WhatsApp और ज्योतिष

WhatsApp और ज्योतिष  

व्यूस : 2057 | सितम्बर 2016

वैवाहिक जीवन और शनि-शुक्र की युति व्यक्ति के जन्म लेने के साथ ही बहुत कुछ ऐसा है, जो तय है और जिसके ज्योतिषीय अध्ययन करने से यहां तक पता चल जाता है कि फलां व्यक्ति अपने जीवन में कितनी सफलता प्राप्त करेगा व स्व-आचरण में किस प्रकार का व्यवहार करेगा।

आकाशीय ग्रहों में हमारी आकाशगंगा के शनि और शुक्र दो ऐसे ग्रह हैं, जो जीवन की अन्य बातें तो निश्चित करते ही हैं, लेकिन विशेषकर वैवाहिक जीवन के सुख एवं दुःख पर अपना सीधा असर डालते हैं।


अपनी कुंडली में राजयोगों की जानकारी पाएं बृहत कुंडली रिपोर्ट में


किसी जातक की कुंडली में यदि इन दोनों ग्रह की युति हो तो व्यक्ति भले ही सामान्य नजर से देखने पर चंचल नजर न आए, किन्तु वह गाहे-बगाहे अपने आचरण से खासकर स्त्रियों के प्रति पुरुष का और पुरुषों के प्रति स्त्री का विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं तथा उनका आकर्षण इतना अधिक होता है कि वह मर्यादा की सभी सीमाएं पार करने में भी संकोच नहीं करते। ऐसे लोगों को यहां भंवरा और भंवरी की संज्ञा दी जाती है, जो एक फूल से दूसरे फूल पर मंडराते रहते हैं।

स्त्री और पुरुष, दोनों ही इस स्थिति में इन दो ग्रहों के प्रभाव के कारण अपने वैवाहिक जीवन के प्रति पूरी तरह ईमानदार और समर्पित नहीं रह पाते हैं। ऐसे जातकों में परस्त्री-परपुरुष से नजदीकी बढ़ाने, मर्यादा की सभी सीमाएं पार करने की चाहत बनी रहती है।

जिस व्यक्ति की कुण्डली में शनि और शुक्र एक साथ एक घर में होते हैं उनके वैवाहिक जीवन में कलह की संभावना अधिक रहती है। शुक्र यदि मंगल के मेष या वृश्चिक राशि में बैठा हो तब तो परायी स्त्री से निकटता की संभावना काफी ज्यादा रहती है। यही बात स्त्रियों पर भी लागू होती है।

Manoj Shukla Kanpur ड. 9415728653 जन्म कुंडली में प्राॅपर्टी योग आज आपकी जन्म कुंडली में प्राॅपर्टी बनाने के योगों के बारे में बात करेंगे कि योग हैं या नहीं और अगर हैं तो किस तरह के योग बन रहे हैं। जन्म कुंडली में प्राॅपर्टी का विश्लेषण जन्म कुंडली का चतुर्थ भाव प्राॅपर्टी के लिए मुख्य रुप से देखा जाता है। चतुर्थ भाव से व्यक्ति की स्वयं की बनाई हुई सम्पत्ति को देखा जाता है।

यदि जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव पर शुभ ग्रह का प्रभाव अधिक है तब व्यक्ति स्वयं की भूमि बनाता है। जन्म कुंडली में मंगल को भूमि का मुख्य कारक माना गया है। जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव या चतुर्थेश से मंगल का संबंध बनने पर व्यक्ति अपना घर अवश्य बनाता है। जन्म कुंडली में जब एकादश का संबंध चतुर्थ भाव से बनता है तब व्यक्ति एक से अधिक मकान बनाता है

लेकिन यह संबंध शुभ व बली होना चाहिए। जन्म कुंडली में लग्नेश, चतुर्थेश व मंगल का संबंध बनने पर भी व्यक्ति भूमि प्राप्त करता है अथवा अपना मकान बनाता है। जन्म कुंडली में चतुर्थ व द्वादश भाव का बली संबंध बनने पर व्यक्ति घर से दूर भूमि प्राप्त करता है या विदेश में घर बनाता है। जन्म कुंडली में यदि चतुर्थ, अष्टम व एकादश भाव का संबंध बन रहा हो तब व्यक्ति को पैतृक संपत्ति मिलती है।

जन्म कुंडली में बृहस्पति ग्रह का संबंध अष्टम से बन रहा हो तब भी व्यक्ति को पैतृक संपत्ति मिलती है। जन्म कुंडली में मंगल व शनि का संबंध चतुर्थ भाव या भावेश या दशाओं से बने बिना घर का निर्माण नही होता है। इसलिए गृह निर्माण में मंगल व शनि की भूमिका मुख्य मानी गई है। मंगल भूमि का कारक है तो शनि निर्माण हैं इसलिए घर बनाने में इनका अहम रोल होता है।

भूमि निर्माण में चतुर्थांश कुंडली का महत्व जन्म कुंडली के साथ संबंधित वर्ग कुंडलियों का विश्लेषण भी करना आवश्यक है। भूमि के लिए वैदिक ज्योतिष में चतुर्थांश कुंडली को महत्व दिया गया है. भूमि आदि के विश्लेषण के लिए जन्म कुंडली के साथ चतुर्थांश कुंडली का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। यदि जन्म कुंडली में प्राॅपर्टी के योग हैं और वर्ग कुंडली में नहीं है तब व्यक्ति को प्राॅपर्टी बनाने में दिक्कतें आती हैं। चतुर्थांश कुंडली का आकलन प्राॅपर्टी के लिए किया जाता है। चतुर्थांश कुंडली का लग्न/लग्नेश व चतुर्थ भाव/भावेश पर शुभ प्रभाव होना चाहिए अन्यथा प्राॅपर्टी नहीं बन पाती है।

चतुर्थांश कुंडली के लग्न/लग्नेश व चतुर्थ/चतुर्थेश पर मंगल व शनि का प्रभाव होना चाहिए तभी भूमि की प्राप्ति होती है अथवा व्यक्ति घर बना पाता है। यदि जन्म कुंडली में प्राॅपर्टी बनाने के योग हैं और चतुर्थांश कुंडली में योग नहीं हैं तब व्यक्ति को परेशानियाँ आती हैं। जन्म कुंडली में योग नहीं हैं और चतुर्थांश कुंडली में योग हैं तब कुछ परेशानियों के बाद प्राॅपर्टी बन जाती है।

प्राॅपर्टी बनने में बाधाएँ आइए अब प्राॅपर्टी बनने में होने वाली बाधाओं व रुकावटों के बारे में जानने का प्रयास करते हैं। यदि जन्म कुंडली में मंगल का संबंध चतुर्थ से न बन रहा हो तब अपना स्वयं का मकान बनाने में बाधाएँ आती हैं। जन्म कुंडली में शनि का संबंध चतुर्थ से न बन रहा हो तब व्यक्ति मकान का निर्माण करने में रुकावटों का सामना कर सकता है।

जन्म कुंडली में चतुर्थ से संबंधित दशा व गोचर एक साथ न मिल पा रहे हों तब भी व्यक्ति भूमि प्राप्त करने में बाधाओं का सामना कर सकता है। चतुर्थ व चतुर्थेश अशुभ व पाप प्रभाव में स्थित हों तब मकान नहीं बन पाता है। शनि की तीसरी दृष्टि चतुर्थ भाव पर पड़ने पर व्यक्ति का अपना घर होते भी वह किन्हीं कारणों से उसमें रह नहीं पाता है।

जीवन में एक से अधिक घर भी बदल सकता है। यदि चतुर्थ भाव का संबंध छठे भाव से बन रहा हो तब प्राॅपर्टी को लेकर विवाद अथवा कोर्ट केस आदि हो सकते हैं। उपरोक्त सभी बातों का आकलन जन्म कुंडली के साथ चतुर्थांश कुंडली में भी करना चाहिए और फिर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए। जन्म कुंडली में यदि चतुर्थ भाव में अकेला मंगल स्थित है तब प्राॅपर्टी होते भी कलह बना रह सकता है। मकान अथवा जमीन - जायदाद को लेकर कोई न कोई विवाद हो सकता है।

Devendra Dayare, Nagpur मो. 9689061101 भगवान श्री कृष्ण का जीवन परिचय

- भगवान् श्री कृष्ण को अलग अलग स्थानों में अलग अलग नामों से जाना जाता है।

- उत्तर प्रदेश में कृष्ण या गोपाल, गोविन्द इत्यादि नामों से जानते हैं।

- राजस्थान में श्रीनाथजी या ठाकुरजी के नाम से जानते हैं।

- महाराष्ट्र में बिट्ठल के नाम से भगवान् जाने जाते हैं।

- उड़ीसा में जगन्नाथ जी के नाम से जाने जाते हैं।

- बंगाल में गोपाल जी के नाम से जाने जाते हंै।

- दक्षिण भारत में वेंकटेश या गोविंदा के नाम से जाने जाते हैं।

- गुजरात में द्वारिकाधीश के नाम से जाने जाते हैं।

- असम, त्रिपुरा, नेपाल इत्यादि पूर्वोत्तर क्षेत्रों में कृष्ण नाम से ही पूजा होती है।

- मलेशिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस इत्यादि देशों में कृष्ण नाम ही विख्यात है।

- गोविन्द या गोपाल में ‘गो’ शब्द का अर्थ गाय एवं इन्द्रियों, दोनों से है। गो एक संस्कृत शब्द है और ऋग्वेद में गो का अर्थ होता है मनुष्य की इंद्रियां...जो इन्द्रियों का विजेता हो जिसके वश में इंद्रियां हों वही गोविंद है, गोपाल है।

- श्री कृष्ण के पिता का नाम वसुदेव था इसलिए इन्हें ‘वासुदेव’ के नाम से जाना गया। श्री कृष्ण के दादा का नाम शूरसेन था।


करियर से जुड़ी किसी भी समस्या का ज्योतिषीय उपाय पाएं हमारे करियर एक्सपर्ट ज्योतिषी से।


- श्री कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के राजा कंस की जेल में हुआ था।

- श्री कृष्ण के भाई बलराम थे लेकिन उद्धव और अंगिरस उनके चचेरे भाई थे, अंगिरस ने बाद में तपस्या की थी और जैन धर्म के तीर्थंकर नेमिनाथ के नाम से विख्यात हुए थे।

- श्री कृष्ण ने 16100 राजकुमारियों को राजा नरकासुर की कारागार से मुक्त कराया था और उन राजकुमारियों को आत्महत्या से रोकने के लिए मजबूरी में उनके सम्मान हेतु उनसे विवाह किया था क्योंकि उस युग में हरण की हुयी स्त्री अछूत समझी जाती थी और समाज उन स्त्रियों को अपनाता नहीं था।

- श्री कृष्ण की मूल पटरानी एक ही थी जिनका नाम रुक्मिणी था जो महाराष्ट्र के विदर्भ राज्य के राजा रुक्मी की बहन थीं। रुक्मी शिशुपाल का मित्र था और श्री कृष्ण का शत्रु ।

- दुर्योधन श्री कृष्ण का समधी था और उसकी बेटी लक्ष्मणा का विवाह श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ हुआ था।

- श्री कृष्ण के धनुष का नाम सारंग था। शंख का नाम पा Ûचजन्य था। चक्र का नाम सुदर्शन था। उनकी प्रेमिका का नाम राधारानी था जो बरसाना के सरपंच वृषभानु की बेटी थी। श्री कृष्ण राधारानी से निष्काम और निःश्वार्थ प्रेम करते थे। राधारानी श्री कृष्ण से उम्र में बहुत बड़ी थी। लगभग 6 साल से भी ज्यादा का अंतर था। श्री कृष्ण ने 14 वर्ष की उम्र में वृंदावन छोड़ दिया था और उसके बाद वो राधा से कभी नहीं मिले।

- श्री कृष्ण विद्या अर्जित करने हेतु मथुरा से उज्जैन, मध्य प्रदेश आये थे और यहाँ उन्होंने उच्च कोटि के ब्राह्मण महर्षि सन्दीपनि से अलौकिक विद्याओं का ज्ञान अर्जित किया था।

- श्री कृष्ण की कुल आयु 125 वर्ष थी। उनके शरीर का रंग गहरा काला था और उनके शरीर से 24 घंटे पवित्र अष्टगंध महकता था। उनके वस्त्र रेशम के पीले रंग के होते थे और मस्तक पर मोरमुकुट शोभा देता था। उनके सारथि का नाम दारुक था और उनके रथ में चार घोड़े जुते होते थे। उनकी दोनों आँखों में प्रचंड सम्मोहन था।

- श्री कृष्ण के कुलगुरु महर्षि शांडिल्य थे।

- श्री कृष्ण का नामकरण महर्षि गर्ग ने किया था।

- श्री कृष्ण के बड़े पोते का नाम अनिरुद्ध था जिसके लिए श्री कृष्ण ने बाणासुर और भगवान् शिव से युद्ध करके उन्हें पराजित किया था।

- श्री कृष्ण ने गुजरात के समुद्र के बीचों बीच द्वारिका नाम की राजधानी बसाई थी। द्वारिका पुरी सोने की थी और उसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया था।

- श्री कृष्ण को जरा नाम के शिकारी ने बाण मारा था।

- श्री कृष्ण ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अर्जुन को पवित्र गीता का ज्ञान रविवार शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन मात्र 45 मिनट में दे दिया था।

- श्री कृष्ण ने सिर्फ एक बार बाल्यावस्था में नदी में नग्न स्नान कर रही स्त्रियों के वस्त्र चुराए थे और उन्हें अगली बार यूँ खुले में नग्न स्नान न करने की नसीहत दी थी।

- श्री कृष्ण के अनुसार गौ हत्या करने वाला असुर है और उसको जीने का कोई अधिकार नहीं।

- श्री कृष्ण अवतार नहीं थे बल्कि अवतारी थे....जिसका अर्थ होता है ‘पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान’।

- न ही उनका जन्म साधारण मनुष्य की तरह हुआ था ।

- सर्वान् धर्मान परित्यजम मामेकं शरणम् व्रज अहम् त्वम् सर्व पापेभ्यो मोक्षस्यामी मा शुच-- भगवद् गीता अध्याय 18, श्री कृष्ण सभी धर्मों का परित्याग करके एकमात्र मेरी शरण ग्रहण करो, मैं सभी पापों से तुम्हारा उद्धार कर दूंगा,डरो मत! C K Bharadwaj, Saharanpur M. 8192086620 जीवन का कठोर सत्य भगवान विष्णु गरुड़ पर बैठ कर कैलाश पर्वत पर गए।

द्वार पर गरुड़ को छोड़ कर खुद शिव से मिलने अंदर चले गए। तब कैलाश की अपूर्व प्राकृतिक शोभा को देख कर गरुड़ मंत्रमुग्ध थे कि तभी उनकी नजर एक खूबसूरत छोटी सी चिड़िया पर पड़ी। चिड़िया कुछ इतनी सुंदर थी कि गरुड़ के सारे विचार उसकी तरफ आकर्षित होने लगे। उसी समय कैलाश पर यम देव पधारे और अंदर जाने से पहले उन्होंने उस छोटे से पक्षी को आश्चर्य की दृष्टि से देखा।

गरुड़ समझ गए कि उस चिड़िया का अंत निकट है और यमदेव कैलाश से निकलते ही उसे अपने साथ यमलोक ले जाएँगे। गरूड़ को दया आ गई। इतनी छोटी और सुंदर चिड़िया को मरता हुआ नहीं देख सकते थे। उसे अपने पंजों में दबाया और कैलाश से हजारांे कोस दूर एक जंगल में एक चट्टान के ऊपर छोड़ दिया, और खुद वापिस कैलाश पर आ गये। आखिर जब यम बाहर आए तो गरुड़ ने पूछ ही लिया कि उन्होंने उस चिड़िया को इतनी आश्चर्य भरी नजर से क्यों देखा था।

यम देव बोले ‘गरुड़ जब मैंने उस चिड़िया को देखा तो मुझे ज्ञात हुआ कि वो चिड़िया कुछ ही पल बाद यहाँ से हजारों कोस दूर एक नाग द्वारा खा ली जाएगी। मैं सोच रहा था कि वो इतनी जल्दी इतनी दूर कैसे जाएगी, पर अब जब वो यहाँ नहीं है तो निश्चित ही वो मर चुकी होगी।’ गरुड़ समझ गये ‘मृत्यु टाले नहीं टलती चाहे कितनी भी चतुराई की जाए।’ इस लिए कृष्ण कहते हैं:-

करता तू वह है, जो तू चाहता है परन्तु होता वह है, जो मैं चाहता हूँ कर तू वह, जो मैं चाहता हूँ फिर होगा वो, जो तू चाहेगा । ।दंदक ठनतउंदए ळतमंजमत छवपकं डण् 9582898484 अहंकार एक बार एक व्यक्ति किसी के घर गया और अतिथि कक्ष में बैठ गया। वह खाली हाथ आया था तो उसने सोचा कि कुछ उपहार देना अच्छा रहेगा। तो उसने वहा टंगा चित्र उतारा और जब घर का स्वामी आया, उसने चित्र देते हुए कहा, यह मैं आपके लिए लाया हूं। घर का स्वामी, जिसे पता था

कि यह मेरी चित्र मुझे ही भेंट दे रहा है, सन्न रह गया...!! अब आप ही बताएं कि क्या वह भेंट पा कर, जो कि पहले से ही उसका है, उस आदमी को प्रसन्न होना चाहिए ?? मूर्ख हैं हम... हम यह नहीं समझते कि उनको इन सब चीजों की आवश्यकता नहीं..!! अगर आप सच में उन्हें कुछ देना चाहते हैं तो अपनी श्रद्धा दीजिए, उन्हें अपने हर एक श्वांस में स्मरण कीजिये और विश्वास मानिए, प्रभु जरुर प्रसन्न होंगे ! चकित हूँ

भगवन, तुझे कैसे रिझाऊं मैं, कोई वस्तु नहीं ऐसी जिसे तुझ पर चढाऊं मैं...!! भगवान ने उत्तर दिया: ‘संसार की हर वस्तु तुझे मैंने दी है। तेरे पास अपनी चीज सिर्फ तेरा अहंकार है, जो मैंने नहीं दिया, उसी को तूं मुझे अर्पण कर दे... तेरा जीवन सफल हो जाएगा !‘ त्ंररंद च्तंेंकए क्ंउवी डण् 9300694736 लाजवाब लाईनें । । । । ‘ये ही सत्य हैं’ । । । ।

प्रश्न: जीवन का उद्देश्य क्या है ?

उत्तर: जीवन का उद्देश्य उसी चेतना को जानना है - जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है। उसे जानना ही मोक्ष है..!!

प्रश्न: जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त कौन है ?

उत्तर: जिसने स्वयं को, उस आत्मा को जान लिया - वह जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है..!!

प्रश्न: संसार में दुःख क्यों है ?

उत्तर: लालच, स्वार्थ और भय ही संसार के दुःख का मुख्य कारण हैं..!!

प्रश्न: ईश्वर ने दुःख की रचना क्यों की ?

उत्तर: ईश्वर ने संसार की रचना की और मनुष्य ने अपने विचार और कर्मों से दुःख और सुख की रचना की..!!

प्रश्न: क्या ईश्वर हैं ? कौन हैं वे ? क्या रुप है उनका ? क्या वे स्त्री हैं या पुरुष ?

उत्तर: कारण के बिना कार्य नहीं। यह संसार उस कारण के अस्तित्व का प्रमाण है। तुम हो, इसलिए वे भी हैं

- उस महान कारण को ही अध्यात्म में ‘ईश्वर’ कहा गया है। वह न स्त्री है और न ही पुरुष..!!

प्रश्न: भाग्य क्या है ?

उत्तर: हर क्रिया, हर कार्य का एक परिणाम है। परिणाम अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है। यह परिणाम ही भाग्य है तथा आज का प्रयत्न ही कल का भाग्य है..!!

प्रश्न: इस जगत में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ?

उत्तर: रोज हजारों-लाखों लोग मरते हैं और उसे सभी देखते भी हैं, फिर भी सभी को अनंत-काल तक रहने की इच्छा होती है.. इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है..!!


Book Navratri Maha Hawan & Kanya Pujan from Future Point


प्रश्न: किस चीज को गंवाकर मनुष्य धनी बनता है ?

उत्तर: लोभ..!! Renu Dubey, Jabalpur M. 8989428769

Ask a Question?

Some problems are too personal to share via a written consultation! No matter what kind of predicament it is that you face, the Talk to an Astrologer service at Future Point aims to get you out of all your misery at once.

SHARE YOUR PROBLEM, GET SOLUTIONS

  • Health

  • Family

  • Marriage

  • Career

  • Finance

  • Business

पितृ दोष  सितम्बर 2016

फ्यूचर समाचार का वर्तमान अंक विशेष रूप से पितृ दोष को समर्पित है। हमारे धार्मिक ग्रन्थों से हमें पता चलता है कि हमें अपने पितरों को समय-समय पर भोजन व अन्य सामग्रियां प्रदान करते रहना चाहिए। विशेष रूप से भाद्रपद महिने के कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अमावस्या तक के 15 दिन पूर्ण रूप से पितरों की सेवा के लिए ही होते हैं। पुरानों और अन्य धार्मिक ग्रन्थों से पता चलता है कि इस समय हमारे पितर पृथ्वी पर विशेष रूप से अपने सम्बन्धियों से भोजन व सम्मान प्राप्त करने आते हैं तथा इसके बदले में सम्बन्धियों को पूर्ण आशीर्वाद प्रदान करके लौट जाते हैं। इस वर्तमान अंक में बहुत सारे पितृ दोष से सम्बन्धि अच्छे लेख शामिल किए गये हैं। उनमें से कुछ विशेष लेख हैं: जानें क्या होता है पितृ दोष, कैसे कम होता है इसका प्रभाव?, श्राद्ध के साथ करें पितरों को विदा, पितृ पूजा: पहचान एवं उपाय, पितृ दोष से उत्पन्न ऊपरी बाधाएं, पितृ दोष: ज्योतिषीय योग एवं निवारण आदि।

सब्सक्राइब


.