ज्योतिषीय आहारिक उपचार

ज्योतिषीय आहारिक उपचार  

ज्येतिष में ग्रहों के अशुभ फल को कम करने के लिए एवं शुभ ग्रहों को बल प्रदान करने के लिए आम तौर पर सभी सलाहकार रत्नों की सलाह देते हैं। प्रत्येक ग्रह के अनुसार जातक को रत्न बताए जाते हैं जैसे सूर्य के लिए माणिक्य, चंद्र के लिए मोती, मंगल के लिए मूंगा, बुध के लिए पन्ना, गुरु के लिए पुखराज, शुक्र के लिए हीरा, शनि के लिए नीलम राहु के लिए गोमेद एवं केतु के लिए लहसुनिया। इन्हें विधिपूर्वक पहनने से लाभ मिलता है। कुछ ज्योतिषीगण लाल किताब के उपायों द्वारा भी समस्या का समाधान करते हैं जैसे सूर्य के लिए पानी में चीनी डाल कर सूर्य को अघ्र्य, चंद्रमा के लिए दूध-चावल का दान, मंगल के लिए माता, साधु और बंदर की सेवा, बुध के लिए मछलियों को भोजन, गुरु के लिए केसर या हल्दी का तिलक, शुक्र के लिए आलू, घी और दही का दान, शनि के लिए बंदर को गुड़ व केला खिलाना, राहु के लिए चांदी के टुकड़े को पास रखना एवं केतु के लिए काले कुत्ते की सेवा आदि। ये उपाय केवल उदाहरण के तौर पर बताए गए हंै क्योंकि लाल किताब में उपाय ग्रहों की विभिन्न खानों में स्थिति के अनुसार अलग-अलग बताए जाते हैं। इसके अतिरिक्त वैदिक मंत्रों का भी ज्योतिष में विशेष महत्व है। प्रत्येक ग्रह के अनुसार मंत्रों का जप विशेष फलदायी होता है। इस तरह से प्रत्येक ज्योतिषी अपने अनुभव के आधार पर विभिन्न उपाय बताते हैं। रत्न, यंत्र, मंत्र, दान, पूजा, यज्ञ आदि के अतिरिक्त यदि हम प्रत्येक ग्रह के अनुकूल संतुलित खाद्य पदार्थों को भी अपने भोजन में सम्मिलित कर लें तो निश्चित रूप से अपने तन और मन का अधिक स्वस्थ एवं सुंदर बना सकते हैं। अपने व्यक्तिगत अनुभव द्वारा मैंने यह महसूस किया कि सतुंलित आहार द्वारा भी हम विभिन्न ग्रहों को बल दे सकते हैं तथा शुभकारक कमजोर ग्रहों को बलशाली बना कर स्वास्थ्य के प्रति शुभ फल बढ़ा सकते हैं। सूर्य को आत्माकारक ग्रह माना गया है। यह प्रथम, नवम एवं दशम भावों का कारक ग्रह है। इन भावों से हम रूप, रंग, स्वास्थ्य, गुण, स्वभाव, आत्मा, सुख-दुख, मानसिक शांति, धार्मिक प्रवृत्ति एवं कर्म क्षेत्र का विचार करते हैं। सूर्य के अनुकूल रंग हंै सुनहरा और गुलाबी। सूर्य ग्रह के अनुकूल श्रेष्ठ भोज्य वस्तुएं हंै गेहूं, जौ, गुड़, खुमानी, मुनक्का, खजूर, छुहारा, गन्ना, किशमिश, मक्का इत्यादि। वैसे तो गेहूं का आटा सभी खाते हैं पर यदि हम गेहूं को अंकुरित करके लंे या गेहूं और जौ को बोकर उसके ज्वारों का रस पीएं अथवा मुनक्का, किशमिश तथा खुमानी का पानी में भिगो कर नित्य ग्रहण करें और भोजन के उपरांत थोड़े से गुड़ का सेवन करंे तो निश्चित रूप से स्वास्थ्य में आशातीत लाभ होगा और मन भी प्रफुल्लित रहेगा। कहा गया है मन चंगा तो कठौती में गंगा। इन सब भोज्य पदार्थों से विशेष स्फूर्ति का अनुभव होगा और आत्मिक बल प्राप्त होगा। कर्म क्षेत्र में विशेष उत्साह से कार्य कर सकेंगे और हड्डियां मजबूत होंगी। चंद्रमा को मन का कारक ग्रह माना गया है और यह चतुर्थ भाव का कारक ग्रह है। इस ग्रह का अनुकूल रंग सफेद है एवं अनुकूल भोज्य पदार्थ हंै दूध, दही, पनीर, सफेद तिल एवं अखरोट। चंद्रमा को बल प्रदान करने के लिए सोयाबीन के दूध अथवा पनीर का प्रयोग करें, सफेद तिल के लड्डू खाएं, सेला चावल का प्रयोग करें। अखरोट की गिरी भिगो कर प्रातःकाल चबा कर खाएं। यह दिल के लिए बहुत उपयोगी है, हृदय रोगियों को बहुत फायदा करेगी। जो बच्चे रात को बिस्तर गीला करते हैं उन्हें नियमित रूप से तिल का सेवन कराया जाए तो इस समस्या में सुधार होता है। मंगल तृतीय एवं षष्ठ भावों का कारक ग्रह है। इसका अनुकूल रंग है लाल और इसके अनुकूल संतुलित भोज्य पदार्थ हैं अनार, गाजर, मोठ, छुहारा, लाल चैलाई, चुकंदर, टमाटर, लौंग, मसूर, किशमिश, लाल मक्का, बादाम आदि। इनके सेवन से खून संबंधी सभी दोषों से मुक्ति मिल जाती है। मोठ को अंकुरित कर नित्य सुबह कच्चा चबा कर खाएं। सर्दियों में मक्के के आटे की रोटी खाएं और बादाम को भिगो कर प्रतिदिन सुबह खाएं। इससे जहां आपको रोगों से मुक्ति मिलेगी वहीं अच्छे स्वास्थ्य के कारण पराक्रम में वृद्धि होगी, क्योंकि किसी ने कहा है: एक सुख निरोगी काया दूजा सुख घर में हो माया, तीजा सुख सुलक्षणा नारी, चैथा सुख सुत आज्ञाकारी। पहला सुख प्राप्त हो जाएगा तो बाकी सुख भी धीरे-धीरे मिल ही जाएंगे। बुध ग्रह चतुर्थ एवं दशम भाव का कारक है। इस ग्रह का अनुकूल रंग हरा है। इस ग्रह को बल प्रदान करने के लिए संतुलित भोज्य वस्तुएं हैं हरा आंवला, मूंग, मेथी, लौकी, बथुआ, पालक, सरसों, गेहूं व जौ के ज्वार अथवा हरी दूब और कच्चा हरा पेठा। हरी मूंग एवं मेथी अंकुरित करके लें। बथुआ, पालक एवं सरसों के साग का सर्दियों में सेवन बहुत लाभकारी है। इनमें कैल्शियम एवं फाॅलिक एसिड की मात्रा बहुत अधिक होती है। ये खून की नलियों को साफ रखते हंै। पालक का बीटा कैरोटिन नामक विटामिन शारीरिक विकास में सहायक होता है। गेहूं, जौ के ज्वारों अथवा दूब का रस निकाल कर सुबह-सुबह पीएं- पेट के सभी रोगों में बहुत लाभ मिलेगा। ग्वार पाठे का जूस अथवा इसके गूदे का हलवा या ग्वार की फली भी घुटनों के दर्द में अत्यंत लाभकारी है। आंवले का जूस आंखों के लिए अत्यंत लाभकारी है। ब्रोकलि अथवा हरी गोभी स्तन कैंसर के उपचार के लिए बहुत उपयोगी हैं। गुरु द्वितीय, पंचम, नवम तथा एकादश भाव का शुभकारक ग्रह है इसका प्रिय रंग पीला और इसके अनुकूल भोज्य पदार्थ हैं पपीता, मेथी दाना, शकरकंद, अदरक, चना दाल व चने का आटा, सीताफल, संतरा, कच्ची हल्दी, मक्के का आटा। जहां केला, पपीता बदहजमी और अम्लता को दूर करता है वहीं कच्ची हल्दी या अंकुरित मेथी भी स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभप्रद है। ये सभी वस्तुएं पेट की समस्याओं को दूर करती हैं और चर्बी नहीं बनने देती। शुक्र ग्रह सप्तम भाव का कारक है और इसका शुभ रंग है सफेद। इस ग्रह की अनुकूल भोज्य वस्तुएं हैं सफेद भीगे बादाम, गेहूं, सफेद मिर्च, अखरोट, सिंघाड़े, नारियल, अल्फाअल्फा तथा चैलाई के बीज। चैलाई के बीजों को फुलाकर बनाई गई खीर अथवा लड्डू सुपाच्य। तथा वृद्धों और बच्चों के लिए लाभदायक। इनसे रूप रंग में तो निखार आएगा ही, यौवन भी बरकरार रखेंगे। भीगे बादाम व अखरोट कोलेस्ट्राॅल को कम करेंगे, दमा व जोड़ों के दर्द में राहत देंगे, कैंसर अवरोधी तत्वों को मजबूत करेंगे और रक्त एवं ज्ञान तंतुओं को विशेष रूप से बल देने के साथ याददाश्त, बुद्धि एवं स्फूर्ति में भी बढ़ोतरी होगी। दुबले-पतले व शक्तिहीन व्यक्तियों को इसके प्रयोग से विशेष लाभ होगा। अल्फाअल्फा के बीज भी अंकुरित कर रोज कच्चे खाएं। जिन लोगों को मधुमेह की शिकायत हो, वे बराबर मात्रा में गेहूं चना (काला साबुत) या सोयाबीन जौ व मंडवे (मड़ुआ) के आटे की रोटी का सेवन करें अवश्य लाभ होगा। शनि षष्ठ, अष्टम एवं द्वादश भावों का कारक ग्रह है। इस ग्रह का अनुकूल रंग है काला, नीला अथवा कत्थई। इस ग्रह को अनुकूल बनाने के लिए जहां काली उड़द व तेल का दान करते हैं, वहीं भोज्य पदार्थों में जामुन, काली मिर्च, मंडआ का आटा, काले अंगूर, कुल्थी, मुनक्का, शहद, गुलकंद आदि शनि के शुभ प्रभाव को बढ़ाएंगे। जिन्हें पथरी की शिकायत होती है, अगर वे नियमित रूप से भिगोई गयी कुल्थी के पानी का सेवन करें और हफ्ते में एक या दो बार उसकी दाल खाएं तो काफी लाभ प्राप्त होगा। इन पदार्थों के सेवन से एक ओर पाचन ठीक रहेगा तो दूसरी ओर शारीरिक बल भी प्राप्त होगा। बवासीर के रोगी नारियल की छाल को जला कर ताजा दही के साथ एक-एक चम्मच तीन बार खाएं, अत्यंत लाभ होगा। साथ ही धूम्रपान, मांस मदिरा आदि से बचना चाहिए। यदि धूम्रपान छोड़ देंगे तो पैरों के दर्द तथा हृदय रोग में भी फायदा होगा। वनस्पति घी का प्रयोग बिल्कुल न करें। इसके स्थान पर सरसों का तेल, सोयाबीन अथवा बिनोले का तेल प्रयोग करें। खून में अधिक चर्बी से बचने के लिए अलसी के 5-7 ग्राम बीज पीस कर या फिर गुड़ में लड्डू बनाकर खाएं। इन सब के प्रयोग से शारीरिक रोगों से काफी हद तक मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। कहा भी गया है चिकित्सा से बचाव बेहतर है। तात्पर्य यह कि स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का वास होता है। गालिब ने कहा है तंगदस्ती हजार हो गालिब, तन्दुरुस्ती हजार नियामत है। अर्थात मुफलिसी तो ठीक है पर रोगी रहना ठीक नहीं। हम जीने के लिए खाते हैं न कि खाने के लिए जीते हैं। संतुलित आहार द्वारा हम अपने रोगों को बहुत हद तक सीमित कर सकते हैं।


रत्न विशेषांक  फ़रवरी 2006

हमारे ऋषि महर्षियों ने मुख्यतया तीन प्रकार के उपायों की अनुशंसा की है यथा तन्त्र, मन्त्र एवं यन्त्र। इन तीनों में से तीसरा उपाय सर्वाधिक उल्लेखनीय एवं करने में सहज है। इसी में से एक उपाय है रत्न धारण करना। ऐसा माना जाता है कि कोई न कोई रत्न हर ग्रह से सम्बन्धित है तथा यदि कोई व्यक्ति वह रत्न धारण करता है तो उस ग्रह के द्वारा सृजित अशुभत्व में काफी कमी आती है। फ्यूचर समाचार के इस विशेषांक में अनेक महत्वपूर्ण आलेखों को समाविष्ट किया गया है जिसमें से प्रमुख हैं- चैरासी रत्न एवं उनका प्रभाव, विभिन्न लग्नों में रत्न चयन, ज्योतिष के छः महादोष एवं रत्न चयन, रोग भगाएं रत्न, रत्नों का शुद्धिकरण एवं प्राण-प्रतिष्ठा, कितने दिन में असर दिखाते हैं रत्न, लाजवर्त मणि-एक नाम अनेक काम इत्यादि। इसके अतिरिक्त स्थायी स्तम्भों के भी महत्वपूर्ण आलेख विद्यमान हैं।

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