भूमि चयन डॉ. जय प्रकाश शर्मा (लाल धागे शर्मा) किसी भी वास्तु-सम्मत निर्माण के लिए सबसे पहले आवद्गयकता होती है ऐसे भूखंड की, जो सब दृष्टियों से दोष रहित हो। भूखंड का चयन करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए। भूमि की आकृति भूमि की ढलान भूमि के कटाव व विस्तार आदि भूमि तक पहुंचने के मार्ग वातावरण भूमि परीक्षण व शुभाशुभ ज्ञान भूमि दिशा विचार भूमि की आकृति : गृह वास्तु में मकान बनाने के लिए वर्गाकार, आयताकर, वृत्ताकार व गोमुखी भूंखड को शुभ माना गया है। अनियमित आकार के व अनियमित कोणों वाले भूखंड अशुभ होते हैं। भूखंड के सभी कोण 900 के हों, तो उत्तम माने जाते हैं। आयताकार भूखंड सर्वोत्तम माना गया है। वर्गाकार : वर्गाकार भूखंड की चारों भुजाएं समान और चारों कोण 900 के होते हैं। वास्तु के अधिकतर गं्रथों में इसे शुभ माना गया है। किंतु ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि इसमें रहने वाले गृहस्थों के धन का नाश होता है। आयताकार भूखंड : जिस भूखंड में आमने-सामने की दोनों भुजाएं समान हों और चारों कोण 900 के हों, उसे आयताकार भूखंड कहते हैं। इसकी लंबाई व चौड़ाई में 1:2 से कम का अनुपात होना चाहिए। अर्थात् लंबाई चौड़ाई से दुगुनी से कम रहे। चौड़ाई से दुगुनी या उससे अधिक लंबाई वाला भूखंड गृहस्वामी के लिए विनाशकारक होता है। वृत्ताकार भूखंड : वृत्ताकार भूखंड में निर्माण भी वृत्ताकार ही होना चाहिए। इस तरह के भूखंड में वर्गाकार या आयताकार निर्माण अशुभ होता है। ऐसे भूखंड बहुत कम देखने में आते हैं। (मतांतर से कुछ विद्वान इसे अशुभ मानते हैं।) गोमुखी प्लाट : जो भूखंड गाय के मुख के आकार का हो उसे गोमुखी भूखंड कहते हैं। ऐसे भूखंड आगे से तंग व पीछे से बड़े होते हैं। इन्हें गृह वास्तु के लिए शुभ माना गया है। (मतांतर से ऐसे भूखंड पश्चिममुखी व दखिणमुखी होने पर ही शुभ होते हैं, पूर्वमुखी व उत्तरमुखी होने पर ईशान कोण कटा हुआ माना जाएगा जो अशुभ होता है।) त्रिकोण भूखंड : गृह वास्तु में इसे अशुभ माना गया है। ऐसे भूखंड में रहने से व्यक्ति को राजभय होता है। उसके विरुद्ध मुकदमेबाजी हो सकती है व उसे मानसिक कष्टों का भय रहता है। अंडाकार भूखंड : अंडाकार भूखंड गृह वास्तु में तनावकारक व हानिकारक माने गए हैं। ऐसे भूखंड धार्मिक वास्तु, मंदिर आदि के निर्माण हेतु काम में लाए जा सकते हैं। सिंहमुखी भूंखड : सिंहमुखी भूखंड शेर के मुंह की तरह आगे से खुले व पीछे से तंग होते हैं। ये भूखंड गृह वासतु में अशुभ माने गए हैं लेकिन व्यावसायिक वास्तु निर्माण हेतु शुभ होते हैं। अर्द्धवृत्ताकर भूखंड : ऐसे भूखंड दरिद्रताकारक, भयकारक व अशुभ होते हैं। ढोलनुमा भूखंड : ढोलनुमा भूखंड अशुभ माने गए हैं। ये भूखंड स्त्रीनाशक व विधुरता का कष्ट देने वाले होते हैं। डमरू के आकार का भूखंड : डमरू के आकार के भूखंड आंखों के लिए कष्टकारी व नुकसानदायक होते हैं। छडी़ के आकार का भूखंड : छड़ी की तरह लंबे व कम चौड़े भूखंड व्यक्ति को दुबला-पतला व कमजोर बनाते हैं। साथ ही उसके पशु धन की हानि होती है। पंखाकार भूखंड : हाथ से झलने वाले पंखे के आकर का भूखंड धन-संपत्ति का नाशक होता है। यह वयक्ति को धीरे-धीरे गरीब बना देता है। धनुषाकार भूखंड : धनुष के आकर का भूखंड उस पर वास करने वाले व्यक्ति को मूर्ख बनाता है। उसे पापी पुत्र की प्राप्ति होती है व चोरी का भय लगा रहता है। कुंभाकार भूखंड : घड़े के आकार के भूखंड पर रहने वाले व्यक्ति को कुष्ठ का रोग होने की संभावना रहती है। पंचकोणी भूखंड : ऐसे भूखंड व्यक्ति के लिए क्लेश कारक व गृह स्वामी के लिए मत्ृ यकु ारक हाते े ह।ैं षटकोणीय भूखंड : ऐसे भूखंड व्यक्ति के लिए सुख व समृद्धिकारक माने गए हैं। सप्तकोणीय भूखंड : सात कोणों वाला भूखंड सर्वदा अशुभ फलदायक होता है। विषमबाहु भूखंड : असमान आकार वाली भुजाओं और असमान कोणों वाले विषमबाहु भूखंड शोककारक, रोगकारक व धननाशक होते हैं। भूमि की ढलान भूमि की ढलान वास्तु में बहुत महत्व रखती है। यदि यह शुभ दिशा में न हो, तो मकान बनाते समय इसे शुभ दिशा में कर लेना चाहिए। ढलान पूर्व, उत्तर और ईशान में शुभ और अन्य सभी दिशाओं में अशुभ कष्टकारी मानी गई है। वास्तु शास्त्र में 26 प्रकार के भूखंडों का उल्लेख आता है। उनमें से कुछ मुखय भूखंडों का विवरण यहां प्रस्तुत है। गोवीथी भूखंड : जो भूखंड पश्चिम से ऊंचा व पूर्व से नीचा हो वह गोवीथी कहलाता है। ऐसे भूखंड पर वास करने से वंश की वृद्धि होती है। गणवीथी भूखंड : जो भूखंड दक्षिण से ऊंचा व उत्तर से नीचा हो, उसे गणवीथी भूखंड कहते हैं। ऐसे भूखंड पर वास करने से व्यक्ति निरोग रहता है। धनवीथी भूखंड : जो भूखंड नैत्य से ऊंचा व इर्श् ाान काण्े ा स े नीचा हो उसे धनवीथी भूखंड कहते हैं। यह धन देने वाला लाभदायक भूखंड होता है। गजपृष्ठ भूखंड : जो भूखंड दक्षिण-पश्चिम व वायव्य से ऊंचा और ईशान से नीचा हो उसे गजपृष्ठ भूखंड कहते हैं। हाथी की पीठ के आकार का यह भूखंड लाभदायक व स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम होता है। कूर्मपृष्ठ भूखंड : जो भूखंड मध्य में ऊंचा व अन्य सभी दिशाओं में नीचा हो, वह कूर्मपृष्ठ भूखंड कहलाता है। कछुए की पीठ के आकार के इस भूखंड पर वास करने से धन-धान्य, सुख व उत्साह की वृद्धि होती है। जलीवीथी भूखंड : जो भूखंड पूर्व से ऊंचा व पश्चिम से नीचा हो, उसे जलवीथी भूखंड कहते हैं। यह भूखंड अशुभ होता है और इस पर वास करने से वंश का नाश होता है। यमवीथी भूखंड : जो भूखंड उत्तर से ऊंचा व दक्षिण से नीचा हो, यमवीथी भूखंड कहलाता है। ऐसी भूमि पर वास करने से व्यक्ति रोगग्रस्त होता है। भूतवीथी भूखंड : जो भूखंड ईशान से ऊंचा व नैत्य से नीचा हो, उसे भूतवीथी भूखंड कहते हैं। ऐसी भूमि पर वास करने से भूत-प्रेत बाधा व कष्टों की प्राप्ति होती है। वैश्वानर वीथी भूखंड : जो भूखंड वायव्य से ऊंचा व आग्नेय से नीचा हो, वैश्वानर वीथी भूखंड कहलाता है। इस पर वास करने वाला व्यक्ति अग्नि भय से ग्रस्त होता है। स्वमुख वास्तु : जो भूखंड आग्नेय, ईशान व वायव्य से ऊंचा, वायव्य व आग्नेय से नीचा और नैऋत्य से नीचा हो, स्वमुख भूखंड कहलता है। इस भूखंड पर वास करने वाले रोगग्रस्त रहते हैं और उनके धन का नाश होता है। शांडूल वास्तु जो भूखंड ईशान से ऊंचा, वायव्य व आग्नेय से नीचा हो, शांडूल वास्तु कहलाता है। यह भूमि क्लेशकारक होती है। श्वमुख वास्तु : जो भूखंड आग्नेय व ईशान से ऊंचा व पश्चिम से नीचा हो, श्वमुख वास्तु कहलाता है। ऐसी भूमि पर वास करने से सुख, शांति व धन का नाश होता है। नागपृष्ठ वास्तु : जो भूखंड ब्रह्मस्थान से नीचा व सभी दिशाओं से ऊंचा हो, नागपृष्ठ वास्तु कहलाता है। ऐसी भूमि पर वास करने वाले की पुत्री को कष्ट, परिवार में रोगों की वृद्धि, शत्रुओं से भय आदि की संभावना रहती है। भूमि के कोण व कटाव : भूमि के सभी कोणों का 900 होना अति शुभ होता है। भूमि का विस्तार पूर्व, उत्तर, व ईशान में शुभ और बाकी दिशाओं में अशुभ फलदायक होता है। इसका कटाव नुकसानदायक होता है। भूखंड (ं) में आग्नेय कोण में कटाव है अर्थात शुक्र ग्रह पीड़ित है। ऐसे भूखंड में वास करने से व्यक्ति के पत्नी के साथ संबंधों में तनाव, लड़ाई, झगड़े, आर्थिक विपन्नता आदि कष्ट हो सकते हैं। भूखंड (इ) में वायव्य कोण में कटाव है। इस कटाव के कारण चंद्र ग्रह पीड़ित होता है। ऐसे भूखंड में वास करने वाले को मानसिक अशांति, अनिद्रा, सर्दी-जुकाम आदि की संभावना रहती है। वहीं, उसके मित्रों व सहायकों की संखया में कमी हो सकती है। भूखंड (ब) में नैत्य कोण में कटाव है। नैत्य में कटाव होने से राहु ग्रह पीड़ित होता है। ऐसे भूखंड पर वास करने से स्थिरता की कमी, भूत-प्रेत बाधा, जादू-टोना, अहंकार व रोग आदि की संभावना रहती है। भूखंड (क) में ईशान कोण में कटाव है। इस कोण में कटाव होने से गुरु ग्रह पीड़ित होता है। ऐसे भूखंड पर वास करने से धन हानि, पुत्र हानि, दुःख, गठिया रोग आदि की संभावना रहती है। व्यक्ति का पूजा-पाठ में मन नहीं लगता है। भूखंड (म) में कटाव पूर्व में है। पूर्व में कटाव होने से सूर्य ग्रह पीड़ित होता है। ऐसे भूखंड पर वास करने से व्यक्ति को सरकार से परेशानी, सरकारी नौकरी में परेशानी, सिरदर्द, नेत्र रोग व अस्थि रोग आदि कष्ट हो सकते हैं। भूखंड ()ि में कटाव उत्तर की ओर है। उत्तर में कटाव होने से बुध ग्रह पीड़ित होता है। ऐसे भूखंड पर वास करने से धन और विद्या संबंधी परेशानी, मति भ्रम व स्मृति लोप आदि हो सकते हैं। भूखंड (ह) में कटाव पश्चिम की ओर है। पश्चिम में कटाव होने से शनि ग्रह पीड़ित होता है। ऐसे भूखंड में वास करने से व्यक्ति को नौकरों से परेशानी, वायु विकार, लकवा, रीढ़ की हड्डी में तकलीफ, पैरों में कष्ट आदि हो सकत हैं। भूखंड (ी) में कटाव दक्षिण की ओर है। दक्षिण में कटाव होने से मंगल ग्रह पीड़ित होता है। ऐसे भूखंड पर वास करने से व्यक्ति का अपने भाइयों से संबंध ठीक नहीं रहता। वह अत्यधिक क्रोधी होता है। उसे रक्त विकार, उच्च रक्त चाप व बवासीर आदि कष्ट हो सकते हैं। भूमि का विस्तार किसी भूखंड के साथ वाला भूखंड लेने की स्थिति में व्यक्ति को अपनी भूमि का विस्तार पूर्व दिशा में करना चाहिए जैसा कि भूखांड (ं) में दिखाया गया है। उसे मान-सम्मान व सुख-समृद्धि प्राप्त होगी। भूखंड (इ) का विस्तार उत्तर दिशा में किया गया है, जो शुभ है। व्यक्ति के धन की वृद्धि होगी। मित्रों व सहायकों से लाभ व सम्मान प्राप्त होगा। भूखंड (ब) में विस्तार ईशान की ओर किया जा सकता है, जो शुभ रहेगा। व्यक्ति को धन, पुत्र व स्वास्थ्य का लाभ होगा। इन दिशाओं के अतिरिक्त किसी भी दिशा   में भूमि का विस्तार अशुभ फलदायक होता है। भूमि तक पहुंचने के मार्ग भूखंड के पूर्व और उत्तर दिशाओं में मार्ग होना शुभ माना गया है। भूखंड के चारों ओर मार्ग होना भी अत्यंत शुभ कहा गया है। इससे मुखय द्वार शुभ पदों में किसी भी दिशा में बनाया जा सकता है। भूखंड के उत्तर और पूर्व में मार्ग होने से इन दिशाओं से आने वाली शुभ ऊर्जा की वृद्धि होती है। आम तौर पर मार्ग भूखंड से नीचे ही होते हैं, जिस कारण उत्तर और पूर्व के भाग शुभ हो जाते हैं। यदि यही मार्ग दक्षिण व पश्चिम की ओर होंगे तो अशुभ हो जाएंगे, क्योंकि पश्चिम और दक्षिण दिशा नीची व हल्की हो जाएगी। आसपास का वातावरण भूखंड के दक्षिण या पश्चिम में ऊंचे भवन, पहाड़, टीले व पेड़ शुभ माने जाते हैं। भूखंड से उत्तर या पूर्व की ओर कोई नदी या नहर हो और उसका प्रवाह उत्तर या पूर्व की ओर हो, तो शुभ माना जाता है। भूखंड के उत्तर, पूर्व या ईशान में भूमिगत जल स्रोत, कुआं, तालाब, बावड़ी आदि शुभ माने जाते हैं। भूखंड दो बड़े भूखंडों के बीच नहीं होना चाहिए। भूखंड-2 के दोनों तरफ बड़े भूखंड हैं, इसलिए यह भूखंड अशुभ माना जाएगा। ऐसे भूखंड पर वास करने वाला व्यक्ति हीन भावना से ग्रस्त रहेगा और स्वयं को दूसरों से दबा हुआ महसूस करेगा। वास्तु शोध आवासीय भूखंड के सामने कोई मंदिर, गड्ढा, खंभा, श्मशान घाट, टूटा-फूटा मकान, भट्टी आदि नहीं होने चाहिए। ऐसे भूखंड पर वास करने से व्यक्ति कई मुसीबतों से घिर जाता है। यदि घर पर मंदिर की परछाईं पड़ रही हो, तो गृहस्वामी को कष्ट भोगने पड़ते हैं। खंभा हो तो स्त्रियों में दोष, दासत्व व दुर्भाग्य की वृद्धि होती है। मकान टूटा-फूटा हो, तो शोक व धन हानि होती है। श्मशान घाट हो तो रोग, भूत, प्रेत भय व पिशाचों से भय होता है। भट्टी हो, तो पुत्र का नाश होता है। भूखंड के ऊपर से बिजली के हाई वोल्टेज वाले तारों का गुजरना अशुभ माना जाता है। बंद गली का आखिरी मकान नहीं खरीदना चाहिए। भूखंड (ं) अशुभ होता है। ऐसा भूखंड नकारात्मक ऊर्जा का भंडार माना गया है। चित्र (इ) व (ब) में दिखाए गए भूखंड मध्य फलदायी होते हैं। भूखंड के आसपास का वातावरण खुशनुमा होना चाहिए। भूमि परीक्षण व शुभाशुभ ज्ञानम् सफेद रंग की सुगंधित मिट्टी वाली भूमि ब्राह्मणों के वास के लिए श्रेष्ठ मानी गई है। लाल रंग की कसैले स्वाद वाली भूमि क्षत्रिय, राजनेता, सेना व पुलिस के अधिकारियों के लिए शुभ मानी जाती है। हरे या पीले रंग की खट्टे स्वाद वाली भूमि अच्छी नहीं मानी जाती। यह भूमि शूद्रों के योग्य होती है। मधुर, समतल, सुगंधित व ठोस भूमि भवन बनाने के लिए उपयुक्त होती है। खुदाई में चींटी, दीमक, अजगर, सांप, हड्डी, कपड़े, राख, कौड़ी, जली लकड़ी या लोहा मिलना शुभ नहीं माना जाता। भूमि की ढलान उत्तर और पूर्व की ओर शुभ होती है। भूमि पर हरे-भरे वृक्ष, पौधे व घास आदि हों तो यह जीवित मानी जाती है। ऊबड़-,खबाड़ व कांटेदार झाड़ियों वाली भूमि मृत मानी जाती है। भूमि परीक्षण के लिए भूखंड के मध्य डेढ़ फुट लंबा डेढ़ फुट चौड़ा और डेढ़ फुट गहरा गड्ढा खोदें। फिर उस सारी मिट्टी को पुनः गड्ढे में भर दें। यदि मिट्टी फालतू बच जाए तो शुभ किंतु यदि कम पड़ जाए तो अशुभ समझें। इस विधि से मिट्टी के घनत्व की परीक्षा की जाती है ताकि वहां होने वाला निर्माण स्थायी हो व प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूकंप आदि से रक्षा हो सके। रेतीली व पोली मिट्टी पर किया गया निर्माण स्थायी नहीं होता। भूमि परीक्षण के लिए उपयुक्त विधि से गड्ढा खोदकर उसमें पानी भर दें और सौ कदम चल कर वापस आ जाएं। लौटने पर यदि गड्ढे में लगभग उतना ही पानी हो, तो भूमि श्रेष्ठ, यदि आधा रह जाए तो मध्यम और यदि आधे से कम हो, तो अशुभ समझें। भूमि परीक्षण की एक अन्य विधि के अनुसार उपयुक्त प्रकार से गड्ढा खोदकर उसे लीप-पोतकर शुद्ध कर लें। फिर एक चौमुखी दीप में घी भरकर उसके चारों मुखों में चार बत्तियां जला दें और उसे गड्ढे में रख दें। यदि पूर्व की बत्ती अधिक समय तक जले, तो भूमि को ब्राह्मणों के लिए शुभ, यदि उत्तर की बत्ती अधिक समय तक जले, तो क्षत्रिया के लिए, पश्चिम की बत्ती अधिक समय तक जले, तो वैश्यों के लिए और दक्षिण की बत्ती अधिक समय तक जले तो शूद्र के लिए शुभ समझना चाहिए। भूमि दिशा विचार भूखंड की दिशाओं का निर्धारण करने के लिए भूखंड के ब्रह्म स्थान के बीचोबीच खड़े होकर कंपास से दिशाएं देखें। यदि भूखंड की भुजाएं मुखय दिशाओं के समानांतर हा तो शुभ होता है। अर्थात ईशान आदि कोण कोणों में ही आ रहे हों। दिशाओं के समानांतर भूखंड होने से पृथ्वी को प्रभावित करने वाली चुंबकीय तरंगें भूखंड के बीचोबीच प्रवाहित होंगी जो नैसर्गिक संतुलन बनाते हए भूखंड को बल प्रदान करेंगी। विदिशा भूखंड यदि भूखंड की भुजाएं मुखय दिशाओं के समानांतर नहीं होंगी, तो ईशान आदि कोण कोणों में नही आएंगे और भूखंड से निकलने वाली चुंबकय तरंगें संतुलन नहीं बना पाएंगी जिससे शुभ फलों में कमी आएगी। ऐसा भूखंड विदिशा भूखंड कहलाता है। इसे दिक्दोष भी कहते हैं। वीथी शूल भूखंड के समीप से निकलने वाले मार्ग यदि भूखंड पर एक तीर की तरह चुभते हों, तो वह वीथी शूल कहलाता है। इसे अशुभ माना गया है।


विद्या बाधा मुक्ति विशेषांक  फ़रवरी 2010

इस विशेषांक में ज्योतिष में विद्या प्राप्ति व उच्च शिक्षा के योग, विद्या प्राप्ति में बाधा, ज्ञान प्रदायिनी तारा महाविद्या साधना, विद्या व ज्ञान प्राप्ति के ज्योतिषीय उपाय इत्यादि विषयों का समावेश किया गया है। इस विशेषांक में विक्रमी संवत्‌ २०६७ ज्योतिष के आइने में' लेख के अंतर्गत भारत के समाजिक, आर्थिक व सामाजिक भविष्य पर चर्चा की गई है। संपादकीय लेख में श्री अरुण कुमार बंसल जी ने विद्यार्थियों के लिए विद्या बाधा मुक्ति के कुछ सरल व सटीक उपाय प्रस्तुत किए हैं।

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