मंगल दोष परिहार

मंगल दोष परिहार  

मंगल यदि प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम एवं द्वादश भाव में हो, तो कुंडली मंगलीक होती है। यदि वर मंगली है, तो वधू का भी मंगली होना वांछनीय है। इस प्रकार एक कुंडली के दोष को दूसरी कुंडली काट देती है। लेकिन अनेक योगों में कुंडली को मंगली दोष नहीं लगता एवं अन्य अनेक स्थितियों में एक ही कुंडली दूसरे के मंगली दोष को काट देती है, जैसे: Û यदि लग्न में मंगल मेष अथवा मकर राशि, द्वादश में धनु राशि, चतुर्थ में वृश्चिक राशि, सप्तम में वृष, अथवा मकर राशि तथा अष्टम में कुंभ, अथवा मीन राशि में स्थित हो, तो मंगल दोष नहीं लगता। Û चतुर्थ, सप्तम, अथवा द्वादश में मेष, या कर्क का मंगल हो, तो दोष नहीं होता।



विवाह विशेषांक  मार्च 2014

फ्यूचर समाचार पत्रिका के विवाह विशेषांक में सुखी वैवाहिक जीवन के ज्योतिषीय सूत्र, वैदिक विवाह संस्कार पद्धति, कुंडली मिलान का महत्व, विवाह के प्रकार, वर्तमान परिपेक्ष्य में कुंडली मिलान, तलाक क्यों, शादी के समय निर्धारण में सहायक योग, शनि व मंगल की वैवाहिक सुख में भूमिका, शादी में देरी: कारण-निवारण, दाम्पत्य जीवन सुखी बनाने के उपाय तथा कन्या विवाह का अचूक उपाय आदि विषयों पर विस्तृत जानकारी देने वाले आलेखों को सम्मिलित किया गया है।

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