औद्धोगिक प्रतिष्ठानों में वास्तु का उपयोग

औद्धोगिक प्रतिष्ठानों में वास्तु का उपयोग  

ओद्धोगिक प्रतिष्ठानों में वास्तु का उपयोग वास्तुदोष जिस भवन में स्थान बना लेते हैं उस पर सदैव दरिद्रता की छाया और क्लेश का वातावरण बना रहता है। सुख दरू भागते हैं तथा लक्ष्मी का प्रवेश बाधित होता है। अर्थात समस्याएं निरंतर आती रहती हैं। बड़े-बड़े महलों में विषाद तथा झोंपडियों में उल्लास का वातावरण वास्तु के कारण ही होता है। इसका एकमेव कारण यह है कि घास-फूस की झोंपड़ी वास्तु सिद्ध ांत के अनुसार बनी होती है। जबकि करोड़ो रुपयों की इमारत वास्तुदोषों से युक्त रहती है। ‘वास्तु’ शब्द संस्कृत की ‘वस’ धातु से बना है जिसका अर्थ है सुखमय जीवन जीना या आनंदपूर्वक निवास करना। वास्तु शास्त्र हमें आकांक्षाओं और वास्तविकताओं के अनुरूप जीवन जीने की प्रेरणा देता है। प्रत्येक वस्तु, चाहे वह सजीव हो या निर्जीव, का सही ढंग से रखरखाव ही वास्तु शास्त्र है। हर आम आदमी को यह पता होना चाहिए कि कौन सी वस्तु कहां स्थापित करनी है। अगर हम वास्तु शास्त्र के दिशा-निर्देशों पर चलें तो खुशहाल जीवन जी सकते हैं। अगर किसी भवन या भूमि में वास्तुदोष हों तो उन्हें उपाय द्वारा ठीक किया जा सकता है। वास्तु अठारह प्रकार के होते हैं- पितामह वास्तु, सुपथ वास्तु, दीर्घायु वास्तु, पुण्यक वास्तु, अपथ वास्तु, रोगकर वास्तु, अर्गल वास्तु, श्मशान वास्तु, श्येनक वास्तु, स्वमुख वास्तु, ब्रह्म वास्तु, स्थावर वास्तु, स्थापित वास्तु, शाण्डुल वास्तु, सुस्थान वास्तु, सुतल वास्तु, चर वास्तु, और श्वमुख वास्तु। ये वास्तु भी विभिन्न स्थितियों के कारण निर्मित होते हैं तथा अपना शुभ-अशुभ प्रभाव मानव पर डालते हैं। औद्योगिक भवन बनाने से पहले भूमि का परीक्षण करना चाहिए। इसके लिए सर्वप्रथम भूखंड के मध्य एक फुट गहरा गड्ढा खोदें और उसे पानी से पूरी तरह भर दें। चैबीस घंटे बाद उस गड्ढे में पानी की स्थिति देखनी चाहिए। यदि पानी पूर्ण रूप से भरा हो या सिर्फ थोड़ा सा कम हुआ हो तो वह भूमि अति शुभफलदायी होती है। यदि जल आधा रह जाए तो भूखंड मध्यम फलदायी होता है। यदि जल पूरी होटल एवं रेस्टोरेंट का प्रवेश द्वार तरह से सूख जाए और भूमि में दरारें पड़ जाएं तो भूमि अनिष्टकारी होती है। इस तरह की भूमि पर किसी भी तरह का भवन बना कर रहना विनाशकारी होता है। आवास बनाते समय गृह वास्तु का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि आवास में कौन सी चीज किस जगह और दिशा में बनानी चाहिए। ऐसा करने से घर में सुख संपन्नता, आती है और घर के सदस्य निरोग रहते हैं। आवासीय भवन में कक्षों के निर्माण से पहले कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को ध्यान में रखना चाहिए ताकि निर्माण प्रक्रिया के दौरान या उसके बाद समस्या खड़ी न हो। सबसे पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भूखंड वास्तु नियमों पर आधारित तथा दोष रहित हो। विधानपूर्वक भूमि शोधन संस्कार विधि- पूरा किया गया हो। किसी भी भूखंड के संपूर्ण क्षेत्रफल का 60 से 80 प्रतिशत भाग ही निर्माण कार्य में उपयोग में लाना चाहिए। भूखंड के बीचोबीच भूमि स्वामी के कद की गहराई का गड्ढा खोदकर उसकी मिट्टी दूर फेंकवा दें। उस मिट्टी का निर्माण कार्य के लिए कदापि उपयोग नहीं करना चाहिए। यदि धन के अभाव के कारण भवन निर्माण का कार्य चरणबद्ध रूप से करना हो तो सर्वप्रथम दक्षिण या पश्चिम दिशा में कार्य प्रारंभ करें। तत्पश्चात अन्य दिशाओं में निर्माण कार्य शुरू कराएं। मुख्य भवन का निर्माण कार्य प्रारंभ करने से पहले भूखंड की सीमाओं पर चारदीवारी का निर्माण करा द।ंे भवन निर्माण की भूि म का े पाटकर उसे समतल कर देना चाहिए। यदि दो या दो से अधिक मंजिला भवन निर्माण की योजना हो तो पूर्व और उत्तर में भवन की ऊंचाई दक्षिण तथा पश्चिम की अपेक्षा कम रखें। नींव खुदाई और शिलान्यास का कार्य किसी श्रेष्ठ ज्योतिषी से पूछकर शुभ मुहूर्त में किया जाना चाहिए। अन्य दिशाओं की तुलना में उत्तर और पूर्व में खिड़कियों तथा दरवाजा ंे की सख्ं या अधिक रख।ंे यदि संभव हो तो इनकी संख्या सम होनी चाहिए जैसे 2-4-6-8 इत्यादि। उद्योगों में वास्तु शास्त्र का उपयोग: जिस प्रकार आवासीय भवन निर्माण में वास्तु शास्त्र का योगदान है उसी प्रकार औद्योगिक प्रतिष्ठानों के निर्माण में भी इसकी व्यापक उपयोगिता है। विभिन्न उद्योगों होटल, रेस्तरां, कल-करखाने, विश्वविद्यालय, स्कूल, काॅलेज आदि का अपना अलग महत्व है। अतएव इनका प्रारूप भी वास्तु शास्त्र के सिद्ध ांतों का पालन करके तैयार किया जाए तो अनेक शुभ फल मिलते हैं। औद्योगिक क्षेत्र में आने से पूर्व ही व्यक्ति को ग्रह नक्षत्र के बारे में सही जानकारी हासिल करना जरूरी होता है। ऐसे में उत्पादन कार्य प्रभावित होता है। घाटा हो सकता है, अथवा कोई अन्य परेशानी व्यक्ति को घेर सकती है। इसलिए किसी भी प्रकार का उद्योग लगाने के लिए सबसे पहले उपयुक्त भूमि का चुनाव, मशीनों तथा प्रौद्योगिक सामग्री का चयन करना भी आवश्यक होता है। औद्योगिक प्रतिष्ठान की भूमि श्रेष्ठ होनी चाहिए, शुष्क बंजर तथा कटी-फटी भूमि किसी भी प्रकार से व्यवसाय के लिए उपयुक्त नहीं होती है। जलीय भूमि श्रेष्ठ होती है क्योंकि उसमें पानी जल्दी ही सुलभ हो जाता है। शुभ भूखंड: जिस प्रकार आवासीय भवन के लिए शुभ-अशुभ भूखंड के बारे में जानकारी प्राप्त करना बहुत आवश्यक है उसी प्रकार उद्योग आदि के लिए भी भूखंडों के आकार प्रकार की एक खास भूमिका होती है। समतल, मैदानी एवं उपजाऊ भूमि सभी प्रकार की फसल के लिए उपयुक्त होती है। यदि खरीदा गया भूखंड किसी मृत व्यक्ति का हो तो भू-स्वामी को ज्योतिष मंत्रों द्वारा पहले उस जगह की शुद्धि करा लेनी चाहिए। किसी भी तरह की फैक्ट्री या औद्योगिक प्रतिष्ठान स्थापित करने के लिए निम्न प्रकार के भूखंड सर्वोत्तम होते हैं। वर्गाकार भूखंड: जिसकी चारों भुजाएं बराबर हों, वह भूमि शुभ होती है। आयताकार भूखंड: ऐसा भूखंड भी, जिसकी आमने सामने भुजाएं बराबर होती हैं, शुभ माना जाता है। सिंहमुखी भूखंड: जो भूखंड आगे की ओर शेर के मंुह जैसा होता है तथा समान लंबाई-चैड़ाई का नहीं होता, वह भी शुभ होता है। षट्कोणीय भूखंड: छः समान कोणों में विभाजित भूखंड भी अत्यंत शुभ होता है। ईशान कोण का भूखंड: जिसका ईशान कोण बढ़ा हुआ हो वह भूखंड भी शुभ माना जाता है। ऊपर वर्णित भूखंडों के अतिरिक्त कोई भी भूखंड उद्योगों आदि के लिए शुभ नहीं होता है। भूखंड की स्थिति: किसी भी उद्योग के समक्ष बड़े-बड़े वृक्ष, मंदिर, सार्वजनिक स्कूल, काॅलेज, अस्पताल आदि नहीं होने चाहिए। यदि औद्योगिक क्षेत्र का मार्ग पूर्व या उत्तर दिशा की ओर जाता हो तो वह अति शुभ होता है। पश्चिम की ओर जाने वाला मार्ग मध्यम और दक्षिण की ओर जाने वाला मार्ग अशुभ होता है। यदि भूखंड के चारों ओर मार्ग हो, तो वह सबसे उत्तम होता है। विभिन्न प्रकार के कक्ष: औद्योगिक प्रतिष्ठानों के कार्यकलाप के अनुसार विभिन्न प्रकार के कक्ष आदि बनाए जाते हैं। इनमें से कुछ कक्ष प्रायः सभी औद्योगिक प्रतिष्ठानों में होते हैं। आॅफिस: प्रत्येक प्रकार के फर्म अथवा फैक्ट्री आदि के लिए आॅफिस की जरूरत रहती है क्योंकि श्रमिकों या कर्मचारियों के कार्य का मूल्यांकन तथा लेखा-जोखा दफ्तर में ही किया जाता है। उत्पादन में तकनीकी आवश्यकता, बिजली तथा पानी की आपूर्ति आदि आवश्यकताएं रहती हैं जो कार्यालय द्वारा ही पूरी की जाती हैं। फैक्ट्री परिसर में कार्यालय का ईशान कोण में होना सर्वोत्तम माना गया है। कार्यालय कक्ष को हमेशा वर्गाकार में रखना चाहिए। यदि उसका द्वार उत्तर की ओर हो तो सोने पर सुहागा होता है। कार्यालय कक्ष में तिजोरी एवं फाइलें आदि रखने की अलमारी भी उत्तर दिशा की ओर होनी चाहिए। कर्मचारी उत्तर या पूर्व दिशा में ही बैठें। श्रमिकों के लिए कक्ष: फैक्ट्री के श्रमिकों का कक्ष अलग होना चाहिए ताकि वे सही ढंग से रह सकें। उसमें जनरेटर, मोटर तथा बिजली के सामान आदि नहीं रखे जाने चाहिए। यदि ऐसा हो तो यह बहुत घातक होता है। अतः मशीनरी सामान को अलग कक्ष में रखना चाहिए। माल गोदाम: फैक्ट्री में कच्चे माल का भंडारण हमेशा दक्षिण-पूर्व दिशा अर्थात आग्नेय कोण में करना चाहिए। बना हुआ माल उत्तर-पश्चिम दिशा अर्थात वायव्य कोण में रखना चाहिए। कैश बाॅक्स: कैश बाॅक्स या तिजोरी में कुबेर यंत्र रखने से वह खाली नहीं रहती। ऐसे कैश-बाॅक्स को उत्तर दिशा में लगाना शुभ होता है। विद्युत सामग्री के लिए स्थान ः फैक्ट्री में जनरेटर, ए. सी., बाॅयलर, मीटर बोर्ड, गैस बर्नर, हीटर आदि ज्वलनशील सामग्री हमेशा आग्नेय कोण में ही रखनी चाहिए। पूजा स्थल: फैक्ट्री का पूजा स्थल ईशान कोण में होना चाहिए लेकिन प्रतिमा आदि का मुख पश्चिम या दक्षिण दिशा की ओर रखना चाहिए। पूजा करते समय व्यक्ति पूर्वाभिमुख हो। पूजा स्थल पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इंद्र, सूर्य एवं कार्तिकेय आदि की मूर्तियों का मुंह पूर्व अथवा पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए। परंतु हनुमान जी का मुंह र्नैत्य की ओर रखना चाहिए। प्रशासनिक कक्ष: फैक्ट्री में मुख्य महाप्रबंधक का कक्ष र्नैत्य, पश्चिम या दक्षिण दिशा में होना शुभ होता है। छोटे अधिकारियों के कक्ष ः फैक्ट्री के छोटे अधिकारियों का कक्ष उत्तर एवं पूर्व में रखना शुभ माना जाता है। स्वागत कक्ष: स्वागत कक्ष की व्यवस्था ईशान कोण में करना शुभ होता है। इसे आग्नेय कोण में कभी भी नहीं बनाना चाहिए क्योंकि इससे आगंतुकों या संरक्षकों के मन में उत्तेजना उत्पन्न हो सकती है जिससे वे सही तरह से बात करने में असमर्थ हो सकते हैं।



वास्तु विशेषांक   दिसम्बर 2007

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