उदर रोग

उदर रोग  

अविनाश सिंह
व्यूस : 18961 | मार्च 2015

उदर शरीर का वह भाग या अंग है जहां से सभी रोगों की उत्पत्ति होती है। अक्सर लोग खाने-पीने का ध्यान नहीं रखते, परिणाम यह होता है कि पाचन प्रणाली गड़बड़ा जाती है जिससे मंदाग्नि, अफारा, कब्ज, जी मिचलाना, उल्टियां, पेचिश, अतिसार आदि कई प्रकार के रोग उत्पन्न होते जाते हैं जो भविष्य में किसी बड़े रोग का कारण भी बन सकते हैं।

यदि सावधानी पूर्वक संतुलित आहार लिया जाये तो पाचन प्रणाली सुचारू रूप से कार्य करेगी और हम स्वस्थ रहेंगे। उदर में पाचन प्रणाली का काय भोजन चबाने से प्रारंभ होता है। जब हम भोजन चबाते हैं तो हमारे मुंह में लार ग्रंथियों से लार निकलकर हमारे भोजन में मिल जाती है और कार्बोहाइड्रेट्स को ग्लूकोज में बदल देती है।

ग्रास नली के रास्ते भोजन अमाशय में चला जाता है। अमाशय की झिल्ली में पेप्सिन और रैनेट नामक दो रस उत्पन्न होते हैं जो भोजन के साथ मिलकर उसे शीघ्र पचाने में सहायता करते हैं। इसके पश्चात भोजन छोटी आंत के आखिर में चला जाता है। यहां भोजन के आवश्यक तत्व रक्त में मिल जाते हैं तथा भोजन का शेष भाग बड़ी आंत में चला जाता है, जहां से मूत्राशय और मलाशय द्वारा मल के रूप में शरीर से बाहर हो जाता है।


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ज्योतिषीय दृष्टिकोण: ज्योतिष के अनुसार रोग की उत्पत्ति का कारण ग्रह नक्षत्रों की खगोलीय चाल है। जितने दिन तक ग्रह-नक्षत्रों का गोचर प्रतिकूल रहेगा व्यक्ति उतने दिन तक रोगी रहेगा उसके उपरांत मुक्त हो जाएगा। जन्मकुंडली अनुसार ग्रह स्थिति व्यक्ति को होने वाले रोगों का संकेत देती है। ग्रह गोचर और महादशा के अनुसार रोग की उत्पत्ति का समय और अवधि का अनुमान लगाया जाता है।

उदर रोगों के ज्योतिषीय कारण जन्मकुंडली में सबसे अधिक महत्वपूर्ण लग्न होता है और यदि लग्न अस्वस्थ है, कमजोर है तो व्यक्ति रोगी होता है। लग्न के स्वस्थ होने का अभिप्राय लग्नेश की कुंडली में स्थिति और लग्न में बैठे ग्रहों पर निर्भर करता है। लग्नेश यदि शत्रु, अकारक से दृष्ट या युक्त हो तो कमजोर हो जाता है। इसी प्रकार यदि लग्न शत्रु या अकारक ग्रह से दृष्ट या युक्त हो तो भी लग्न कमजोर हो जाता है।

काल पुरूष की कुंडली में द्वितीय भाव जिह्ना के स्वाद का है। पंचम भाव उदर के ऊपरी भाग पाचन, अमाशय, पित्ताशय, अग्नाशय और यकृत का है। षष्ठ भाव उदर की आंतों का है। उदर रोग में लग्न के अतिरिक्त द्वितीय, पंचम और षष्ठ भाव और इनके स्वामियों की स्थिति पर विचार किया जाता है।

विभिन्न लग्नों में उदर रोग मेष लग्न: मंगल षष्ठ या अष्टम भाव में बुध से दृष्ट हो, सूर्य शनि से दृष्ट या युक्त हो, शुक्र लग्न में हो तो जातक को उदर रोग से परेशानी होती रहती है। वृष लग्न: गुरु लग्न, पंचम या षष्ठ भाव में स्थित हो और राहु या केतु ये युक्त हो, लग्नेश शुक्र अस्त होकर द्वितीय या पंचम भाव में हो। मिथुन लग्न: लग्नेश बुध अस्त होकर पंचम, षष्ठ या अष्टम भाव में हो,


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मंगल लग्न, द्वितीय या पंचम भाव में स्थित हो या दृष्टि दे तो जातक को उदर से संबंधित परेशानी होती है। कर्क लग्न: चंद्र, बुध दोनों षष्ठ भाव में हों, सूर्य पंचम भाव में राहु से युक्त या दृष्ट हो तो जातक को उदर रोग होता है। सिंह लग्न: गुरु पंचम भाव में वक्री शनि से दृष्ट हो, लग्नेश राहु/केतु से युक्त या दृष्ट हो, मंगल से पंचम या षष्ठ हो तो जातक को उदर रोग होता है।

कन्या लग्न: मंगल द्वि तीय या षष्ठ भाव में हो, बुध अस्त होकर मंगल के प्रभाव में हो, गुरु की पंचम भाव में स्थिति या दृष्टि हो तो जातक को उदर रोग होता है। तुला लग्न: पंचम या षष्ठ भाव गुरु से दृष्ट या युक्त हो, शुक्र अस्त और वक्री हो कर कुंडली में किसी भी भाव में हो तो जातक को उदर रोग होता है।

वृश्चिक लग्न: बुध लग्न में, द्वितीय भाव में, पंचम भाव, षष्ठ भाव में स्थित हो और अस्त न हो, लग्नेश मंगल राहु-केतु युक्त या दृष्ट हो तो जातक को उदर रोग होता है। धनु लग्न: शुक्र, राहु/केतु से युक्त होकर पंचम या षष्ठ भाव में हो, गुरु अस्त हो और शनि की दृष्टि हो तो जातक को उदर रोग होता है। मकर लग्न: गुरु द्वितीय भाव या षष्ठ भाव में वक्री हो और राहु/केतु से दृष्ट या युक्त हो तो जातक को उदर रोग देता है।

कुंभ लग्न: शनि अस्त हो, गुरु लग्न में पंचम भाव में, मंगल षष्ठ भाव में राहु/केतु से युक्त हो तो उदर रोग होता है। मीन: शुक्र षष्ठ भाव में, शनि द्वितीय या पंचम भाव में, चंद्र अस्त या राहु केतु से युक्त हो तो जातक को उदर से संबंधित रोग होता है। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण: आयुर्वेद के अनुसार किसी भी रोग का कारण तीन विकार हैं अर्थात् वात, पित्त, कफ का असंतुलित हो जाना। उदर रोग में भी इन विकारों पर विचार किया जाता है। वात विकार की वृद्धि से अग्नि विषम होते हैं, पित्त की वृद्धि होने से अग्नि तेज होती है; कफ वृद्धि से अग्नि मंद होती है जिससे पाचन प्रणाली प्रभावित होकर उदर रोग उत्पन्न करती है।

यदि समय रहते विकार का उपचार कर लिया जाए तो रोग से बचा जा सकता है।


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घरेलू उपचार: -अजवायन का चूर्ण और काला नमक मिलाकर गर्मपानी के साथ लेने से तुरंत पेट दर्द से आराम मिलता है। अफरा और गैस भी निकल जाता है।

- अमृतधारा की दो-तीन बूंदें बताशे में या खांड में डाल कर लेने से उदर शूल में आराम मिलता है।

-काली हरड़ के चूर्ण को गुड़ में मिलाकर खाने से भी एसीडिटी में आराम मिलता है।

- ईसबगोल की भूसी को शाम 5-6 बजे के करीब ताजे पानी या दूध के साथ लेने से अम्लता और कब्ज दूर हो जाते हैं।

- भोजन करने के बाद एक लौंग चूसने से भी पेट रोगों में आराम मिलता है।

- भोजन से आधा घंटा पहले अदरक को नमक लगाकर खाने से भूख ठीक से लगती है। हाजमा ठीक होता है। पेट दर्द, अफरा, बदहजमी, कब्ज में लाभ होता है।

- रात को सोते समय त्रिफला चूर्ण दूध के साथ लेने से कब्ज ठीक हो जाता है। रात को सोने से पहले 100 ग्राम गुलकंद दूध के साथ लेने से कब्ज दूर होता है।

-गुड़ और पीली हरड़ के चूर्ण को बराबर मात्रा में मिलाकर गोली बना कर सुबह-शाम पानी के साथ एक माह तक लेने से पाचन तंत्र सुचारू रूप से कार्य करता है। यकृत और तिल्ली ठीक होती है तथा अम्लता से राहत मिलती है।

सावधानियां:

- खाली पेट चाय न पीएं।

- प्रातः उठने के बाद कम से कम एक गिलास पानी पीएं।

- प्रातःकाल खुली हवा में भ्रमण करें और लंबी-लंबी सांस लें।

- नाश्ता हल्का और संतुलित लें। तेल की तली चीजें नाश्ते में न लें।

- भोजन में तेल, मसाले संतुलित मात्रा में इस्तेमाल करें तथा लाल मिर्च का उपयोग कम से कम करें।

- रात्रि के भोजन के पश्चात तुरंत न सोएं।

- जितनी भूख हो उससे आधी रोटी कम खाएं।

- भोजन में हरी सब्जियां अधिक से अधिक लें। - सलाद भोजन से 15-20 मिनट पूर्व खाएं न कि साथ-साथ।


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