शिव की भक्तवत्सलता का प्रतिक भीमशंकर ज्योतिर्लिग

शिव की भक्तवत्सलता का प्रतिक भीमशंकर ज्योतिर्लिग  

शिव की भक्तवत्सलता का प्रतीक भीमशंकर ज्योतिर्लिंग चित्रा पफुलोरिया देवाधिदेव महादेव! देव एक रूप अनेक! लक्ष्य फिर भी एक - धर्मिष्ठों का कल्याण पापिष्ठों का संहार! उनका एक ऐसा ही रूप है महाराष्ट्र का भीमशंकर ज्योतिर्लिंग। महाराष्ट्र के इस मनोरम स्थल पर प्रकट होकर भगवान ने राक्षस भीम का संहार किया और फिर यहीं बस गए। प्रस्तुत है शिव की इस कथा पर प्रकाश डालता और वहां की छटा को उकेरता आलेख.... भ्गवान भोलेनाथ की म ि. हमा अपरंपार है। किसी भी भक्त की निश्छल भक्ति पर प्रसन्न होकर शीघ्र वरदान देने वाले एकमात्र देव देवाधिदेव भगवान शिव ही हैं। उनकी इसी भक्तवत्सलता का लाभ रावण सहित अनेकानेक असुरों ने उठाया और वरदान में अतुल बल प्राप्त किया। वह भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होते हैं, तो दुष्टों का संहार करने के लिए प्रकट होने में भी देर नहीं करते। भीमशंकर ज्योतिर्लिंग में शिव का प्राकट्य इसी रूप में हुआ। भीमशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पुणे जिले में भीमा नदी के तट पर अवस्थित है। चारों ओर हरियाली और पर्वत की ऊंची पहाड़ियों के बीच यह पवित्र ज्योतिर्लिंग स्थित है। मुक्त पवन यहां आने वालों के अंतरतम को छू लेती है। शिव के अन्य ग्यारह ज्योतिर्लिंगों की अपेक्षा यहां पहुंचना थोड़ा दुर्गम है। यह स्थल घने जंगल के बीच स्थित है। इन जंगलों में दुर्लभ वनस्पतियां भी पाई जाती हैं और शेर भी घूमते हुए देखे जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि ये शेर प्रत्येक रात्रि को भगवान भीम शंकर के दर्शन को मंदिर में आते हैं। शिवरात्रि के अवसर पर यहां एक विशाल मेले का आयोजन होता है, और आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यातायात की विशेष व्यवस्था होती है। इस अवसर पर आसपास का क्षेत्र सजी धजी सुंदर दुल्हन सा दिखाई देता है। इस समय इस स्थल की प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है। भीमशंकर ज्योतिर्लिंग की स्थापना के विषय में पुराणों में कई प्रकार की कथाओं का उल्लेख मिलता है। परंतु अधिकांश में भीम नामक राक्षस के वध के लिए भगवान के अवतरित होने की ही चर्चा है। कथा इस प्रकार है। कामरूप देश में ‘कामरूपेश्वर’ नामक एक महाप्रतापी राजा महान शिव भक्त थे। वे नित्य शिव की पार्थिव पूजा में तल्लीन रहते थे। राजा कामरूपश्े वर की शिव भक्ति की ख्याति को सुनकर भीम नामक एक महाराक्षस वहां प्रकट हुआ और शिव के ध्यान में लीन राजा को ललकारने लगा। जब उसने ललकार का असर होते नहीं देखा, तो अपनी तलवार निकाल कर बोला- ‘शीघ्र बताओ, तुम कर क्या रहे हो?’ राजा निर्भीकता से भगवान की भक्ति में लगे रहे। राजा पर अपना प्रभाव फीका पड़ते देख असुर ने खूब शिव निंदा की और शिव पूजा रोक देने के लिए राजा पर बल प्रयोग करने लगा। राजा के किसी भी प्रकार न मानने पर उसने अपनी तेज धार वाली तलवार से उन पर प्रहार किया, परंतु तलवार राजा पर नहीं पार्थिव लिंग पर पड़ी। उस पार्थिव लिंग से उसी समय भगवान शंकर प्रकट हुए और उस असुर का संहार कर दिया। शंकर के प्रकट होते ही चारों ओर आनंद का वातावरण छा गया। स्वर्ग से पुष्प वर्षा होने लगी और सभी देवताओं ने अच्छे लोगों के कल्याण क े लिए भगवान शकं र स े हमश्े ाा उसी स्थल पर निवास करने का अनुरोध किया। तभी से इस ज्योतिर्लिंग का नाम भीमशंकर पड़ा। शिव पुराण की कथा के अनुसार यह ज्योतिर्लिंग असम प्रांत के कामरूप जिले में पूर्वाेŸार रेलवे पर अवस्थित है। दूसरी कथा के अनुसार त्रिपुरासुर को मारकर भगवान शंकर ने इसी स्थल पर विश्राम किया था। उस समय यहां अवध का भीमक नामक एक सूर्यवंशीय शिव भक्त राजा घोर तपस्या कर रहा था। शंकर जी ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिया और उसकी प्राथ.र् ना पर यहां लिंगमूर्ति के रूप में स्थित हो गए। इस ज्योतिर्लिंग के उद्भव की एक अन्य रोचक कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि बहुत पहले इस क्षेत्र में एक लकड़हारा रहा करता था। एक दिन वह लकड़ी काटने निकला तो उसने ज्यों ही पेड़ पर कुल्हाड़ी का वार किया, वहां की भूमि से रक्त की धारा फूट पड़ी। यह दृश्य देख कर लकड़हारा बहुत घबरा गया और वहां से भाग गया। थोड़ी देर बाद ही वहां लोगों की भीड़ एकत्रित हो गई। इतने में एक व्यक्ति वहां एक दुधारू गाय को ले आया। गाय को उस स्थान पर खड़ा किया गया। जब गाय के थनों से दूध निकल कर उस स्थान पर गिरा तो रक्त निकलना बंद हो गया और वहां एक चमकता हुआ ज्योतिर्लिंग दिखाई दिया। सब लोग इस दृश्य को देखकर चैंक गए। बाद में लोगों ने यहां पर एक मंदिर का निर्माण करवा दिया और उसमें इस ज्योतिर्लिंग की विधिवत स्थापना कर दी। तब से यह ज्योतिर्लिंग भीमशंकर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह मंदिर सहयाद्रि पर्वत पर अवस्थित है और भीमा नदी वहीं से निकलती है। मुख्य मूर्ति से थोड़ा-थोड़ा जल झरता रहता है। मंदिर के पास ही दो कुंड हैं। इन कुंडों का निर्माण और इस मंदिर का जीर्णोद्धार जाने माने राजनीतिज्ञ नाना फड़नवीस ने किया। मंदिर के आसपास एक छोटा सा गांव है। आसपास के अन्य प्रमुख दर्शनीय स्थल भीमशंकर के आसपास कई दर्शनीय स्थल हैं, जिनमें मोक्षकुंड, ज्ञानकुंड, गुप्त भूमेश्वर, सर्वतीर्थ, पापनाशिनी, अक्षय तीर्थ, साक्षी विनायक, गोरखनाथ आश्रम, हनुमान झील आदि प्रमुख हैं। कैसे जाएं/कहां ठहरें? भीमशंकर जाने के लिए पहले रास्ता सुगम नहीं था, पर आज पूना से वहां जाने के लिए सीधी बसें उपलब्ध हैं। निकटतम हवाई अड्डा और रेलवे स्टेशन भी पूना है। यात्रियों के ठहरने के लिए यहां कई धर्मशालाएं हैं



रुद्राक्ष एवं आध्यात्मिक वास्तु विशेषांक   फ़रवरी 2007

प्रकृति के कोष से हमें कई जिवानोपर्यांत वस्तुएं प्राप्त होती है. ऐसी ही वस्तुओं में एक है रुद्राक्ष. रुद्राक्ष का आध्यात्मिक और औषधीय महत्त्व बहुत है. शुद्ध रुद्राक्ष की पहचान कैसे की जाए? रुद्राक्ष का सम्बन्ध भगवान शिव से कैसे जुडा हुआ हैं? रुद्राक्ष धारण

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