दीपक और दीपोत्सव का पौराणिक महत्व और इतिहास

दीपक और दीपोत्सव का पौराणिक महत्व और इतिहास  

व्यूस : 2992 | अकतूबर 2015

दीपक का प्रकाश भगवत प्रकाश होने के कारण जीव, माया और ब्रह्म तीनों ही इस महोत्सव में पूजे जाते हैं। अतः यह दीपोत्सव भगवान विष्णु का गृहस्थ रूप है। यदि गणेश जी का पूजन न किया जाए तो लक्ष्मी जी भी नहीं टिकेंगी। अतः दोनों का पूजन आवश्यक है। इस महोत्सव का ‘पर्वकाल’ धनत्रयोदशी (धनतेरस) से प्रारंभ हो जाता है। इन तीनों दिनों में सूर्यास्त के उपरांत ‘प्रदोषकाल’ में दीपदान अवश्य करना चाहिए। धनतेरस को सायंकाल घर के प्रवेश द्वार के बाहर यमराज के निमिŸा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके दीपदान करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। प्रकाश की उपासना सूर्य, अग्नि और दीपक के रूप में सदा होती रही है। सूर्य भी प्राणियों को जन्म देने के लिए, उन्हें प्रकाश प्रदान करने के लिए भगवान के दक्षिण नेत्र से प्रकट हुआ। उसने अपने तेज का आधान अग्नि में किया और वह तेज अग्नि से दीपक को मिला। दीपक शब्द की व्युत्पŸिा दीप-दीप्तौ नामक धातु से है, जिसका अर्थ है चमकना, जलना, ज्योतिर्मय होना, प्रकाशित होना।

इसके अतिरिक्त और भी अनेक अर्थ हैं। प्रत्येक संप्रदाय और मजहब में दीपक का महŸव स्वीकारा गया है। लंका विजयोपरांत भी अयोध्या में घी के दीपक जलाये गये थे। इस प्रकार सभी धर्मों की प्रार्थना व उपासनाएं जुड़ी हैं। कार्तिक मास की अमावस्या घनघोर अंधकार से व्याप्त रहती है जिसमें बाधाओं-विघ्नों का आना संभव है। ये विघ्न आधिदैहिक, आधिभौतिक, आधिदैविक हैं। ये विघ्न जीवात्मा को पीड़ित करते हैं। अतः विघ्न विनाशक स्वरूप गणेश की आवश्यकता हुई। पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, आकाश इन पांच तत्वों से दीपक की दिव्यता प्रकाशित हुई है और ये ही पंचतत्व सृष्टि के उपादान-कारण भी हैं। इनमें प्रकाश होने से ही आत्मतेज की अनुभूति होती है। तेल से भरे हुए इन दीपकों के प्रकाश से, तेल (स्नेह) की गंध से विषैले कीटाणुओं का नाश होता है, वातावरण में शुद्धता व पवित्रता उत्पन्न होती है तथा चमक-दमक से स्फूर्ति और प्रसन्नता मिलती है। सभी के लिए इन दीपकों का अर्चन, वंदन और पूजन करने की छूट है।

दीपावली का यह महोत्सव एक नवीन जीवंतता का भी श्रीगणेश करता है। पुराणों के अनुसार कथा यह है कि वामनावतार में बलि के द्वारा संपूर्ण पृथ्वी के दान से संतुष्ट होकर भगवान विष्णु ने उन्हें यह वरदान दिया था कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक तीनों दिन पृथ्वी पर यमराज की प्रसन्नता के उद्देश्य से दीपदान करने वाले को यमराज की यातना नहीं भोगनी पड़ेगी तथा इन तीनों दिन दीपावली का दीपोत्सव करने वाले के घर को भगवती लक्ष्मी कभी नहीं त्यागेंगी। निर्धनता दूर करने के लिए गृहस्थजनों को अपने पूजागृह में धनतेरस की शाम से दीपावली की रात तक अखंड दीपक जलाना चाहिए। धनतेरस से भैया दूज तक घर में अखंड दीपक पांचों दिन प्रज्ज्वलित रखने से पांचों तत्व संतुलित हो जाते हैं जिससे वास्तु दोष समाप्त हो जाते हैं जिसका प्रभाव पूरे वर्ष रहता है। दीपावली वस्तुतः दीपोत्सव का पर्व है, जो भगवान विष्णु का गृहस्थ रूप है। मंत्र: ‘घृतवर्Ÿिा समायुक्तं महोतेजो महोज्वलम्। दीपं दास्यामि देवेशि’ सुप्रीतो भव सर्वदा।।’

यह मंत्र दीपक के लिए है। प्रकाश का यह तेज पंुज तो सर्व विघ्नों का नाश करने वाला गणेश ही है। गणेश शब्द में ‘ग’ शब्द का अर्थ ‘ज्ञान’, ’ण’ शब्द का अर्थ है, निर्वाण, इन दोनों शब्दों के साथ ईश को जोड़ने पर गणेश शब्द बना है। गणेश जी का एक रूप एकदंत भी है जिसमें एक शब्द बलवाचक है। दंत शब्द का अर्थ विघ्न विनाशक है। इस प्रकार गणेश जी के अनेक नाम प्रसिद्ध हैं। वेद के ‘गणानांत्वा नमो गणेभ्यों’ इस मंत्र से आदिदेव के रूप में सृष्टि में अनंत गणेशों की स्थापना हुई है। अनंत वैगणेशा: इस मंत्र के आधार पर अनंत गणेश उपासनीय बने। विघ्नकर्ता, विघ्नहर्ता गणेश के दोनों ही रूप हैं। गणेश जी वेदव्यास के 18 पुराणों के लेखक भी हैं। व्यापार के बही खातों या लेखा-जोखा की विधि ही आत्मा है जो लेखनी द्वारा ही संभव है। पुराणों में एक कथा है। सिद्धि से शुभ और बुद्धि से लाभ नाम के दो पुत्र हैं। ये दोनों पुत्र व्यापार में स्थायित्व लाते हैं। इसीलिए व्यापार का श्रीगणेश गणेश पूजन से ही आरंभ होता है।

लक्ष्मी के बारह गुण हैं लं से पृथ्वी, हं से आकाश, यं से वायु रां से अमृत का रूप है। इन स्वरूपांे के साथ-साथ लक्ष्मी का स्वरूप इस प्रकार है, हिरण्यवर्णा हरिणी सुवर्ण रजतवृजाम्। चंद्रां हिरणमयीं लक्ष्मीं जातवेदों म आवहं।। गणेश जी भगवान विष्णु जी का ही स्वरूप हैं और विष्णु जी की पत्नी का नाम है लक्ष्मी। लक्ष्मी जी के दो स्वरूप हैं, श्रीश्चते लक्ष्मींश्च पत्नयां’ इत्यादि मंत्रों में ‘श्रीं’ और ‘लक्ष्मी’ दो नाम मिलते हैं। ‘श्री’ का संबंध हाथियों और कमलों से है, लक्ष्मी का संबंध उलूक से है। हाथी ही गणेश का स्वरूप है जो ‘श्री’ की सेवा में रहता है। गणेश जी के सिर पर मोरपंख लगा हुआ है, जो भगवान कृष्ण का मुख्य चिह्न है लक्ष्मी और गणेश का संबंध वास्तव में माता और पुत्र का है। चूंकि माता लक्ष्मी निर्बाध रूप से अपने बेटे के मोह में रहती हैं इसीलिए दोनों की पूजा एक साथ होती है। दीपावली महालक्ष्मी पूजा का महापर्व है, इसलिए देवी के आवाहन, स्थापना एवं पूजन को शास्त्रोक्त मुहूर्त में किये जाने पर अत्यंत शुभफल प्राप्त होता है।

Ask a Question?

Some problems are too personal to share via a written consultation! No matter what kind of predicament it is that you face, the Talk to an Astrologer service at Future Point aims to get you out of all your misery at once.

SHARE YOUR PROBLEM, GET SOLUTIONS

  • Health

  • Family

  • Marriage

  • Career

  • Finance

  • Business

नवरात्र एवं दीपावली विशेषांक  अकतूबर 2015

फ्यूचर समाचार का यह विशेषांक देवी दुर्गा एवं धन की देवी लक्ष्मी को समर्पित है। वर्तमान भौतिकवादी युग में धन की महत्ता सर्वोपरि है। प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा अधिक से अधिक धन अर्जिक करने की होती है ताकि वह खुशहाल, समृद्ध एवं विलासिता पूर्ण जीवन व्यतीत कर सके। हालांकि ईश्वर ने हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग अनुपात में खुशी एवं धन निश्चित कर रखे हैं, किन्तु मनोनुकूल सम्पन्नता के प्रयास भी आवश्यक है। इस विशेषांक में अनेक उत्कृष्ट आलेखों का समावेश किया गया है जो आम लोगों को देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त कर सम्पन्नता अर्जित करने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। इन आलेखों में से कुछ महत्वपूर्ण आलेख इस प्रकार हैं- मां दुर्गा के विभिन्न रूप, दीपक और दीपोत्सव का पौराणिक महत्व एवं इतिहास, दीपावली का पूजन कब और कैसे करें, दीपावली के दिन किये जाने वाले धनदायक उपाय, तन्त्र साधना एक विवेचन आदि इन आलेखों के अतिरिक्त कुछ दूसरे स्थायी स्तम्भों के आलेख में समाविष्ट किये गये हैं।

सब्सक्राइब


.