वास्तु में जल ऊर्जा का स्थान

वास्तु में जल ऊर्जा का स्थान  

वास्तु में जल ऊर्जा का स्थान पं. निर्मल कुमार झा स्तु विचार के क्रम में जल ऊर्जा के प्रायोजित समायोजन पर विचार अपेक्षित है। जल ही जीवन है क्योंकि जल के द्वारा ही प्राणी की नित्य सभी क्रियाएं संपादित होती हैं। जल प्यास बुझाता है और ताप के प्रभाव से रक्षा करता है। अस्तु, भूखंड के क्रय के पूर्व ही जल ऊर्जा पर विमर्श कर लेना चाहिए। जल ऊर्जा का समुचित समायोजन बाह्य तथा आभ्यंतरिक रूप से आवश्यक है। जहां तक बाह्य समायोजन का विचार है, जल का बहाव, जमाव, नदी-नाले, तालाब आदि वास के पूर्व और उत्तर हों तो शुभदायक और दक्षिण तथा पश्चिम हों तो अशुभकारक होते हैं। भूमि के ढलान का पूर्व और उत्तर होना उत्तम समझा जाता है। पानी का बहाव इन दिशाओं में होना चाहिए। विभिन्न वर्णों के अनुरूप भूमि के ढलान व बहाव का विवरण इस प्रकार है। ब्राह्मण वर्ण की भूमि का ढलान और बहाव उत्तर दिशा में, क्षत्रिय वर्ण की भूमि का पूर्व दिशा में, वैश्य वर्ण की भूमि का दक्षिण दिशा में तथा शूद्र वर्ण की भूमि का ढलान और बहाव पश्चिम दिशा में होना चाहिए। इससे भाइयों में प्रेम तथा परिवार में सामंजस्य बना रहता है। बाढ़ ढलान और जल जमाव वाले क्षेत्र में वास नहीं करना चाहिए। किसी ग्राम, या शहर या गृह के र्नैत्य कोण में कूप आदि हों तो व्याधि और पीड़ा, पश्चिम में हों तो पशु में वृद्धि (वर्तमान समय में गाड़ियों की संख्या में वृद्धि), वायव्य कोण में हो तो शत्रु द्व ारा हानि तथा घात, उत्तर दिशा में हों तो सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति तथा ईशान कोण में हों तो, लाभ प्राप्त होता है। कूप आदि नगर, ग्राम या गृह के अग्निकोण म े ं हों तो व्यक्ति की मृत्यु की संभावना रहती है, वह भयग्रस्त रहता है या जन हानि होती है। र्नैत्य कोण मंे हो तो धन का तथा वायव्य कोण में हो तो स्त्री की मृत्यु होती है। अतः ऊपर वर्णित तीनों कोणों को छोड़कर शेष दिशाओं में कूप आदि का निर्माण करना चाहिए। नगर, गांव या गृह के मध्य कूप आदि के निर्माण से धन हानि, उत्तर तथा पूरब में सुख की प्राप्ति, अग्नि कोण में पुत्र की मृत्यु तथा दक्षिण दिशा में सर्वनाश होता है। बोरिंग या हैंडपंप जल ऊर्जा का कृत्रिम स्रोत बोरिंग या हैंडपंप है। यदि भूखंड उत्तर-पूर्व का हो तो पूर्व या उत्तर दिशा में, उत्तर-पश्चिम का हो तो उत्तर दिशा में, पूर्व-दक्षिण का हो तो पर्वू दिशा म ंे बाेि रगं या हडंै पपं की स्थापना करनी चाहिए। दक्षिण-पश्चिम या पूर्व-दक्षिण के भूखंड में इनका निर्माण कभी भी दक्षिण या पश्चिम दिशा में नहीं करना चाहिए। इन भूखंडों पर इनके लिए स्थान उत्तर या पूर्व का होगा। ओवर हेड टंकी किसी भी भूखंड में पश्चिम दिशा में सर्वाधिक उच्च निर्माण होना चाहिए। सामान्यतः ओवर हेड टंकी भवन के सबसे ऊपर छत पर हुआ करती है। दक्षिण दिशा में स्थापना से यह भवन के दक्षिण भाग को सबसे ऊंचा बना देता है। अतः किसी भी प्रकार के भूखंड पर निर्मित भवन की छत के दक्षिण दिशा में निर्मित ओवर हेड टंकी उस भाग को सबसे ऊंचा बना कर भौतिक लाभ तथा अभीष्ट की प्राप्ति हेतु विलक्षण स्थिति बनाती है। यदि भूखंड पश्चिम-दक्षिण हो तो इसका निर्माण दक्षिण दिशा में, तथा पूर्व और उत्तर का हो तो पूर्व दिशा में होना चाहिए। उत्तर या ईशान कोण में ओवर हेड टंकी का निर्माण कदापि नहीं करना चाहिए।



वास्तु विशेषांक   दिसम्बर 2007

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