वर-वधू में से यदि किसी की भी कुंडली में सप्तमेश 00-150 तक का हो। Û कुंडली में चंद्रमा पाप ग्रह से दृष्ट हो या उसे कोई भी शुभ या अशुभ ग्रह न देख रहे हों। Û शनि विषम राशिगत हो। Û मंगल व केतु या केतु या मंगल की किसी भी प्रकार से युति हो या दृष्टि संबंध हो। Û सप्तम भाव पीड़ित हो। Û सप्तमेश पाप ग्रह से दृष्ट हो या पाप पीड़ित हो। Û शुक्र सिंह राशिगत हो। Û सप्तम भाव को राहु, केतु, मंगल, शनि व सूर्य किसी भी प्रकार से देखते हों या सप्तमेश के साथ युति बनाते हांे। Û अगर कुंडली में लग्न व सप्तम भाव से दाईं व बाईं ओर से कालसर्प दोष बनता हो। Û कुंडली में मांगलिक दोष विद्यमान हो व वज्र, शूल, व्यातिपात, गंड, अतिगंड, व्याघात योग हो। Û शुक्र पाप राशिगत होकर नवमांश में द्विस्वभाव राशि में हो। Û सप्तम भाव व सप्तमेश किसी भी प्रकार से कमजोर अवस्था में हो। Û सप्तमेश वक्री व पाप कर्तरी योग में हो। आइए अब देखते हैं, इसके कुछ जीवंत उदाहरण कारण सहित


डिप्रेशन रोग एवं ज्योतिष विशेषांक  September 2017

डिप्रेशन रोग एवं ज्योतिष विशेषांक में डिप्रेशन रोग के ज्योतिषीय योगों व कारणों की चर्चा करने हेतु विभिन्न ज्ञानवर्धक लेख व विचार गोष्ठी को सम्मिलित किया गया है। इस अंक की सत्य कथा विशेष रोचक है। वास्तु परिचर्चा और पावन तीर्थ स्थल यात्रा वर्णन सभी को पसंद आएगा। टैरो स्तम्भ में माइनर अर्कानाफाइव आॅफ वांड्स 64 की चर्चा की गई है। महिलाओं के पसंदीदा स्तम्भ ज्योतिष एवं महिलाएं में इस बार भी रोचक लेख सम्मिलित किया गया है।

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