वास्तु संबंधी कहावतें

वास्तु संबंधी कहावतें  

वास्तु का प्रचलन हमारे देश में दीर्घ काल से चला आ रहा है। अतः लोक अंचल में इसकी कई कहावतें भी प्रचलित हैं, ताकि जन-सामान्य भी उन तथ्यों से परिचित हो सके। उन्हीं में से कुछ कहावतें नीचे दी जा रही हैं: जाके उत्तर धोबी सोवे। ताहि भवन को मालिक रोवेे। अर्थात् जिस घर के उत्तर की ओर धोबी रहता हो, उस भवन के स्वामी को कोई न कोई समस्याएं आती रहती हैं। जाकै पूरब पीपल होवे। सो लक्ष्मी पर लक्ष्मी खोवे।। अर्थात् जिस घर के पूर्व में पीपल होता है, उसे लगातार आर्थिक हानि उठानी पड़ती है। जेहिं मुंडे पर अशोक वृक्ष बासा। शोक रहत उई भवत सुवासा।। अर्थात जिस भूमि पर अशोक का वृक्ष होता है, वहां का भवन उत्तम सुखदायक होता है, यानि घर की सीमा में अशोक के पेड़ का होना परम सुखदायक है। सिंह मुखी जो रहने जावै। तन, धन आपन सकल गंवावै। अर्थात आगे से चैड़े और पीछे से संकरे अर्थात सिंह मुखी भवन में रहने वाले के शारीरिक स्वास्थ्य एवं धन दोनों की हानि होती है। बड़ों दुआर भावै। आफत बुलावै।। अर्थात जो व्यक्ति घर में बड़ा दरवाजा (मुख्य द्वार) लगवाता है, वहां नाना प्रकार की समस्याएं आती हैं। बीचै कूप न आवै धूप। हौवे रंक रहेंगे भूप।। अर्थात जिस भवन के बीचों-बीच कुआं हो तथा जिस भवन में धूप न आती हो, वहां के रहने वाले वासी दरिद्रता को प्राप्त करते हैं। ईशान पूजा नैरित भारी, अमिनी अगन जटावै।। वायु खुल्ला, नाभी खुली, उहि घर राम रखावै।। अर्थात जिस घर में ईशान में पूजा होती हो, नैर्ऋत्य क्षेत्र भारी हो, आग्नेय कोण में अग्नि जलती हो, वायु कोण खुला हो तथा जिसका ब्रह्म स्थान (नाभि क्षेत्र) खाली हो, उस भवन के वासियों पर ईश्वर की कृपादृष्टि बनी रहती है। जिस भवना में गौअन रैवें। उनकी नाव मुरारी खेवें।। अर्थात जिस भवन मंे गायों का वास होता है, वहां भगवान की कृपा बनी रहती है। गर्दभ लौटे, शूकर जन्ने नर को बध हो जाय। बिन सुद्धि तापर रहे, उकै वैई रवा जाय।। अर्थात जिस भूमि पर गधा लोट लगावे, सुअरी जने तथा जहां किसी की हत्या हो जाये, उस जमीन पर रहने वालों को वहां बिना शुद्धि कराये नहीं रहना चाहिए अन्यथा वहां के निवासियों का शनैः शनैः नाश हो जाता है। गज जेहि हारै झंूड उठावैं। सकल शगुन अस बात जतावै।। जो पहिले घर-देव खिचावै। उहि घर को बहि दैव रखावै।। अर्थात जिस घर में पहले वास्तु देवता को आहार दिया जाता हो और बाद में घर के अन्य लोग भोजन करते हों वहां के निवासियों को वही देव सुख, शांति, समृद्धि देता है। नाभि में खंटा। मरि जाय सूंठा।। अर्थात जिस भवन के केंद्र में खंभा होता है उसके निवासी संतान से परम कष्ट पाते हैं अर्थात मरते समय भी उन्हें संतान का सुख नहीं होता है। डसना ऊपर अगर जटावै। घर को बूढ़़़ो सुख नहीं पावै।। अर्थात जिस घर में ईशान्य कोण पर अग्नि दहन होता हो (रसोई घर होता है) वहां का मुखिया कभी भी सुखी नहीं रहता है। नेरित गड्ढा इसना भारी। वाको का कर पाय मुरारी। अर्थात जिस भवन के नैर्ऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम कोण) में गड्ढा हो तथा ईशान बहुत भारी हो, उस भवन के निवासियों का कल्याण भगवान भी नहीं कर सकते। छोटे दरवाजो मोटी चोर। बहों होय तो आफत घोर।। अर्थात जिस भवन का द्वार (मुख्य द्वार) बहुत छोटा होता है वहां चोरों के आने की बहुत सम्भावना बनी रहती है तथा जिस भवन का द्वार बहुत बड़ा होता है, वहां अनेक समस्याएं आती हैं। घर में अंधेरो - बीमारी को फेरो अर्थात जिस घर में सूर्य का प्रकाश नहीं आता है वहां के वासी बार-बार बीमार होते हैं।


वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2014

फ्यूचर समाचार के वास्तु विषेषांक में अनेक रोचक व ज्ञानवर्धक लेख जैसे भवन और वास्तु, वास्तु शास्त्र का वैदिक स्वरूप, वास्तु शास्त्र के मूलभूत तत्व, वास्तु शास्त्र व दाम्पत्य जीवन, उद्योग धन्धे क्यों बन्द हो जाते हैं?, फ्लैट/प्लाॅट खरीदने हेतु वास्तु तथ्य, अनुभूत प्रयोग एवं सूत्र, वास्तु सम्मत सीढ़ियां भी देती हैं सफलता, घर में क्या न करें?, विभिन्न दिषाओं में रसोईघर, वास्तुदोष समाधान, वास्तु संबंधी कहावतें, वास्तु दोष दूर करने के सरल उपाय, पंचतत्व का महत्व तथा स्वास्थ्य संबंधी वास्तु टिप्स। इसके अतिरिक्त वास्तु पर हुए एक शोध कार्य पर लिखा गया सम्पादकीय, करियर परिचर्चा, सुखी दाम्पत्य जीवन का आधार: शादी के सात वचन, सत्य कथा, हैल्थ कैप्सूल, पावन स्थल में बांसवाड़ा का प्राचीन मां त्रिपुरासुन्दरी मन्दिर, ज्योतिष व महिलाएं तथा ग्रह स्थिति एवं व्यापार, पंचपक्षी के रहस्य, मंत्र व तंत्र साधना का स्वरूप, कर्णबेधन संस्कार, गृह सज्जा एवं वास्तु फेंगसुई आदि लेखों को समायोजित किया गया है।स्थायी स्तम्भ विचार गोष्ठी के अन्तर्गत ‘पिरामिड का वास्तु में प्रयोग’ विषय पर विभिन्न विद्वानों के विचारों को प्रस्तुत किया गया है। आषा है फ्यूचर समाचार के पाठकों को यह विषेषांक विषेष पसंद आयेगा।

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