प्रश्न: देवता दिखते क्यों नहीं? उत्तर: देवता साधारण पुरुषों के चर्म-चक्षुओं का विषय नहीं हैं। देवता को देखने के लिये ‘दिव्य नेत्र’ चाहिये। अपने ही परममित्र व सखा को जब अपना असली (देव) रूप बताने की आवश्यकता पड़ी तो भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - ‘दिव्यं ददामि ते चक्षु, पश्य मे योगमैश्वरम्’। -श्रीमद्भगवद्गीता -हे अर्जुन ! लो मैं तुम्हें दिव्य नेत्र देता हूं, इनसे मेरे ईश्वरीय योग युक्त विराट रूप को देखो। इसी प्रकार संजय को भी दिव्य-दृष्टि दी गई तो वह भी देवदर्शन कर पाया। देवता अनधिकारियों को नहीं दिखते। ऐत्तरेय ब्राह्मण में कहा गया है- न ह वा अव्रतस्य देवा हविरश्नन्ति।’ देवता ऋषियों द्वारा परिष्कृत धर्म-मार्ग पर न चलने वाले अनाड़ियों से हवि नहीं लेते। वे यम-नियम आदि व्रतों का पालन न करने वालों से प्रदत्त वस्तुएं ग्रहण नहीं करते। निरूक्त का कहना है- ‘यद् रूपं कामयते तत्तद् देवता भवति।’ - निरूक्त, अध्याय 10/श्लोक 17 भक्तों पर प्रसन्न होकर देवता जब, जैसा चाहें वैसा ही रूप बनाकर दर्शन दे सकते हैं। प्रश्न: तैंतीस करोड़ देवता का क्या रहस्य है? उत्तर: अष्टवसु, एकादश रूद्र, द्वादश आदित्य, इंद्र और प्रजापति नाम से तैंतीस संख्या वैदिक देवताओं की कही गई है। प्रत्येक देवता की विभिन्न कोटियों की दृष्टि से तैंतीस कोटि संख्या लोक-व्यवहार में प्रचलित हो गई। कुछ विद्वानों के तर्क से आकाश में तैंतीस करोड़ तारे हैं। प्रश्न: अवतारों के मूंछें क्यों नहीं होतीं राम-कृष्ण आदि अवतारों की बाजारों-मंदिरों में जितनी भी मूर्तियां या चित्र देखे जाते हैं उनमें वे सदा षोडश वर्षीय सुंदर ही दिखते हैं, भगवान राम-कृष्ण के पोते तक हो गये फिर भी उनके शरीर पर दाढ़ी-मूंछें क्यों नहीं? उत्तर: देवताओं को दिव्य शरीर की प्राप्ति होती है। उनका शरीर योगाग्निमय तेज से आलोकित होता है अतः वे सदा युवा, तेजोमय, आभामंडल से आलोकित एवं दिव्य शरीरी होते हैं। वेद कहता है- ‘‘न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः। प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम्।।’’ - श्वेताश्वेतर, अध्याय 2/श्लोक 12 देवताओं व योगियों को न रोग सताता है न वृद्धावस्था उनकी मृत्यु प्रभावित करती है। श्रीमद्भागवत्, अध्याय 2, श्लोक 15-26 में राजा परीक्षित को जब भगवान के दर्शन होते हैं तब वे उन्हें सोलह वर्ष के सुकुमार दीख पड़ते हैं, उनके चरण, हस्त, उरू, भुजाएं, कंधे और कपोल तादृश सुकुमार व कोमल जान पड़ते थे। प्रश्न: भगवान् समस्त जगत के पालक व रक्षक हैं तो फिर सभी अवतार भारत भूमि में ही क्यों? उत्तर: सौभाग्यवश छः ऋतुओं के दर्शन भारतवर्ष में ही होते हैं अन्यत्र कहीं नहीं? अन्य देशों में एक-दो ऋतुएं, तद्देशीय मनुष्यों का एक ही रंग, डबल रोटी, बिस्कुट, मांस एक ही तरह का भोजन। भगवान के अवतरण हेतु ‘याज्ञिक देश’ पुण्य पवित्र भूमि चाहिये, जहां गायें निःशंक विचरण करती हों, कृष्णसार मृग चरते हों, यज्ञ की धूम से वायुमंडल आच्छादित हो, ऐसी पुण्य-सलिला, अहिंसक, मन को आह्लादित करने वाली तपस्थली में ही ईश्वर का अवतरण होता है। जैसे सूर्य का उदय तो नित्य पूर्व दिशा में ही होता है पर वह अपने प्रखर प्रताप से उत्तर, दक्षिण और पश्चिम दिशाओं का भी घोर अंधकार दूर करता है। ठीक उसी प्रकार से श्रीमन्नारायण भगवान् के लीला व क्रीड़ास्थली तो एक मात्र भारतवर्ष ही है परंतु यहां अवतरित होकर भी अन्यान्य देशों के भक्तों की रक्षा की है। जैसे मत्स्यावतार में प्रलयंकर तूफान के समय मनु महाराज ने संसार के सभी प्राणियों की रक्षा की, जिसकी गाथा मुसलमान व ईसाई ग्रन्थों में ‘नूह की किश्ती’ के नाम से प्रख्यात है। भगवान कृष्ण ने चीन के ‘भगदत्त’ का यूनान के ‘कालयवन’ का वध किया। भगवती दुर्गा ने यूरोप के ‘बिडालाक्ष’ और अमेरिका के ‘रक्तबीज’ का संहार किया।


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