प्रश्न: वर्तमान समय का फलादेश करने के लिए योग, दशा और गोचर में से किसका महत्व अधिक है और क्यों? अपने उत्तर को उदाहरण की सहायता से प्रमाणित करें। वर्तमान समय का फलादेश करने हेतु योग, दशा और गोचर में से वैसे तो तीनों का महत्व बराबर है, परंतु पहले नंबर पर महत्वपूर्ण, विभिन्न दशाएं (महा, अंत, प्रत्यंतर, सूक्ष्म व प्राण दशा) हैं, क्योंकि जब जातक जन्म लेता है तो इसका जन्मडाटा अर्थात् दिनांक (तिथि), समय व स्थान नियत हो जाता है और उसी के अनुसार कुंडली में ग्रहों, नक्षत्रों व राशियों की स्थिति भी नियत हो जाती है। विभिन्न दशाएं जातक के जन्मकालीन ग्रह नक्षत्र के स्वामी के समय (वर्षों में) के अनुसार जातक पर विभिन्न प्रभाव देती है। विभिन्न दशाओं का अच्छा या बुरा प्रभाव विभिन्न योगों (अच्छे/बुरे) को साथ में लेकर शुभ या अशुभ परिचय देता है, जिससे ये दोनों (दशा, योग) साथ चलते हैं। इससे वर्तमान गोचर का समय (जो चंद्र कुंडली या लग्न कुंडली से निर्धारित होता है) विभिन्न दशाओं में सूक्ष्म व प्राण दशा जो एक दिन या कुछ घंटे समय की होती हैं, उसी के अनुसार प्रभाव देती हैं। कुछ उदाहरण कुंडलियों से उपरोक्त सिद्ध किया जा सकता है। मोदी जी को जन्म समय शनि की महादशा प्राप्त हुई जो 1960 तक चली। शनि, दशम भाव में शत्रुराशिगत स्थित है तथा सप्तमेश व विवाह कारक शुक्र भी दशम भाव में शत्रुराशिगत अशुभ स्थित है। अतः इनका 20-21 में विवाह हुआ पर चल नहीं पाया, अतः 1973 में पत्नी को छोड़ दिया। उस समय बुध में शुक्र का अंतर चला आ रहा था। इनका लग्न व राशि (गोचर) एक ही, कुंडली में फलादेशित होगा। आगे 2003-04 दशमेश सूर्य की महादशा में उन्हें गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया। सूर्य एकादश भाव में बुधादित्य योग बना रहा है जिस कारण दिसंबर 2013 में गुजरात के तीसरी बार मुख्यमंत्री बने। फिर बीजे. पी. पार्टी के लिए मई 2014 तक जोर-शोर से रैलियां निकालीं और भारत के प्रधानमंत्री 26/5/2014 को बने। उस समय चंद्र में गुरु का अंतर चल रहा था। गुरु ग्रह चतुर्थ भाव में शत्रु राशिगत स्थित होकर दशम भाव पर शुभ दृष्टि डाल रहा है। चंद्र ग्रह नवमेश, भाग्येश होकर लग्न में नीच का है। लेकिन साथ ही लग्नेश, लग्न में स्वगृही होकर चंद्र का नीचत्व भंग कर रहा है। मंगल ग्रह पंचमहापुरूष का ‘रूचक योग’ भी बना रहा है। अतः दोनों की युति तथा नवमेश का लग्न में स्थित होना विदेश यात्राएं करवाता है। कुल मिलाकर सबसे पहले विभिन्न दशाएं प्रभावी हैं फिर योग तथा गोचर। कुंडली नं. 2: श्री सलमान खान (फिल्म स्टार) इनका भी लग्न व राशि मकर ही है तथा गोचर का भी इससे ही फलादेश होगा। इन्हें जन्म से राहु की दशा प्राप्त हुई, जो 1982 तक चली। राहु पंचम भाव में मित्र राशिगत है तथा लग्न, चंद्र, शुक्र, मंगल पर पाप प्रभाव है। शुक्र पंचमेश भी है अतः इनकी पढ़ाई मध्यम रही। लग्न में शुक्र $ चंद्र की युति ने इन्हें सुंदर बनाया। मंगल, राहु ने जिम द्वारा व्यायाम कर शरीर को गठीला बनाया। लग्नेश शनि द्वितीय भाव में स्वगृही है, जो अच्छी वाणी, धन आदि देता है। 1982 से 98 तक गुरु की महादशा चली। गुरु में शनि की अंतर्दशा में 1987 में फिल्म उद्योग में आए। गुरु ग्रह छठे भाव में समराशिगत स्थित है। पहली फिल्म ‘बीबी हो तो ऐसी’ से फिल्मी करियर की शुरूआत की। लेकिन 1989 में शनि की साढ़ेसाती ने इन्हें रातो-रात (शनि रात्रि का कारक है) फिल्म ‘‘मैंने प्यार किया’’ से सुपर स्टार बनाया। फिर 6-7 अलग-अलग अभिनेत्रियों के साथ सुपर हिट फिल्म दी, जैसे- सनम वेवफा, बागी, साजन, हम आपके हैं कौन आदि। बीच में 4-5 साल ठप्प रहे। 1999 में ‘हम साथ-साथ हैं’ से चर्चा में आए। उस समय शनि की महादशा आरंभ हो गयी थी। जोधपुर में साथी कलाकारों के साथ चिंकारा कांड तथा मुंबई में फुटपाथ के ऊपर सो रहे गरीब मजदूरों पर नशे में धुत्त इन्होंने गाड़ी चढ़ाई, एक मरा व 2-3 घायल हुये। तब से विवादों में आये। लेकिन शनि बलवान होने से बच गये। इसके बाद ‘हम दिल दे चुके सनम, तेरे नाम, गर्व, रेड्डी, दबंग, वाॅन्टेड, एक था टाइगर, किक ने इन्हें फिर से सुपर स्टार बनाया। अभी वर्तमान में शनि की महादशा का समय चल रहा है। इनके लग्न में मंगल रूचक योग (पंचमहापुरूष) बना रहा है तथा लग्न, चंद्र, सूर्य से प्रबल मांगलिक हैं तथा शनि लग्नेश, राशीश होकर द्वितीय भाव में स्वगृही हैं। शनि ग्रह अलगाववादी ग्रह है तथा सप्तमेश चंद्र लग्न में मंगल, राहु, शुक्र से पीड़ित है। अतः इनकी शादी 50 वर्ष होने पर भी नहीं हो पाई। उच्च के मंगल व स्वगृही शनि ने अपार धन दौलत दी। बीच में दस का दम (सवाल दस करोड़ का) सोनी पर भी कर चुके हैं। शनि की महादशा 2017 तक चलेगी। तब तक सलमान 52 के हो जायेंगे। उसके पश्चात भाग्येश बुध की दशा लगेगी। बुध भाग्येश, षष्ठेश होकर द्वादश भाव में समराशिगत स्थित है लेकिन साथ ही पुनः शनि की साढ़ेसाती का दौर चलेगा। एक तरफ पुराने विवाद उभरेंगे तो दूसरी ओर लग्नेश, राशीश इन्हें चलाने में लगेगा। केवल सलमान ही एक ऐसे स्टार हैं जिन्होंने चंद्र$शुक्र (रूचक योग)$शनि (लग्नेश राशीश) के कारण अलग-अलग एवं नई अभिनेत्रियों के साथ कई फिल्में कीं। कुंडली 3: सचिन तंेदुलकर (मास्टर ब्लास्टर क्रिकेटर) इन्हें जन्म से सूर्य की महादशा प्राप्त हुई। सूर्य ग्रह नवमेश होकर पंचम खेल भाव में उच्च का स्थित है। पंचमेश उच्च मंगल, लग्नेश, राशीश व चतुर्थेश गुरु जो नीच का है, दोनों द्वितीय भाव में स्थित हैं। मंगल ने गुरु का नीचत्व भंग किया है। अतः खेल के प्रति भाग्य बली रहा है। सूर्य की महादशा में बचपन से ही हाथ में बल्ला संभाल लिया। 6 से 16 वर्ष तक चंद्र की महादशा में स्कूली खेल में बहुत सारे और काम्बली के साथ 664 रन की साझेदारी की। अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में इनका चयन चंद्र में सूर्य की अंतर्दशा में हुआ। उस समय सचिन की उम्र 16 वर्ष थी अर्थात् 1989 में। 1989 से 7 वर्ष के लिये उच्च मंगल की महादशा में अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट जगत में रनों की बरसात कर झंडे गाडे़। यह दशा 1996 तक रही। पंचम विद्या भाव में अशुभ शुक्र ने पढ़ाई में निम्न स्तर पर रखा। फिर 96 में 18 वर्ष के लिये राहु की महादशा आरंभ हुई। एक तरफ क्रिकेट था तो दूसरी ओर प्रेम। सप्तम भाव में शनि की स्थिति, राहु की दृष्टि तथा सप्तमेश नीच बुध ने इन्हें उम्र से 7 वर्ष बड़ी पत्नी अंजली से विवाह करवाया। पंचमेश व लग्नेश (मं$गु.) की द्वितीय भाव में युति, भाग्येश की पंचम भाव में शुक्र के साथ युति तथा लग्नस्थ चंद्र ने प्रेम विवाह करवाया। इनकी कुंडली में अशुभ कालसर्प योग भी है, अतः जब इन्हें राहु महादशा में 1996 में भारतीय टीम की कप्तानी सौंपी गई, तब खेल में चल नही पाये, टीम का नेतृत्व नहीं कर पाये अर्थात् राहु ग्रह ने लग्न में चंद्र को पीड़ित कर पितृ ऋण/ग्रहण योग बनाया। अतः इनकी कुंडली से स्पष्ट है कि सचिन कभी दबाव में अच्छा नहीं खेल सकते हैं। इनके नाम वनडे, टेस्ट व टी-20, बांबे राॅयल चैलेंज में कई रिकार्ड हैं। सचिन ने टेस्ट में 51 शतक व वनडे में 49 शतक अर्थात् शतकों के शतक बना चुके हैं। करीब 30-32 हजार रन अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में उनके नाम हैं। वनडे में पहला दोहरा शतक भी इनके नाम है। वल्र्डकप में भी सर्वाधिक रन का रिकार्ड (2003) उनके नाम है। 2011 का वल्र्ड कप जीतने के बाद (राहु-उच्च सूर्य) 2012 व 2013 (राहु-चंद्र) में क्रिकेट जगत से संन्यास ले लिया। इनका भी गोचर इसी कुंडली से चला। सर्वप्रथम दशाएं प्रभावी थीं, फिर योग व गोचर। इनके कारण ही इन्हें मास्टर ब्लास्टर व क्रिकेट का भगवान कहते हैं। जन्मकुंडली का ज्योतिषीय विश्लेषण जिस भी विषय के संदर्भ में किया जाता है उस विषय से संबंधित शुभाशुभ योगों की उपस्थिति/ अनुपस्थिति की जांच और उनका विश्लेषण आवश्यक है। Û जन्मकुंडली में उपस्थित योगों के घटित होने का संभावित समय दशा विश्लेषण के माध्यम से किया जाता है। Û योग से संबंधित घटना का समय निर्धारण होने के उपरांत घटना के क्रियान्वित होने का कार्य गोचर के द्वारा होता है। Û गोचर का शुभ या अशुभ होना घटना को पूरी तरह से प्रभावित करता है। यदि जन्मकुंडली में किसी शुभ घटना से संबंधित योग मौजूद हो और घटना के घटित होने का निकटतम समय भी (दशा के आधार पर) निश्चित हो तो उस घटना का घटित होना निम्न प्रकार से गोचर द्वारा प्रभावित हो सकता है या होता है। Û यदि गोचरीय ग्रह स्थिति और जन्मांग के ग्रहों की स्थिति में घनिष्ट संबंध स्थापित हो जाए तो घटना घटित हो जाती है और जातक को घटना से संबंधित फलों की प्राप्ति होती है। लेकिन यदि गोचर के ग्रहों और जन्मांग में स्थित घटना से संबंधित योग का सर्जन करने वाले ग्रहों के मध्य घनिष्ट संबंध नहीं स्थापित होता है तो घटना घटित नहीं होती है। Û अनुकूल योग व अनुकूल दशा अवधि में प्राप्त हो रहे शुभ फलों में अचानक ही बाधा उत्पन्न हो जाती है। इस बाधा का एकाएक उत्पन्न होना भी सीधे तौर पर गोचर से ही संबंध रखता है। Û ‘‘अर्थात गोचर ही मुख्य रूप से वर्तमान फलादेश को प्रभावित करता है’’ निष्कर्ष: अतः सकारात्मक योगों का जन्मकुंडली में होना, सही दशा का होना तब ही फलदायक सिद्ध होता है जब गोचर भी शुभ हो। अर्थात योग और दशा को जब तक गोचर फेवर नहीं करता तब तक फलों की प्राप्ति नहीं होती है। गोचर जिस अनुपात में शुभ या अशुभ है। उसी अनुपात में फल प्राप्ति पर प्रभाव पड़ता है। इसलिए अशुभ गोचर के प्रभाववश कभी-कभी शुभ योग अपना पूरा फल जातक को प्रदान नहीं कर पाते यानी फल का कुछ भाग ही जातक को प्राप्त होता है। बाकी नष्ट हो जाता है।


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