हर्निया अंग्र्रेजी भाषा का शब्द है॥ हिंदी भाषा में इसे आंत उतरना, या शोथ कहा जाता है। 'हर्निया' शब्द का अर्थ है उदर की दीवार के कोटेटर (केविटी) से आंत का बाहर निकलना। आंत के अतिरिक्त शरीर के अन्य अंगों में भी ऐसा घटित हो सकता है क्योंकि उदर गह्वर के अंदर स्थित अंग का कुुछ अंश विशेष अवस्था में बाहर निकल सकता है।

चिकित्सा ग्रंथों में तरह-तरह से आंत उतरने के बारे में लिखा गया है, जिनसे लोग अक्सर ग्रस्त हो जाते हैं। उदर गह्वर में अमाशय, आंत आदि विभिन्न अंग होते हैं और जो भोजन नली अमाशय से गुर्दें तक जाती है, वह कई स्थानों से जुड़ी हुई होती है तथा उसे उदर के ही पर्दे का सहारा रहता है।

आंत जब उतरती है, तो जब तक वह अपने स्थान पर वापिस नहीं पहुंच जाती, तब तक अस्वाभाविकता के कारण कष्ट और पीड़ा का होना स्वाभाविक है। इससे तकलीफ बहुत बढ़ जाती है, खास कर उस वक्त, जब उतरी हुई आंत किसी तरह भी अपने स्थान पर वापिस नहीं आ जाती, जिससे रोगी की मृत्यु हो सकती है

हर्निया अपने आपमें रोग नहीं हैं। वह मात्र उदर की दीवार की निर्बलता है, जिसके कारण स्वस्थ एवं नीरोग आंत उदर की दीवार की कमजोर मांसपेशिया में से मार्ग पाने पर, नीचे खिसक आती है। यदि उचित समय पर उचित उपाय कर के उदर की दीवार की उन कमजोर मांसपेशियों को सशक्त कर देने में देरी न हो, तो आंत उतरना जानलेवा नहीं होता।

हर्निया कभी भी, किसी को भी हो सकता है। छोटे बच्चों से ले कर वृद्ध लोगों तक को ऐसा हो सकता है। शरीर में हर्निया का सबसे प्रमुख स्थान उदर है और इसके अतिरिक्त सामान्यतः बनने वाली हर्निया इस प्रकार है :

वंक्षण हर्निया (इंग्यूनल हर्निया) :

इस प्रकार की हर्निया साधारणतः दो कारणों से होती है : एक तो उदर की दीवार की मांसपेशियों की दुर्बलता से, या बार-बार प्रसव प्रक्रिया से गुजरने, किसी चोट आदि के कारण और शल्य चिकित्सा से उदर के अंदर दवाब का एकदम अत्यधिक बढ़ जाने से, जैसे पुरानी खांसी, क्षय, दमा आदि, जोर से खांसते रहने, मल त्याग में अधिक जोर लगाने आदि से आंत उदर दीवार के कोटर से सरक कर वंक्षणी नलिका में आ जाती है। इस प्रकार का हर्निया प्रायः बड़ी आयु वालों को होता है।

नाभि हर्निया (अंबिलिक हर्निया) :

नाभि हर्निया तीन प्रकार के होते हैं :

1. शैशव नाभि हर्निया :

इस प्रकार की हर्निया में शिशु के खांसने, या जोर लगाने पर नाभि में से एक थैली सी निकल आती है। इसका प्रमुख लक्षण यह है कि शिशु की नाभि स्पष्ट रूप से उभरी होती है।

2. जन्मजात नाभि बाह्य हर्निया :

यह शिशु में जन्म से ही होती है। समय पर इस हर्निया की शल्यक्रिया न होने पर कोश के फटने का डर रहता है, जो घातक सिद्ध होता है।

3. वयस्कों में परनाभि हर्निया :

इस किस्म की हर्निया प्रायः अधिक आयु की मोटी स्त्रियों में उनकी नाभि के ऊपर एक छोटी थैली के रूप में शुरू होती है। यह हर्निया उन स्त्रियों में भी अधिक होती है, जो कई बार गर्भ धारण और प्रसव प्रक्रिया से गुज़री हैं। उदर की पेटी या शल्य चिकित्सा द्वारा इस हर्निया के कष्ट से छुटकारा मिल पाता है।

और्वी हर्निया :

यह स्त्रियों और पुरुषों में समान रूप से ही होती है। किंतु पुरुषों में यह, वंक्षण हर्निया की अपेक्षा, काफी कम ही होती है। यह हर्निया जोर से खांसने, या जोर लगाने पर और्वी नलिका पर एक उभार के रूप में प्रकट हो जाती है। इसका सरल उपाय शल्य चिकित्सा है।

हायेटस हर्निया :

यह हर्निया अधिकतर ग्रास प्रणाली में छिद्र से होती है, जिसका कारण छिद्र का बड़ा आकार होना है। यह हर्निया मध्य आयु के व्यक्तियों में, विशेष कर स्त्रियों में, अधिक होती है। इसके लक्षण प्रायः अनिश्चित तथा अन्य अंगों से संबंधित प्रतीत होते हैं। लक्षणहीन हायेटस हर्निया में चिकित्सा की विशेष आवश्यकता नहीं होती।

आभ्यंतर हर्निया :

यह हर्निया बाह्य रूप में प्रकट नहीं होती, बल्कि अंदर ही अप्रत्यक्ष रूप में पैदा होती है और रोगी के जीवन के लिए भारी जटिलताएं पैदा करती है। इसके लक्षण कभी-कभी आंत्रावरोध के रूप में भी प्रकट होते हैं, जिसका शल्य चिकित्सा से ही उपचार हो पाता है।

हर्निया से बचाव और उपचार :

हर्निया का एक मात्र सफल उपचार शल्यचिकित्सा ही है। परंतु यदि हर्निया का आकार छोटा है और उससे होने वाले कष्ट सहनीय हैं, तो आंत की पेटी बांधने और भोजन संबंधी सावधानियां रखने तथा कुछ व्यायाम आदि से आराम आ जाता है। आंत्र की पेटी हर्निया की वृद्धि ओर वेदना को रोकने का एक यांत्रिक साधन है। इसे, जहां तक संभव हो सके, हर समय लगाए रखना चाहिए। केवल सोते समय लेटने के पश्चात उतार लें। हर्निया के रोगी को गैस, कब्ज की शिकायत न हो, इसकी सावधानी रखनी चाहिए और मल त्याग के समय वे अधिक जोर न लगाएं। जोर से खांसना, वजन उठाना, तेजी से दौड़ना आदि भी वर्जित हैं, रोगी की स्थिति को मद्देनजर रखते हुए आंशिक उपवास कराएं, या 5-7 दिन तक रोगी को रसाहार, या फलाहार देना चाहिए। बाद में रोगी को धीरे-धीरे ठोस आहार पर लाएं और सलाद, उबली सब्जियां, फल आदि, मौसमानुसार, सेवन कराएं।

ज्योतिषीय कारण :

ज्योतिष के अनुसार काल पुरुष की कुंडली में आंत का संबंध षष्ठ भाव और कन्या राशि से है। कन्या राशि का स्वामी बुध होता है और षष्ठ भाव का कारक ग्रह मंगल होता है। इसलिए षष्ठ भाव, षष्ठेश, षष्ठकारक मंगल, बुध, लग्न-लग्नेश जब दुष्प्रभावों में रहते हैं, तो आंतों से संबंधित रोग होते हैं, जिनमें हर्निया रोग भी शामिल है। शरीर में हर्निया उदर के ऊपरी भाग से ले कर उदर के निचले भाग तक कहीं भी हो सकती है। काल पुरुष की कुंडली में पंचम और सप्तम भाव भी शामिल हैं। इसलिए इन भावों के स्वामी और कारक ग्रहों का निर्बल होना उदर में उस स्थान को दर्शाते हैं, जिस भाग में हर्निया होती है। हर्निया रोग आंत के उदर की दीवार के कोटर से बाहर निकलने से होता है, जिसे आंत का उतरना भी कहते हैं। उदर की दीवार की निर्बलता के कारण आंत अपने स्थान (कोटर) से बाहर निकल कर नीचे की तरफ उतर जाती है। ऐसा उपर्युक्त भाव, राशि एवं ग्रहों के दुष्प्रभाव और निर्बलता के कारण होता है। जब इन ग्रहों की दशा-अंर्तदशा रहती है और संबंधित ग्रह का गोचर विपरीत रहता है, तो हर्निया, अर्थात 'आंत का उतरना' रोग होता है।

विभिन्न लग्नों में हर्निया रोग के ज्योतिषीय कारण :

मेष लग्न : मंगल षष्ठ भाव में शनि से दृष्ट या युक्त हो, बुध, शुक्र सप्त भाव में हों और राहु से दृष्ट हों, सूर्य अष्टम भाव में रहे, तो हर्निया रोग नाभि के निचले भाग में होता है।

वृष लग्न : शुक्र अष्टम भाव में हो, गुरु षष्ठ भाव में केतु से युक्त हो, मंगल द्वादश भाव में हो, बुध सूर्य से अस्त हो कर पंचम भाव में हो, तो हर्निया के कारण उदर की शल्यचिकित्सा होती है।

मिथुन लग्न : बुध अष्टम भाव में केतु से युक्त, या दृष्ट, गुरु षष्ठ भाव में अस्त, सूर्य सप्तम भाव में, मंगल एकादश, द्वादश या लग्न में स्थित हो, तो आंत उतरने का रोग होता है।

कर्क लग्न : बुध लग्न में, सूर्य द्वादश भाव में, चंद्र षष्ठ, या अष्टम भाव में केतु से युक्त या दृष्ट हो, मंगल अष्टम भाव में शनि के प्रभाव में हो, तो आंत उतर कर अंड कोश में घुस जाने से यह रोग होता है।

सिंह लग्न : सूर्य लग्नेश पंचम भाव में हो, बुध षष्ठ भाव में शनि से दृष्ट, या युक्त हो, शुक्र सप्तम भाव में केतु से युक्त हो, मंगल भी सप्तम भाव में शतभिषा नक्षत्र म ें हा,े ता े जातक की नाभि क े कछु नीचे हर्निया हो जाता है।

कन्या लग्न : लग्नेश और षष्ठेश दोनों सप्तम भाव में हों और मंगल एकादश भाव में, गुरु दशम, या षष्ठ भाव में, केतु षष्ठ भाव में हो, तो जातक को नाभि हर्निया होता है। नाभि के पास पेट फूला रहता है, जिसकी बाद में शल्यचिकित्सा करवानी पड़ती है।

तुला लग्न : लग्नेश सप्त भाव, या षष्ठ भाव में हो, मंगल लग्न में हो, गुरु षष्ठ भाव में बुध से युक्त हो, केतु सप्तम भाव (भरणी नक्षत्र) में हो, तो जातक को हर्निया रोग होता है, जिससे जातक की मृत्यु भी हो सकती है।

वृश्चिक लग्न : लग्न का उदय अनुराधा नक्षत्र में हो, मंगल षष्ठ भाव में भरणी नक्षत्र में रहे और गुरु से युक्त हो, बुध लग्न में उदय रहे, शुक्र सूर्य से अस्त रहे, तो कई बार पेट में चोट लगने के कारण जातक के उदर की दीवारों में निर्बलता आ जाती है, जिससे जातक को हर्निया जैसे रोग का शिकार होना पड़ता है।

धनु लग्न : शुक्र सप्तम भाव में राहु या केतु से युक्त, या दृष्ट हो, बुध अष्टम में, शनि षष्ठ भाव में मंगल से युक्त हो, लग्नेश अष्ट भाव में सूर्य से अस्त हो, तो जातक वंक्षण हर्निया होने से तकलीफ पाता है।

मकर लग्न : गुरु लग्न में, बुध, केतु से युक्त षष्ठ भाव में, शनि अष्टम भाव में बाल अवस्था में सूर्य से अस्त हो, मंगल द्वादश भाव में हो, तो जातक को हर्निया होता है।

कुंभ लग्न : लग्नेश षष्ठ भाव में गुरु से युक्त हो, बुध सप्तम भाव में केतु से युक्त, या दृष्ट हो, शुक्र अष्टम भाव में सूर्य से अस्त हो और लग्न पर मंगल की दृष्टि होने से हर्निया रोग होने की संभावना रहती है।

मीन लग्न : शनि और शुक्र षष्ठ भाव में युति बना रहे हों और राहु-केतु के दुष्प्रभाव में हों, मंगल द्वादश या लग्न भाव में हो, बुध-चंद्र पंचम भाव में होने से हर्निया रोग होता है।



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