केदारनाथ

केदारनाथ  

केदारनाथ केदारनाथ की बड़ी महिमा है। उत्तराखंड में बदरीनाथ और केदार नाथ-ये 2 प्रधान तीर्थ हैं, दोनों के दर्शनों का बड़ा माहात्म्य है। केदारनाथ के संबंध में लिखा है कि जो व्यक्ति केदारेश्वर के दर्शन किये बिना बदरीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल जाती है: अकृत्वा दर्शनं बश्य! केदारस्याघनाशिनः। यो गच्छेद् बदरींतस्य यात्रा निष्फलतां ब्रजेत्।। और केदारेश्वरसहित नर-नारायण मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों के नाशपूर्वक जीवन्मुक्ति की प्राप्ति बतलाया गया है। तस्यैव रूपं द्दष्ट्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते। जीवन्मुको भवेत् सोऽपि यो गतो बदरीवने।। दृष्ट्वा रूपं नरस्यैव तथा नारायणस्य च। केदारेश्वरनाम्नश्च मुक्तिभागी न संशयः।। इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास संक्षेप में यह है कि हिमालय के केदार शृंग पर विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न हो कर भगवान् शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में वहां सदा वास करने का वर प्रदान किया। केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक शृंग पर अवस्थित हंै। शिखर के पूर्व की ओर अलकनंदा के सुरम्य तट पर बदरीनारायण अवस्थित हैं और पश्चिम में मंदाकिनी के किनारे श्री केदारनाथ विराजमान हैं। अलकनंदा और मंदाकिनी-ये दोनों नदियां रुद्रप्रयाग में मिल जाती हैं और देवप्रयाग में इनकी संयुक्त धारा गंगोतरी से निकल कर आयी हुई भागीरथी गंगा का आलिंगन करती है। इस प्रकार जब गंगा स्नान करते हैं, तब सीधा संबंध श्री बदरी और केदार के चरणों से हो जाता है। बदरीनाथ के यात्राी प्रायः केदारनाथ हो कर जाते हैं और जिस रास्ते से जाते हैं, उसी रास्ते से वापस न लौट कर रामनगर की ओर से लौटते हैं। यात्रा मार्ग में यात्रियों के सुविधार्थ बीच-बीच में चट्टियां बनी हुई हैं। यहां गरमी में भी सर्दी बहुत पड़ती है। कहीं-कहीं तो नदी जल तक जम जाता है। श्री केदारेश्वर 3 दिशा में बर्फ से ढके रहते हैं और शीत काल में तो वहां रहना असंभव सा ही है। कार्तिकी पूर्णिमा के होते-होते पंडे लोग केदार जी की पंचमुखी मूर्ति ले कर नीचे ‘ऊखी मठ’ में, जहां, रावल जी रहते हैं, चले आते हैं और फिर 6 मास के बाद मेष संक्राति लगने पर बर्फ को काट कर, रास्ता बना कर, पुनः जा कर मंदिर के पट खोलते हैं। मंदिर मंदाकिनी के घाट पर श्री केदारनाथ जी का प्रवेश द्वार पहाड़ी ढंग का बना हुआ है। भीतर घोर अंधकार रहता है और दीपक के सहारे ही शंकर जी के दर्शन होते हैं। दीपक में यात्री लोग घी डालते रहते हैं। शिव लिंग अनगढ़ टीले के समान है। सम्मुख की ओर यात्री जल-पुष्पादि चढ़ाते हैं और दूसरी ओर भगवान् के शरीर में घी लगाते हैं तथा उनसे बांह भर कर मिलते हैं। यह मूर्ति चार हाथ लंबी और डेढ़ हाथ मोटी है। मंदिर के जगमोहन में द्रौपदी सहित पंच पांडवों की विशाल मूर्तियां हैं। मंदिर के पीछे कई कुंड हैं, जिनमें आचमन तथा तर्पण किया जाता है। केदारनाथ के निकट ‘भैरव झांप’ पर्वत है। पहले यहां कोई-कोई लोग बर्फ में गल कर, अथवा ऊपर से कूद कर शरीरपात करते थे। पर 1829 से सती एवं भृगुपतन की प्रथाओं की भांति सरकार ने इस प्रथा को भी बंद करा दिया। मार्ग परिचय: यह स्थान हरिद्वार से लगभग 150 मील और ऋषिकेश से 132 मील दूर है। हरिद्वार से ऋषिकेश तक रेल जाती है और मोटर-गाड़ियां भी चलती रहती हैं। ऋषिकेश से रुद्र प्रयाग तक मोटर-बस जाती है। वहां से पैदल जाना पड़ता है। रुद्रप्रयाग से केदार जी का मार्ग दुर्गम है। पैदल यात्रा फ्यचू र पाॅइटं क े सौजन्य से क े अतिरिक्त कडं ी या झप्पान स,े जिस े पहाडी़ कलु ी ढाते े है,ं जा सकत े है।ं



शंख विशेषांक  आगस्त 2009

ज्योतिष में शंख का क्या महत्व है, विभिन्न शंखों की उपयोगिता, शंख कहां-कहां पाए जाते है, शंख कितने प्रकार के होते है तथा घर में या पूजास्थल पर कौन सा शंख रखा जाना चाहिए और क्यों? यह विशेषांक शंखों से आपका पूर्ण परिचय कराने में मदद करेगा.

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