ईशा का नन्हा विभोर विलक्षण प्रतिभाशाली

ईशा का नन्हा विभोर विलक्षण प्रतिभाशाली  

आज के वैज्ञानिक युग में, वैज्ञानिको ने यह साबित कर दिखाया है कि बच्चा मां के गर्भ में आते ही दुनिया की बातें सीखना शुरू कर देता है। उस पर अपनी मां की आदतों, स्वभाव, क्रिया-कलाप और आचरण का बहुत प्रभाव पड़ता है और उन बातों अथवा क्रिया-कलापों का काफी बड़ा अंश उसके स्वभाव और उसकी आदतों में भी सम्मिलित हो जाता है। हमारे प्राचीन ग्रंथ महाभारत में भी इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु ने गर्भ में ही युद्ध का ‘चक्र व्यूह’ भेदने की विद्या अपनी मां की कोख में ही सीख ली थी और इसीलिए वह कौरवों द्वारा रचे गये चक्रव्यूह को भेद पाया लेकिन चूंकि उसकी मां बीच में ही सो गई थी इसलिये वह अधूरी विद्या ही सीख पाया। इसी तथ्य का जीता जागता उदाहरण है गुड़गांव में जन्मा बच्चा विभोर जिसने महज 3 वर्ष की अवस्था में ही अपनी प्रतिभा से सबको प्रभावित कर दिया। उसकी मां ईशा एक कंप्यूटर इंजीनियर है। वैसे तो वह बहुत ही मस्तमौला टाईप और तरह-तरह के व्यंजन खाने की शौकीन है, लेकिन अपना पहला गर्भ धारण करने के पश्चात् उसने बाहर खाना बंद कर दिया था। सास-बहू के झगड़े वाले सीरियल देखने पर भी विराम लगा दिया था और वह घर का खाना ही खाना पसंद करती थी। साथ ही उसने महाभारत और रामायण के सीरियल खूब देखे और बच्चों को अच्छी शिक्षा देने वाले कार्टून सीरियल भी देखे क्योंकि वह चाहती थी कि उसका बच्चा संस्कारी हो और उसमें सभी अच्छे गुण आएं। ईशा ने शायद तब इतना नहीं सोचा होगा कि उसके इस तरह के आचरण से बच्चे पर इतना अच्छा असर पड़ेगा कि उसे तीन वर्ष की आयु में ही एक्स्ट्रा आॅर्डिनरी टैलेंट के लिये वल्र्ड रिकार्ड यूनिवर्सिटी की ओर से डाॅक्टरेट की मानद उपाधि (आॅनररी पीएच. डी.) से सम्मानित किया जाएगा। विभोर बचपन से ही लैपटाॅप, टैबलेट और टच पैड में बहुत रूचि दिखाता था। उसके मम्मी-पापा उसे खेलने के लिए टैबलेट दे देते थे तो वह बिस्तर में ही बैठा-बैठा सारे व्चमतंजपवद चलाना सीख गया था। जहां दूसरे बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, विभोर के लिए डेढ़ वर्ष की उम्र से टैबलेट और लैपटाॅप उसके पसंदीदा गैजेट्स बन गये। चूंकि ईशा कंप्यूटर इंजीनियर है और वह नौकरी करती थी उसने उसे टेबल्स (पहाड़े) की सी.डी लाकर दे दी जिसे विभोर ने बहुत जल्दी याद कर लिया और जब वह दुबारा सी. डीचलाती तो पहले से ही वह आने वाली टेबल सुनाना शुरू कर देता था। इसी तरह से उसकी प्रतिभा की पहचान हुई। अपने दूसरे खिलौने से खेलने की बजाय उसे नंबर सीखने, टेबल बोलने और तरह-तरह की शेप या मैप सीखने में बहुत इन्टरेस्ट है। खुद ही यू. ट्यूब और गूगल पर कुछ भी खोज कर वह अपनी पसंदीदा चीेज देखता रहता है। और तो और वह ईशा की स्पेलिंग भी ठीक कर देता है। नन्हा सा विभोर बहुत ही ऊर्जावान बच्चा है। वह दोनों हाथों से एक साथ लिख सकता है। उसे स्पैनिश, रोमन, हिंदी व अंग्रेजी में काउंटिंग भी आती है। वह अभी से सेकेंड क्लास तक की बुक्स को आराम से पढ़ने व लिखने में सक्षम है। उसे 200 से भी ज्यादा ऐप्स की जानकारी है। 6 मिनट 18 सेकेंड में 20 तक टेबल सुनाने के बाद उसका नाम 10 जनवरी को ‘इंडिया बुक आॅफ रिकार्ड’ में शामिल किया गया है और अब एशिया बुक आॅफ रिकार्ड में भी उसका नाम दर्ज हो गया है। ईशा के अनुसार उन्होंने उसका एडमिशन एक प्रेपरेटरी स्कूल में कराया था और जब मैडम ने ए लिखने के लिए बोला तो विभोर ने ए से बनने वाले करीब 8 वर्ड लिख दिये तो मैडम ने भी उसे आगे के क्लास में जाने को कह दिया। अब ईशा उसे स्कूल तो भेजती है पर तब जब बच्चों का खेलने व खाने का समय होता है। ईशा विभोर को एस्ट्रोनाॅट बनाना चाहती है और चाहती है कि वह नासा में काम करे। मेरी नन्हें विभोर और उसके मम्मी पापा को बहुत-बहुत शुभकामनाएं। वास्तव में विभोर भारतवर्ष का नाम स्पेस में भी ऊंचा करेगा क्योंकि उसके आकाशीय सितारे भी यही कहते हैं। हम यहां विभोर की कुंडली के साथ-साथ ईशा की कुंडली का भी विवेचन करेंगे क्योंकि ईशा ने भी विभोर को उसके एप्टीट्यूड के अनुसार सिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपने बेटे को पूरा समय देने के लिए उसने अपनी अच्छी नौकरी छोड़ दी और पूरे फोकस के साथ विभोर की परवरिश कर रही है। नन्हंे बालक विभोर की जन्मकुंडली का विश्लेषण ः- विभोर की कुंडली मिथुन लग्न की है जो बुद्धि के कारक ग्रह बुध का लग्न है। यह बुध दो केंद्रों का अधिपति होकर केंद्र भाव में स्थित होकर चार केन्द्रों में से तीन केन्द्रों को पूर्णतया प्रभावित कर रहा है। विभोर की जन्मकुंडली में जहां एक ओर बहुत से शुभ योग हैं वहीं सभी ग्रह उसके इतनी छोटी उम्र से ही प्रतिभाशाली होने का संकेत दे रहे हैं। किसी भी कुंडली में पूर्व जन्म व बुद्धि का वृत्तांत पंचम स्थान से ज्ञात होता है। विभोर की कुंडली में पंचम स्थान, पंचमेश तथा पंचम भाव का कारक ग्रह बृहस्पति सभी शुभ तथा बलवान स्थिति में हंै। पंचम से पंचम भाव का स्वामी भाग्येश शनि उच्च का वर्गोत्तमी होकर पंचम भाव में स्थित है। पंचमेश शुक्र स्वराशि में होकर उच्चस्थ चंद्रमा के साथ स्थित है तथा पंचम कारक गुरु भी उच्च सूर्य के साथ एकादश स्थान में स्थित है। इस प्रकार बुद्धि व पूर्व जन्म के कारक पंचम भाव से संबंधित सभी पक्ष व ग्रह पूर्णतया बलवान स्थिति में होकर उच्च ग्रहों से संबंध बना रहे हैं जिसके कारण इस बालक का पूर्व जन्मकृत भाग्य (प्रारब्ध) अत्यंत प्रबल है और विभोर की बुद्धि इतनी छोटी अवस्था में ही इतनी तीक्ष्ण है और उसे आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त हो रही है और आगे भी होती रहेगी विभोर की कुंडली के महत्वपूर्ण योग- बुद्धिमान योग: पंचमेश शुक्र के अपनी शुभ राशि वृषभ में शुभ ग्रह चंद्रमा के साथ होने से बुद्धिमान योग बन रहा है इसलिए विभोर अत्यंत बुद्धिमान है। धीर गुणी योग: विभोर की कुंडली में तृतीयेश सूर्य उच्च होकर बृहस्पति के साथ स्थित होकर धीर गुणी योग बना रहे हैं इसीलिए विभोर अत्यंत धीर और गंभीर है। वह अपना समय और बच्चों की तरह सिर्फ खेलने में नहीं लगाता अपितु उसे हर समय कुछ न कुछ पढ़ना और सीखना अच्छा लगता है। विमल योग: विभोर की कुंडली में द्वादश का स्वामी शुक्र द्वादश भाव में ही स्थित है तथा अशुभ ग्रह केतु से युक्त है वह अशुभ ग्रह राहु से दृष्ट है इसलिए विभोर की कुंडली में विमल योग बन रहा है जिसके फलस्वरूप विभोर गुणी, सुखी, कीर्तिवान, सर्वजन प्रिय आदि गुणों से सुशोभित है। बुद्धिप्रद योग: पंचम भाव पर गुरु की पूर्ण दृष्टि होने से बुद्धिप्रद योग बन रहा है और इसीलिए उसकी अत्यंत तीक्ष्ण बुद्धि है। वाशि योग: विभोर की कुंडली में सूर्य से बारहवें स्थान पर बुध होने से वाशि योग का निर्माण हो रहा है जिससे बालक में उत्तम स्मृति, उत्कृष्ट वाणी, ज्ञान, राज-सुख, यश, ऐश्वर्य जैसे गुण बाल्यावस्था में ही विद्यमान हैं। अनफा योग: चंद्रमा से द्वादश भाव में बृहस्पति ग्रह स्थित होने से अनफा योग घटित हो रहा है जिसके फलस्वरूप विभोर विख्यात, कीर्तियुक्त, सुंदर, सुशील निरोग आदि गुणों से परिपूर्ण है। देश-विदेश यात्रा योग यदि जन्मपत्रिका में व्ययेश पाप ग्रह से युक्त हो, व्यय भाव में कोई पाप ग्रह हो और व्यय भाव पर पाप ग्रह की दृष्टि भी हो तो देश-विदेश की यात्राओं के योग बनते हैं। विभोर की कुंडली में व्ययेश शुक्र व्यय भाव में ही पाप ग्रह केतु के साथ स्थित है तथा पाप ग्रह राहु की पूर्ण दृष्टि भी व्यय भाव पर है जिससे यह योग पूर्ण रूपेण घटित हो रहा है। इससे विभोर भविष्य में अपने ज्ञान-विज्ञान के द्वारा देश-विदेश की सम्मानित यात्राएं करेगा। विजयी एवं शत्रुनाशक योग विभोर की कुंडली में छठे भाव में राहु ग्रह स्थित है तथा उस पर शुक्र तथा चंद्रमा की दृष्टि होने से यह योग पूर्ण रूप से घटित हो रहा है। इस योग के कारण विभोर अपने कार्यों में विजयी होगा और आगे भविष्य में शत्रुओं को पराजित करने में सफल होगा। इतने सारे योगों से सुसज्जित विभोर की कुंडली में तृतीय स्थान पर स्थित मंगल उसे इतना तेजस्वी और स्फूर्तिवान बनाता है कि वह खेल-खेल में ही बड़े बच्चों के सवाल, टेबल्स और दूसरी कक्षा के पढ़ने वाले बच्चों से भी ज्यादा समझ रखता है। लग्नेश और चतुर्थेश बुध दशम भाव में बैठकर मंगल से दृष्ट होकर अत्यंत तीव्र व तकनीकी बुद्धि प्रदान कर रहे हैं। कर्म भाव पर मंगल और राहु की दृष्टि है तथा कर्मेश उच्च के गुरु के साथ स्थित होकर उच्चस्थ शनि से भी दृष्ट है अर्थात् कर्म भाव एवं कर्मेश पर सूर्य, मंगल, बुध, गुरु, शनि और राहु सभी का पूर्ण प्रभाव है। इसलिए विभोर बड़ा होकर बहुत ही निर्भीक, साहसी और बुद्धिमान के साथ-साथ उच्चस्थ आईपी. एस अधिकारी अथवा एस्ट्रोनाॅट बन सकता है। सरकार की ओर से भी विभोर को पूर्ण सहयोग व लाभ मिलने के संकेत मिल रहे हैं। आत्मकारक ग्रह गुरु उच्चस्थ सूर्य के साथ बैठकर विभोर के जीवन में आने वाली सभी दशाओं में उसे पूर्ण सहयोग व अपेक्षित लाभ प्रदान करेगा। इसमें संदेह नहीं। विभोर के जीवन में इसकी मां ईशा का विशेष योगदान रहा है। ईशा ने कंप्यूटर इंजीनियर होते हुए उसकी अच्छी परवरिश के लिए अपनी नौकरी छोड़ी और अपने संस्कारों की अमिट छाप उसे दी। चूंकि ईशा भी विभोर के विकास में पूर्ण सहयोग दे रही है इसलिए हमने ईशा की कुंडली का भी अध्ययन किया। ईशा की कुंडली में सभी ग्रह बहुत ही शुभ स्थिति में हैं। यहां संतान भाव का स्वामी शनि उच्च के होकर शुभ ग्रह गुरु के नक्षत्र विशाखा में स्थित है। संतान भाव पर किसी भी अशुभ ग्रह की दृष्टि नहीं है तथा संतान कारक गुरु स्वगृही होकर शुक्र के साथ तृतीय भाव में बैठकर भाग्य स्थान को देख रहे हैं जिसके फलस्वरूप इन्हें भाग्यशाली, यशस्वी व कीर्तिवान पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है। ईशा की कुंडली में मंगल चतुर्थ भाव में उच्चस्थ होकर रूचक नामक महापुरूष योग बना रहे हैं और उच्चस्थ शनि शश महापुरुष योग बना रहे हैं जिसके फलस्वरूप ईशा को धन, संपत्ति, प्रतिष्ठा कुशल मातृत्व, धार्मिकता के गुण प्राप्त हो रहे हैं। कार्येश चंद्रमा भी दशम भाव में स्वगृही होकर ईशा को उसके कार्य क्षेत्र में मान-सम्मान की प्राप्ति करा रहे हैं। सप्तमेश और कुटुम्बेश मंगल के सुख स्थान में उच्चस्थ होने से ये अपने परिवार में अहम् भूमिका निभाएंगी और अपने पारिवारिक मामलों में भी नियंत्रण रखने में सफल हांेगी और अपने पुत्र को उसकी काबिलियत के अनुसार उच्चतम शिखर पर ले जाने का श्रेय भी उसे अवश्य ही प्राप्त होगा। विभोर और उसकी मां ईशा की कुंडलियां आपस में बहुत ही रोचक हैं और दोनों एक दूसरे के लिए न केवल विशेष भाग्यशाली हैं अपितु दोनों का एक-दूसरे के प्रति प्रेम भाव सदा सर्वदा सर्वोपरि रहेगा। विभोर की कुंडली का लग्नेश और चतुर्थेश बुद्धि कारक बुध मातृ भाव का स्वामी दशम भाव से अपने घर को देख रहे हैं तथा पंचमेश शुक्र द्वादश भाव में मातृ कारक ग्रह (विद्या भाव का स्वामी) चंद्रमा के साथ उसकी उच्च राशि में बैठे हैं जिससे इस बालक को अपनी माता के साथ इतना लगाव है तथा उसकी माता की उसे संस्कारी एवं ज्ञानवान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका है। इसी तरह ईशा की कुंडली में भी संतान भाव का स्वामी शनि उसके लग्न भाव में अपनी उच्च राशि में स्थित है अर्थात् ईशा का पूरा प्यार और सहयोग विभोर को हमेशा मिलता रहेगा और उसकी प्रगति और उन्नति में ईशा का विशेष योगदान होगा। तीन वर्षीय विभोर की उपलब्धिया - केमिस्ट्री की पीरियोडिक टेबल, सिंबल और एटाॅमिक नंबर याद हैं। - ग्लोब पर दुनिया के छोटे व बड़े देशों की जानकारी है। - देश के सभी राज्यों व लोकेशन का ज्ञान। - सेकंड क्लास तक के थ्री डिजिट सम चुटकियों में साॅल्व। - 25 से अधिक इंडियन पर्सनैलिटी की करता है मिमिक्री। - आइन्स्टाइन की इक्वेशन, एरिया और फाॅर्मूला की भी नाॅलेज। - विभोर ने पूरा पीरियोडिक टेबल याद कर लिया है और उसने 12 मई 2015 को 5 मिनट 7 सेकंड में सभी 118 सिंबल्स की पहचान करके नया राष्ट्रीय रिकाॅर्ड बनाया है। - विभोर ने 10 मई 2015 को 112 कार ब्रांड और लोगोज को 3 मिनट 44 सेकंड में पहचान कर नया राष्ट्रीय रिकार्ड बना लिया। - 27 मार्च 2015 को विभोर ने विश्व के 196 देशों को पहचान कर राष्ट्रीय रिकाॅर्ड बनाया। - सोलर सिस्टम के सभी ग्रहों की जानकारी है। - लेवल 1 और लेवल 2 की किताबें आसानी से पढ़ सकता है। - इंग्लिश, हिंदी, रोमन और स्पैनिश में गिनती आती है। - अबेकस का प्रयोग करना जानता है। - इंग्लिश और हिंदी की लगभग 40 कविताएं कंठस्थ हैं। - 500 से अधिक कठिन शब्दों की वर्तनी (स्पेलिंग्स) लिख सकता है। - दोनों हाथों से लिख सकता है।


लाल किताब विशेषांक  सितम्बर 2015

लाल किताब ज्योतिषीय फलादेश की अन्यान्य पद्धतियों में से सर्वोत्तम एवं विश्वसनीय पद्धति है। भारत में लाल किताब का आगमन 1930 के दशक में एक भारतीय ब्रिटिश अधिकारी पं. रूप चन्द जोशी के प्रयासों के फलस्वरूप माना जाता है। पं. रूप चन्द जोशी ने फलकथन की प्राचीन विधा की खोज कर इसे पुनस्र्थापित किया। लालकिताब के महान ज्ञाताओं के द्वारा यह अनुभवसिद्ध है कि लाल किताब के द्वारा अनुशंसित उपाय अशुभ ग्रहों के अशुभत्व को समाप्त कर शुभ फलदायी परिणाम देते हैं। यही नहीं इसके अलावा हर कार्य के लिए भी सटीक एवं उपयुक्त उपायों की चर्चा लाल किताब में की गइ्र्र है जैसे विवाह, सन्तान इत्यादि। फ्यूचर समाचार के इस विशेषांक में अनेक विषयों पर विद्वान ज्योतिषियों के आलेख उद्धृत हैं। फ्यूचर समाचार के इस विशेषांक में समाविष्ट कुछ अति महत्वपूर्ण आलेख हैं: लाल किताब एक परिचय, लाल किताब के विशेष नियम, पितृ ऋण, मातृ ऋण आदि की व्याख्या एवं फलादेश, लाल किताब के उपायों के प्रकार, ऋण एवं उनके उपाय, लाल किताब उपाय- जन्मकुण्डली के बिना भी मददगार, दान, मकान एवं धर्म स्थल संबंधी नियम, घरों के अनुसार ग्रहों का प्रभाव आदि। दूसरे अन्य महत्वपूर्ण एवं प्रशंसनीय आलेखों में शामिल हैं- ईशा का नन्हा विभोर, दी फूल, पंच पक्षी इत्यादि।

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