शारदीय नवरात्र एवं पंच पर्व दीपावली के शुभ मुहूर्त

शारदीय नवरात्र एवं पंच पर्व दीपावली के शुभ मुहूर्त  

व्यूस : 5072 | अकतूबर 2008
शारदीय नवरात्र एवं पंच पर्व दीपावली के शुभ मुहूर्त इस वर्ष शारदीय नवरात्र का आरंभ दिनांक 30 सितंबर 2008, मंगलवार से हो रहा है। भारतवर्ष में नवरात्र का बड़ा महत्व है। शक्ति की उपासना करने वाले शाक्तों के लिए तो यह अवधि बहुत महत्वपूर्ण होती है। जनसामान्य के लिए भी नवरात्र में आनंद, उत्सव और उपासना के सम्मिलित अवसर होते हैं। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से वासंती एवं आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शारदीय नवरात्र का प्रारंभ होता है। शारदीय नवरात्र भारतवर्ष में अधिक प्रचलित है। शक्ति की दुर्गा के रूप में उपासना की जाती है जो दुर्गतिनाशिनी और भोग एवं मोक्षप्रदा हैं। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को कलशस्थापन के साथ ही शारदीय नवरात्र का प्रारंभ होता है और नौ दिनों तक नवदुर्गाओं की उपासना की जाती है। महानवमी व्रत (8 अक्तूबर): आश्विन शुक्ल नवमी को महानवमी कहते हैं। इस दिन नवरात्र व्रत की भी समाप्ति होती है। यह तिथि सिद्धिदात्री मानी जाती है। इस दिन मां भगवती दुर्गा की श्रद्धा एवं विश्वासपूर्वक विशेष पूजा, भक्ति, यज्ञ, आराधना, व्रत, आदि करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। विजयादशमी विजयादशमी या दशहरा का पर्व इस वर्ष 9 अक्तूबर 2008 को है। नवरात्र की समाप्ति के बाद देवी को इस दिन अपराजिता के रूप में देखा जाता है। विजयादशमी का दिन एक महान पर्व एवं उत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह दिन स्वयंसिद्ध मुहूर्त के रूप में अत्यधिक प्रशस्त है। विजयादशमी को किसी भी कार्य के लिए मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती है। विजयादशमी का पर्व आश्विन शुक्ल दशमी के दिन होता है। दशमी तिथि के साथ जिस दिन श्रवण नक्षत्र का योग हो, उसी दिन विजयादशमी होती है। श्रवण नक्षत्र युक्त सूर्योदय व्यापिनी विजयादशमी सर्वश्रेष्ठ होती है। दशमी के दिन सायंकाल के समय विजयपर्व होता है। यह पर्व धर्म की अधर्म पर विजय का प्रतीक है। विजयादशमी के दिन अस्त्र-शस्त्रों की पूजा भी की जाती है। इस दिन शमी एवं अपराजिता की पूजा तथा नीलकंठ दर्शन करने का भी विधान है। शरद पूर्णिमा 14 अक्तूबर 2008 को आश्विन पूर्णिमा या शरद पूर्णिमा है। शरद पूर्णिमा का व्रत महापुण्यफलदायी होता है। यह व्रत करने से दीर्घ आयु और आरोग्य की प्राप्ति होती है। अर्द्ध रात्रि के समय चंद्र का पूजन करके दूध में बनी खीर में घृत तथा खांड मिलाकर चंद्र के प्रकाश में रखें, फिर उसे भगवान को अर्पित करके दूसरे दिन प्रातः काल खाएं। इससे शारीरिक एवं मानसिक बल में वृद्धि होगी। कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा को मध्य रात्रि में चंद्र संसार की दिव्य औषधियों पर अमृत वर्षा करते हैं। इस दिन स्नान और दान करने का भी विधान है। कार्तिक स्नान, व्रत, यम नियमादि का आरंभ इसी दिन से हो जाता है। कार्तिक में दीपदान करने का भी विधान है। करवा चैथ 17 अक्तूबर 2008 को करवा चैथ का व्रत है। यह व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी को किया जाता है। इस दिन स्त्रियां पूरे दिन व्रत रखकर चंद्र के दर्शन करके अघ्र्य देकर व्रत पूर्ण करती हैं। हिंदू धर्म-संस्कृति में इस व्रत की सर्वत्र मान्यता है। सुहागिन एवं पतिव्रता स्त्रियां अपने मांगल्य, पति की लंबी आयु एवं समृद्धि के लिए यह कठिन व्रत रखती हैं। अहोई अष्टमी व्रत यह व्रत 21 अक्तूबर 2008 को कार्तिक कृष्ण अष्टमी तिथि को मनाया जाएगा। यह व्रत विशेष रूप से पुत्र की कामना के लिए किया जाता है। इस व्रत के दिन शिव एवं पार्वती का षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है। इस व्रत को विधिपूर्वक करने से मनोवांछित संतान की प्राप्ति होती है। धनतेरस धनत्रयोदशी या धनतेरस का पर्व इस बार 26 अक्तूबर को मनाया जाएगा। कार्तिक कृष्णपक्ष त्रयोदशी को धन्वन्तरि जयंती और धनत्रयोदशी दोनों ही मनाने का विधान है। इस दिन घर में नई चीज खासकर बर्तन, सोना-चांदी खरीद कर लाने का विधान एवं परंपरा है। इस दिन धन का अपव्यय नहीं किया जाता तथा किसी को उधार भी नहीं दिया जाता है। इसलिए कुछ लोग खासकर व्यापार में लेन-देन करने से भी बचते हैं। मान्यता है कि धनतेरस के दिन धन का अपव्यय रोकने से अगले वर्ष धन का संचय होता है। इस दिन प्रदोषकाल में घर के बाहर यम के लिए दीपदान करना चाहिए। ऐसा करने से घर के सदस्यों को अकालमृत्यु का भय नहीं रहता है। इस दिन आयुर्वेद के प्रवर्तक धन्वन्तरि की जयंती भी मनाई जाती है। नरक चतुर्दशी कार्तिक कृष्णपक्ष चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी या नरक चैदस के रूप में मनाने की परंपरा है। इस बार यह पर्व 27 अक्तूबर को मनाया जाएगा। कुछ जगहों पर यह पर्व छोटी दीपावली के रूप में तथा अधिकांश स्थानों पर हनुमान जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन कुबेर की भी पूजा की जाती है। इस तिथि को रूप चैदस के रूप में भी मनाने की परंपरा है। प्रातःकाल सूर्योदय से पहले उठकर तुंबी (लौकी) को सिर से घुमाने के बाद स्नान करने से रूप और सौंदर्य बना रहता है तथा लोग नरकगामी होने से भी बच जाते हैं। यह भी मान्यता है कि भगवान ने इसी दिन वामन के रूप में अवतार लिया था। इस दिन दान आदि करने से लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। इस दिन निशामुखी वेला में दीपदान भी करना चाहिए। दीपावली हिंदुओं के लिए दीपावली का अत्यधिक महत्व है। वैसे पूरे भारत वर्ष में और अन्य देशों में भी जहां भारतीय मूल के लोग हंै, यह पर्व सभी संप्रदायों एवं धर्मों को मानने वालों के द्वारा हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ लक्ष्मी एवं गणेश का पूजन करते हैं। इस वर्ष दीपावली का पवित्र त्यौहार 28 अक्तूबर मंगलवार, चित्रा और स्वाति नक्षत्र काल में मनाया जाएगा। अमावस्या एवं मंगलवार का योग होने से दीपावली के मुहूर्त में मंत्र जप और सिद्धि, तंत्र साधना आदि के लिए विशेष रूप से सिद्धिदायक समय रहेगा। दीपावली के दिन प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्वच्छ अथवा नवीन वस्त्र धारण करें। घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें तथा मन में भी स्वच्छ एवं पवित्र विचारों को धारण करें। दीपावली की रात्रि को महानिशीथ काल की संज्ञा दी गई है। तंत्र की साधना, लक्ष्मी एवं काली पूजा के लिए इस रात्रि से बढ़कर कोई भी समय नहीं होता। अतः साधक एवं भक्त लोग इस रात्रि की प्रतीक्षा में रहते हैं एवं पूजा और उपासना में पूरे मनोयोग से सम्मिलित होते हैं। इस दिन सभी घरों, दुकानों एवं व्यापारिक प्रतिष्ठानों में महालक्ष्मी का पूजन अवश्य होता है। व्यापारी लोग खाता-बही, तिजोरी एवं तुला की पूजा भी करते हैं। प्रत्येक स्थान को दीप जलाकर प्रकाशित किया जाता है, क्योंकि यह प्रकाशपर्व भी है। इस दिन अधीनस्थ कर्मचारी, सेवकगण एवं अतिथि जनों का निश्छल भाव से सत्कार करते हुए उपहार व मिष्टान्न आदि भेंट करें। दीपावली के दिन लक्ष्मी की पूजा करने से उनकी कृपा अवश्य प्राप्त होती है और भक्तों एवं साधकों को धन-समृद्धि मिलती है। लक्ष्मी की पूजा के लिए सायंकाल में वृषभ एवं निशीथ काल में सिंह लग्न अधिक प्रशस्त माना गया है, क्योंकि शास्त्रकारों के अनुसार लक्ष्मी की पूजा के लिए स्थिर लग्न ही फलदायी होता है। दीपावली का पूजन मुहूर्त दीपावली में लक्ष्मी-गणेश का पूजन शुभ मुहूर्त में ही करें क्योंकि शुभ मुहूर्त मंें पूजा-पाठ आदि करना अधिक लाभदायक एवं कल्याणकारी होता है। पूजन मुहूर्त के लिए प्रदोष काल, स्थिर लग्न अधिक प्रशस्त रहेगा। प्रदोष काल-स्थानीय सूर्यास्त काल के बाद से 2 घंटा 40 मिनट तक का समय प्रदोष काल होता है। इस समय अवधि में लक्ष्मी-गणेश जी का पूजन करें। स्थिर लग्न, वृष एवं सिंह लग्न में भी पूजन करना शुभदायक रहेगा। रात्रि 19 बजकर 17 मिनट से रात्रि 20 बजकर 55 मिनट तक लाभ की चैघड़िया तथा उसके बाद 22 बजकर 34 मिनट से 24 बजकर 11 मिनट तक शुभ चैघड़िया मुहूर्त रहेगा। इस समय अवधि में कुबेर पूजन, महालक्ष्मी पूजन, श्रीसूक्त, लक्ष्मी सूक्त, लक्ष्मी सतनाम आदि का पाठ और मंत्र जपादि करना सिद्धिप्रद रहेगा। सुबह 4 बजकर 45 मिनट तक अमावस्या रहेगी। इस समय अवधि तक साधकजन यंत्र पूजन, मंत्र जप, पूजा, हवन आदि क्रियाओं को संपादन करके अभीष्ट प्राप्त कर सकते हैं। गोवर्धन पूजा 29 अक्तूबर 2008 को कार्तिक शुक्लपक्ष प्रतिपदा के दिन गोवर्धन पूजा तथा अन्नकूट का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन व्रज में गोवर्धन पूजा एवं परिक्रमा का विधान है। लोग अपने गोधन की पूजा करते हैं एवं गोवंश के संवर्धन का प्रण लेते हैं। भाईदूज दिनांक 30 अक्तूबर 2008 कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को भ्रातृद्वितीया या यमद्वितीया के रूप में मनाने का रिवाज है। इसे भाई दूज भी कहा जाता है। इस दिन यमुना में स्नान, दीपदान आदि का महत्व है। इस दिन बहनें भाइयों के दीर्घजीवन के लिए यम की पूजा करती हैं और व्रत रखती हैं। जो भाई इस दिन अपनी बहन से स्नेह और प्रसन्नता से मिलता है, उसके घर भोजन करता है, उसे यम के भय से मुक्ति मिलती है। भाइयों का बहन के घर भोजन करने का बहुत माहात्म्य है। आश्विन शुक्लपक्ष एवं कार्तिक मास व्रत पर्वों आदि की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। कार्तिक मास में प्रातः गंगास्नान, गंगातटवास एवं दीपदान का भी बड़ा माहात्म्य है।

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दीपावली विशेषांक  अकतूबर 2008

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