संयुक्त परिवार में कहां हो शयन कक्ष

संयुक्त परिवार में कहां हो शयन कक्ष  

संयुक्त परिवार में कहां हो शयन कक्ष? आचार्या राध साहू वास्तु शास्त्र के अनुसार गृहस्वामी अ ा ै र गृहस्वामिनी को दक्षिण दिशा में शयन करना चाहिए। गृह स्वामी, गृह स्वामिनी या कोई अन्य स्त्री यदि दक्षिण दिशा में शयन व निवास करती है तो वह प्रभावशाली हो जाती है। अतः परिवार की मुखिया स्त्री को दक्षिण दिशा में शयन करना चाहिए। कनिष्ठ स्त्रियांे, देवरानी आदि को इस दिशा में शयन नहीं करना चाहिए। जो स्त्रियां अग्नि कोण में शयन व निवास करती हैं उनका दक्षिण दिशा में शयन करने वाली स्त्रियों से मतभेद रहता है। अग्नि कोण में युवक व युवती अल्प समय के लिए शयन कर सकते हैं। अग्नि कोण अध्ययन व शोध के लिए शुभ है। भवन के वायव्य कोण में जो स्त्रियां शयन व निवास करती हैं उनके मन में उच्चाटन का भाव आने लगता है और वे अपने अलग से घर बसाने के सपने देखने लगती हैं। अतः भवन के इस भाग में कन्याओं को शयन कराना शुभ होता है क्योंकि उन्हें ससुराल का घर संवारना होता है। नई दुल्हन या बहू को यह स्थान शयन हेतु कदापि उपयोग में नहीं लाना चाहिए। यदि कोई पुरुष वायव्य कोण में अधिक समय शयन करता है तो उसका मन परिवार से उचट जाता है और वह अलग होने की सोचता है। यदि परिवार में दो या दो से अधिक बहुएं हों तो वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार शयन व निवास के स्थान का चयन कर स्नेह, प्रेम व तालमेल बनाए रखा जा सकता है। भवन का सबसे शक्तिशाली भाग दक्षिण दिशा होती है, अतः इस भाग में सास को सोना चाहिए। अगर सास नहीं हो तो परिवार की बड़ी बहू को सोना चाहिए। उससे छोटी को पश्चिम दिशा में, उससे छोटी को पूर्व दिशा में और उससे छोटी बहू को ईशान कोण में शयन करना चाहिए। दक्षिण में शयन करने वाली स्त्री को पति के बायीं ओर अग्निकोण में शयन करने वाली स्त्री को दायीं ओर शयन करना चाहिए। गृहस्थ पत्नी को पति की बायीं ओर सोना चाहिए। परिवार की मुखिया सास या बड़ी बहू को पूर्व या ईशान कोण में शयन नहीं करना चाहिए। वृद्धावस्था में या अशक्त हो जाने की स्थिति में ईशान कोण में शयन किया जाता सकता है किंतु अग्निकोण में शयन नहीं करना चाहिए। अग्निकोण में अग्नि कार्य से स्त्रियों की ऊर्जा का सही परिपाक हो जाता है। शयन कक्ष का बिस्तर अगर डबल बेड हो और उसमें गद्दे अलग-अलग हों तथा पति-पत्नि अलग-अलग गद्दे पर सोते हों तो उनके बीच तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है और आगे चलकर अलग हो सकते हैं।



वास्तु विशेषांक   दिसम्बर 2007

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