति की रक्षा आठ देवियां करती हैं। उसे समाज में मान-सम्मान प्राप्त होता है और उसका जीवन बाधामुक्त रहता है। इसे भगवान गणेश की कृपा की प्राप्ति और असाध्य रोगों से मुक्ति हेतु तथा राहु के अरिष्टों के शमनार्थ धारण किया जाता है। नौ मुखी रुद्राक्ष नववक्त्रो भैरवस्तु धारयेद्वामबाहुके, भुक्तिमुक्ति प्रदः प्रोक्तो मम् तुल्यबलो भवेत् भू्रणहत्यासकस्त्राणि ब्रह्महत्या शतानि च, सद्यः प्रलयमायांति नववक्त्रस्य धारणात् नवमुखी रुद्राक्ष का नाम भैरव है। इसे वाम भुजा पर धारण करने से व्यक्ति का बल भैरव के बल के समान हो जाता है। यह रुद्राक्ष भुक्ति, मुक्ति व सभी निधियों का प्रदाता है। यह रुद्राक्ष नवशक्ति से संपन्न भगवती दुर्गा का स्वरूप है। इसे धर्मराज (यम) का रूप भी माना गया है। यह नवग्रहों, नवनाथों (पशुपति, मुक्तिनाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ, जगन्नाथ, सोमनाथ, वैद्यनाथ, पारसनाथ और द्वारकानाथ) और नवधा भक्ति का प्रतीक है। इसे धारण करने से व्यक्ति के भीतर वीरता, धीरता, साहस, पराक्रम, सहनशीलता, दानशीलता आदि में वृद्धि होती है। इसे आकस्मिक दुर्घटनाओं से बचाव तथा अशुभ केतु से संबंधित दोषों के शमन हेतु धारण किया जाता है । दस मुखी रुद्राक्ष दशवक्त्रस्तु देवेशः साक्षाद्देवो जनार्दना, ग्रहश्चैत पिशाचाश्च बेताला ब्रह्मराक्षसाः। पन्नगाश्चोपशाम्यंति दशंवक्त्रस्य धारणात दस मुखी रुद्राक्ष जनार्दन अर्थात भगवान विष्णु का स्वरूप है। इसे धारण करने से सभी ग्रह अनुकूल रहते हैं और व्यक्ति को पिशाच, बेताल, ब्रह्मराक्षस, पन्नगादि का भय नहीं होता। इसे भगवान नारायण के दशावतार एवं दसों दिशाओं का प्रतीक माना गया है। मान्यता है कि इसमें भगवान विष्णु के दसों अवतारों की शक्तियां सन्निहित रहती हैं और इसे पहनने से दसों देवता प्रसन्न होकर धारक को दिव्यशक्ति प्रदान करते हैं। यह सुख समृद्धिदायक है, जिसे धारण करने से व्यक्ति का जीवन बाधामुक्त रहता है और उसे सभी सुखों की प्राप्ति होती है। इसे ग्रहों के दुष्प्रभावों से रक्षा के लिए भी धारण किया जाता है। ग्यारहमुखी रुद्राक्ष वक्त्रैकादश रुद्राक्षो रुद्रैकादशकं स्मृतम्, शिखायां धारयेद्यो वै तस्य पुण्यफलमं शृणु। अश्वमेध सहस्रस्य वाजपेयशतस्य च, गवां शतसहस्रस्य सम्यग्दत्तस्य यत्फलम् ॥ तत्फलं लभते शीघ्रं वक्त्रेकादशधारणात्॥ एकादश मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात रुद्र है। इसे शिखा पर धारण करने से एक हजार अश्वमेध यज्ञ, एक सौ वाजपेयी यज्ञ और सौ हजार गोदान के पुण्य के समान फल की शीघ्र प्राप्ति होती है। यह 11 रुद्रों एवं भगवान शंकर के ग्यारहवें अवतार संकटमोचन महावीर बजरंगबली का प्रतीक है। कुछ विद्वान इन्द्र को इसका प्रधान देवता मानते हैं। मान्यता है कि इसके प्रभाव से व्यक्ति को एकादशी व्रत के समान एवं चन्द्र ग्रहण के समय किए गए दान के बराबर पुण्यलाभ होता है। इसे धारण करने वाले व्यक्ति को सांसारिक ऐश्वर्य तथा संतान सुख की प्राप्ति होती है। बारहमुखी रुद्राक्ष द्वादशास्यस्य रुद्राक्षास्यैव कर्णे तु धारणातु, आदि त्यास्तोषिता नित्यं द्वादशास्ये व्यवस्थिताः। गोमेधे चाश्वमेघे च यत्फलं तदवाप्नुयात्, शृंगिणा शास्त्रिणां चव व्याघ्रादिनां भं नहि। न च व्याधिभयंतस्य नैव चाधि प्रकीर्तितः, न च किंचित्भयं तस्य न व्याधि प्रवर्तते। न कुतश्चितभयं तस्य सुखी चैवेश्वरी भवेत्, हस्त्यस्वसृगमार्जारसर्पमूषकदर्दुरान्। खरांश्चश्य श्रृगालांश्च हत्वा बहुविधानपि, मुच्यते नात्र सन्देहो वक्त्रद्वादश धारणात्। द्वादशमुखी रुद्राक्ष को कान में धारण करने से सूर्यादि बारह आदित्य देव प्रसन्न होते हैं। धारण करने वाले को गोमेध और अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। उसे सींग वाले पशुओं, शस्त्रधारियों, आधि-व्याधि, व्याघ्र आदि का भय नहीं होता। चोर और अग्नि का भय नहीं सताता। उसे जीव हत्या के पाप से मुक्ति मिल जाती है। 32 द्वादशमुखी रुद्राक्षों की माला धारण करने से गोवध, नरहत्या एवं चोरी का पाप मिट जाता है। सभी बाधाओं को दूर करने वाले इस रुद्राक्ष को आदित्य रुद्राक्ष के नाम से भी जाना जाता है। ज्योतिष के अनुसार यह रुद्राक्ष सूर्य जनित रोगों को दूर करने के लिए धारण किया जाता है। तेरहमुखी रुद्राक्ष वक्त्रत्रयोदशो वत्स रुद्राक्षो यदि लभ्यते, कार्तिकेय समोज्ञेयः सर्वकामार्थ सिद्धिदः। रसो रसायन चैव तस्य सर्व प्रसिद्धयति, तस्यैव सर्वभोग्यानि नात्र कार्या विचारणा। मातरं पितरं चैव भ्रातरं वा निहंतियः, मुच्यते सर्व पापेभ्यो धारणातस्य षण्मुख। त्रयोदशास्यो रुद्राक्षो साक्षाद्देव पुरंदर॥ त्रयोदशमुखी रुद्राक्ष साक्षात इन्द्र का स्वरूप है। यह अर्थ प्रदाता और कामना पूर्ति करने वाला रुद्राक्ष है। इसे धारण करने से व्यक्ति सभी प्रकार की धातुओं एवं रसायन की सिद्धि का ज्ञाता हो जाता है। उसे सभी भोगों की प्राप्ति होती है। कुछ विद्वानों ने कामदेव को भी इसका देवता माना है। ज्योतिष के अनुसार इसका प्रभाव शुक्र ग्रह के समान होता है। यह सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाला, निःसंतान को संतति प्रदान करने वाला, वशीकरण के गुण से युक्त सुख, शांति, सफलता एवं आर्थिक समृद्धि दायक रुद्राक्ष है। चौदहमुखी रुद्राक्ष चतुर्दशास्यो रुद्राक्षो यदि लभ्येत पुत्रक, धारयेत्स ततं मुध्नि तस्य पिंड शिवस्यतु। चतुर्दशास्यो रुद्राक्षो साक्षाद्देवो हनूमतः। चतुर्दशमुखी रुद्राक्ष भगवान हनुमान का स्वरूप है। इसे शिखा में धारण करने से व्यक्ति परम पद को प्राप्त होता है। यह चौदह विद्याओं, चौदह लोकों, चौदह मनुओं तथा चौदह इन्द्रों का स्वरूप भी है। यह हनुमत रुद्राक्ष के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह सभी सिद्धियों का दाता व्याधियों से मुक्ति दिलाने वाला आरोग्यदायक रुद्राक्ष है। इसे धारण करने से शनि और मंगल के अशुभ प्रभाव से मुक्ति मिलती है। पंद्रहमुखी रुद्राक्ष पंद्रहमुखी रुद्राक्ष भगवान पशुपतिनाथ का स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से पूर्व जन्म के पापों का शमन होता है तथा वर्तमान जीवन में जाने-अनजाने में किए गए सभी पापों से मुक्ति मिलती है। इसे धारण करने से जातक की आर्थिक एवं आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह सुख-समृद्धि, मान-सम्मान एवं शांति प्रदान करता है। किसी गर्भवती के इस रुद्राक्ष को धारण करने से गर्भपात का भय नहीं रहता और प्रसव-पीड़ा में कमी होती है। सोलह मुखी रुद्राक्ष सोलह मुखी रुद्राक्ष को हरि-शंकर अर्थात विष्णु और शिव का रूप माना गया है। पक्षाघात (लकवा), सूजन, कंठादि रोग में इसे धारण करना लाभदायक होता है। वहीं व्यक्ति को अग्नि, चोरी, डकैती आदि का भय नहीं सताता। सत्रह मुखी रुद्राक्ष सत्रहमुखी रुद्राक्ष को सीता-राम का स्वरूप कहा गया है। कई विद्वान विश्वकर्मा को इसका प्रधान देवता मानते हैं। इसे धारण करने से व्यक्ति को भूमि, मकान, वाहन सुख, धन, समृद्धि, सफलता आदि की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इसे धारण करने से शरीर में कुंडलिनी-शक्ति सक्रिय होती है। इसे धारण करने से याददाश्त की कमजोरी, आलस्य, कार्य करने के प्रति अनिच्छा आदि से मुक्ति मिलती है। अठारह मुखी रुद्राक्ष अठारह मुखी रुद्राक्ष को भैरव का रूप माना गया है। कुछ विद्वानों के अनुसार यह माता पृथ्वी का स्वरूप भी है। इसे धारण करने से विभिन्न विपदाओं (यथा आकस्मिक दुर्घटना आदि) से रक्षा होती है। वहीं व्यक्ति को अकाल मृत्यु का भय नहीं सताता। इसे धारण करने से व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ समाज में मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। इसे किसी गर्भवती स्त्री के धारण करने से गर्भ में पल रहे बच्चे की रक्षा होती है। उन्नीस मुखी रुद्राक्ष उन्नीस मुखी रुद्राक्ष को भगवान नारायण का स्वरूप कहा गया है। यह एक सुख समृद्धिदायक रुद्राक्ष है, जिसे धारण करने से व्यक्ति में छिपी बुराई का शमन होता है और वह सत्य एवं न्याय के पथ पर अग्रसर होता है। उसे रक्त संबंधी रोग नहीं होते। बीस मुखी रुद्राक्ष बीस मुखी रुद्राक्ष को जनार्दन स्वरूप कहा गया है। इसे धारण करने से व्यक्ति को भूत, पिशाच, राक्षस, सर्प आदि का भय नहीं सताता। उसकी क्रूर ग्रहों के अशुभ प्रभाव से रक्षा होती है। वह तंत्र विद्या की साधना से विशेष् इक्कीस मुखी रुद्राक्ष इक्कीस मुखी रुद्राक्ष शिव का स्वरूप है। इसमें सभी देवताओं का वास माना गया है। इसे धारण करने से व्यक्ति को ब्रह्महत्या जैसे पापों से भी मुक्ति मिल जाती है। वह यशस्वी होता है। उसकी सेहत अच्छी रहती है। सनातन धर्म के प्रति उसकी आस्था होती है। यह रुद्राक्ष व्यक्ति के भीतर आज्ञा चक्र कुंडलिनी को जाग्रत करता है। गौरी-शंकर रुद्राक्ष प्राकृतिक रूप से आपस में जुडे़ हुए दो रुद्राक्षों को गौरी-शंकर रुद्राक्ष कहा जाता है। यह शिव-पार्वती के तुल्य अपार शक्ति वाला शिव-शक्ति का स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से शिव और शक्ति अर्थात माता पार्वती की कृपा समान रूप से प्राप्त होती है। यह सात्विक प्रकृति रुद्राक्ष है जिसे सर्वसिद्धिदायक एवं मोक्षप्रदाता माना जाता है। इसे घर या दुकान में पूजा अथवा धन स्थान पर स्थापित करने से घर में देवी लक्ष्मी का स्थायी वास होता है। यह परिवार में शांति का प्रतीक है। इसे धारण करने से पति-पत्नी के आपसी प्रेम में वृद्धि होती है और उनका वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। यह एक ओर स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रदाता है तो दूसरी ओर प्रतियोगिता परीक्षाओं में सफलता प्रदान करता है। यह कामजन्य समस्याओं को भी दूर करता है। संक्षेप में यह एक मुखी रुद्राक्ष की भांति धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाला रुद्राक्ष है। गणेश रुद्राक्ष जिस रुद्राक्ष पर गणेश जी के सूंड के समान अलग से एक धारी उठी हुई दिखाई दे, उसे गणेश रुद्राक्ष कहा जाता है। इसे धारण करने से भगवान गणेश की कृपा के साथ-साथ व्यक्ति को ऋद्धि-सिद्धि, कार्यकुशलता, मान-सम्मान आदि की प्राप्ति होती है। यह व्यवसाय की उन्नति में भी सहायक होता है। भगवान गणेश का स्वरूप होने के कारण यह विद्यार्थी वर्ग के लिए विशेष लाभदायक है, जसे धारण करने से विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति एवं ज्ञान में वृद्धि होती है, उनका बौद्धिक विकास होता है और परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त होते हैं। गौरीपाठ (त्रिजुगी/त्रिजुटी) रुद्राक्ष जिस रुद्राक्ष में प्राकृतिक रूप से तीन दाने एक-दूसरे से आपस में जुडे़ होते हैं, उसे गौरीपाठ, त्रिजुगी अथवा त्रिजुटी रुद्राक्ष कहते हैं। यह रुद्राक्ष ब्रह्मा-विष्णु-महेश तीनों का साक्षात एकल स्वरूप है। यह एक अत्यंत ही दुर्लभ रुद्राक्ष है, जिसे धारण करने से ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की कृपा समान रूप से प्राप्त होती है। गर्भगौरी रुद्राक्ष इस रुद्राक्ष को पार्वती और गणेश का स्वरूप माना गया है। जिस स्त्री को योग्य संतान की कामना हो, उसे यह रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए। इसे धारण करने से स्त्री में मातृत्व और ममता की वृद्धि होती है। सर्पमुखी (नागफनी) रुद्राक्ष गणेश रुद्राक्ष की तरह इस रुद्राक्ष पर सर्प के फण के समान धारी होती है। इसे सर्पदोषों (विशेषकर कालसर्पदोष) के निवारणार्थ धारण किया जाता है। इसे धारण करने से व्यक्ति को सर्पादि विषैले जीवों का भय नहीं सताता।


रुद्राक्ष विशेषांक  मई 2010

रुद्राक्ष की उत्पत्ति व प्राप्ती स्थल, धारण नियम व विधि, रुद्राक्ष के प्रकार, औषधीय उपयोग, ज्योतिषीय महत्व और उपाय के रूप में इसके प्रयोग आदि विषयों पर ज्ञानवर्धन हेतु आज ही पढ़े फ्यूचर समाचार का रुद्राक्ष विशेषांक। ज्योतिष प्रेमियों के लिए विचार गोष्ठी स्तंभ के अंतर्गत वैवाहिक जीवन दोष एवं निवारण विषय पर की गई ज्योतिषीय परिचर्चा अत्यंत उपयोगी है।

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