वास्तु शास्त्र का वैदिक स्वरूप

वास्तु शास्त्र का वैदिक स्वरूप  

वैदिक काल में भवन विन्यास (निर्माण) के मुख्यतः तीन अंग माने गए हैं, यथा मुख्य द्वार, अतिथि गृह एवं शयनकक्ष। भवन की मुख्य पहचान घर के ‘मुख्य द्वार’ से होती है, जिसमें भवन की गैलरी (पौरी), आंगन आदि भी सम्मिलित होते हैं। भवन का दूसरा व महत्वपूर्ण अंग है, ‘‘अतिथि गृह’ अर्थात् बैठक, जहां आगन्तुकों को बिठाया तथा स्वागत किया जाता है। भवन का तीसरा अति महत्वपूर्ण अंग है ‘अंतःपुर; अर्थात् ‘शयन कक्ष’, जो परिवार के सदस्यों, विशेषकर स्त्रियों के लिये विशेष भाग होता है। घर या भवन के दूसरे भाग के दाहिने पाश्र्व में ‘पाकशाला’ अर्थात् ‘रसोईघर’ के निर्माण की व्यवस्था करनी चाहिए। इसके उत्तर की ओर पवित्र स्थान अर्थात् देवगृह या पूजा-पाठ का कक्ष होता है। वैदिक कालीन भवन निर्माण में अत्यधिक सुगमता और सादगी होती थी। भारतीय वाङ्मय के अनुसार विश्वकर्मा को ही वास्तुशास्त्र का आचार्य माना जाता है। दक्षिण भारतीय भाषाओं में ‘समरांगण सूत्रधार’ नामक एक ग्रंथ है, जो विश्वकर्मा के कर्मठ ‘वास्तुविद्’ होने का प्रमाण देता है। वैदिक युग में ही ‘सिंहल द्वीप’ में यक्षाधिपति कुबेर (रावण का भाई) द्वारा बसाई गई स्वर्णनगरी ‘लंका’ थी जिस पर बाद में ‘रावण’ का अधिकार हो गया। सिंहल द्वीप की स्वर्णनगरी में जिस वास्तु कला का प्रदर्शन हुआ था, वह भारतीय उपमहाद्वीप का एक जीवन्त उदाहरण है। यद्यपि आज उस स्वर्णमयी लंका के अवशेष भी नहीं, लेकिन दक्षिण भारत के मंदिर और देवालय आदि सब वैदिक कालीन अनुकृतियां हैं। देवशिल्पी विश्वकर्मा ने अनेक देवपुर बनाए थे, जिनमें श्रीकृष्ण की द्वारिका का निर्माण एक जीवन्त उदाहरण है। द्वारिका गुजरात के समुद्र-तट से लगी हुई एक वैदिक कालीन स्वर्ण-नगरी थी। देवशिल्पी विश्वकर्मा ने ही वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों की रचना की थी। उन्होंने ही इस बात का उल्लेख किया था कि ‘वास्तु शास्त्री’ को ज्ञानी व विद्वान होना चाहिए। उसे भूगोल, सामुद्रिक गणित (ज्योतिष), दिशा, ग्रह-नक्षत्र एवं छंदों का ज्ञान होना चाहिये। आज भी भारत में देवशिल्पी विश्वकर्मा की जयंती धूमधाम से मनाई जाती है। वैदिक कालीन भवन-निर्माण एवं सामग्री ऋग्वेद आदि ग्रंथों में दुर्ग एवं प्रासादों (राज भवन) आदि के निर्माण में धातुओं, जैसे-सोना, चांदी, तांबा, लोहा आदि के अतिरिक्त शिलाखंडों, मूल्यवान-मजबूत लकड़ियों - जैसे-देवदार, शीशम, साल, चंदन आदि बांस, घास-फूंस, पत्तों आदि का प्रयोग किया जाता था। उपनिषद् एवं अन्य ग्रंथों में लिखा है कि गांवों के घर वर्गाकार एवं आयताकार होते थे। वैदिक स्थापत्य कला की झलक बौद्धकालीन स्तूपों में मिलती है। कम आबादी के क्षेत्रों को ग्राम अर्थात् गांव तथा अधिक आबादी के क्षेत्रों को ‘पुर’ कहा जाता था। ‘पुर’ शब्द का अर्थ नगर से भी लिया जाता है। ‘पुर’ के अंदर ही दुर्ग, गढ़ और प्रासाद हुआ करते थे। ‘पुर’ के अंदर किसी प्रकार की बस्ती, मोहल्ला या आवासीय काॅलोनियों का स्पष्ट उल्लेख तो नहीं मिलता है लेकिन उस काल के दुर्ग और गढ़ जहां भी पाए जाते थे, उसके आस-पास उपनगरीय आवास के लिए बस्तियां आदि बसाई जाती थीं। पूर्व में बाहरी आक्रमण से सुरक्षा के लिए नगर के चारों ओर विशाल दीवार बनाई जाती थी ताकि शत्रु के हमले के दौरान इन दीवारों के परकोटे से उन पर आक्रमण किया जा सके। उपनगरीय दीवार का ठोस प्रमाण आज भी चीन की वह अभेद्य दीवार है, जो आज भी वास्तुविदों को चकित कर रही है। वैदिक युग से आज तक के युग में प्रवेश करने तक वास्तुशास्त्र ने अनेक आयाम देख लिए हैं किंतु वास्तु शास्त्र की प्राचीन परिकल्पना अब भी भारत के गांवों या आदिवासी क्षेत्रों में बहुतायत देखने को मिल जाती हैं, जहां मिट्टी, पत्थर, घास-फूस, लकड़ियों, बांसों आदि से घरों का निर्माण किया जाता है। अथर्ववेद में तथा अनेक ‘ब्राह्मण ग्रंथों’ में गृह का अर्थ निवास के रूप में प्रयोग हुआ है। सिंधु घाटी की सभ्यता में जो गृह-आकार देखने को मिले हैं उनमें मिट्टी, ईंट व चूने का प्रयोग किया गया है। सिंधु घाटी की सभ्यता में छत आदि को पाटने में लकड़ी और घास-फूस का प्रयोग किया जाता था जो कालान्तर में मिट्टी से दबने के कारण नष्ट हो गया। ऐसे घरों की रचना गोल, चैकोर अथवा आयताकार होती थी, छत सपाट होती थी। दीवारों को सफेद मिट्टी या चूने से पोता जाता था। घर में बना आंगन व फर्श भी कठोर मिट्टी व चूने का बना होता था। वैदिक कालीन घर अनेक कमरों से युक्त होते थे, जिनमें एक साथ कई परिवार रह सकते थे। दुमंजिला-तिमंजिला भवनों का उल्लेख भी उस समय मिलता है। घर के आंगन के साथ पशुओं का बाड़ा भी होता था जबकि गृहों में भूतल पर पशुशाला और अश्वशाला होती थी। ऊपरी मंजिल में आवासीय कक्ष बने होते थे। आवासीय प्रकोष्ठ में बने पशुओं के बाड़े को गोठ कहा जाता था। आज भी उत्तराखंड, हिमाचल और कश्मीर में मकान के भूतल पर पशुओं के लिए गोठ बनाए जाते हैं तथा पहली मंजिल पर रहने के कमरे बनाए जाते हैं। पर्वतीय वास्तुकला में आज भी ‘वैदिक कालीन’ गृह-निर्माण की परंपरा जीवित है।


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